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मृत व्यक्तियों के बिना दावे वाले बैंक खातों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता — वारिसों को जानकारी क्यों नहीं दी जा सकती?

मृत व्यक्तियों के बिना दावे वाले बैंक खातों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता — वारिसों को जानकारी क्यों नहीं दी जा सकती? केंद्र और RBI से मांगा जवाब

भारत में करोड़ों रुपये ऐसी रकम के रूप में पड़े हैं जिन पर किसी ने दावा नहीं किया है। इनमें बैंक खातों, निवेश योजनाओं, बीमा पॉलिसियों और अन्य वित्तीय साधनों में जमा पैसा शामिल है। इन खातों के कई धारक अब जीवित नहीं हैं, लेकिन उनके कानूनी वारिसों को अक्सर यह जानकारी ही नहीं होती कि उनके परिवार के सदस्य के नाम से कोई खाता या निवेश मौजूद था।

इसी गंभीर मुद्दे पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने केंद्र सरकार और Reserve Bank of India से महत्वपूर्ण सवाल पूछा है कि मृत व्यक्तियों के बैंक खातों की जानकारी उनके कानूनी वारिसों को उपलब्ध कराने में आखिर समस्या क्या है। अदालत ने कहा कि यदि जानकारी उपलब्ध कराई जाए तो वारिस उन खातों में जमा बिना दावे वाली रकम (Unclaimed Funds) को प्राप्त कर सकते हैं।

यह सवाल न्यायमूर्ति Justice Vikram Nath और न्यायमूर्ति Justice Sandeep Mehta की पीठ ने उस जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान उठाया, जिसे वित्तीय पत्रकार और ‘मनीलाइफ’ की मैनेजिंग एडिटर Sucheta Dalal ने वर्ष 2022 में दायर किया था।


मामला क्या है

यह जनहित याचिका मुख्य रूप से उन निवेशकों और जमाकर्ताओं के पैसे से जुड़ी है जो वर्षों से बिना दावे के पड़े हुए हैं। कई मामलों में ऐसा इसलिए होता है क्योंकि खाताधारक की मृत्यु हो जाती है और उसके वारिसों को यह जानकारी नहीं होती कि उस व्यक्ति के नाम से कोई बैंक खाता या निवेश भी था।

याचिका में कहा गया है कि ऐसे मामलों में बड़ी मात्रा में धनराशि सरकारी फंड में चली जाती है, लेकिन वास्तविक कानूनी वारिसों तक इसकी जानकारी नहीं पहुंचती।

याचिका का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत खाताधारकों के वारिसों को उनके परिवार के सदस्य के वित्तीय खातों और निवेशों की जानकारी उपलब्ध हो सके, ताकि वे उस धन पर अपना वैध दावा कर सकें।


अदालत में क्या दलीलें दी गईं

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत में कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि मृत व्यक्तियों के वारिसों को अक्सर यह पता ही नहीं होता कि उनके परिवार के सदस्य के कितने बैंक खाते या निवेश थे।

उन्होंने अदालत को बताया कि इस PIL के माध्यम से यह मांग की गई है कि ऐसे बिना दावे वाले खातों और फंड की जानकारी सार्वजनिक या सुलभ बनाई जाए, ताकि कानूनी वारिस उन्हें खोज सकें।

भूषण ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अचानक मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और उसने अपने निवेशों के बारे में परिवार को जानकारी नहीं दी है, तो उसके वारिसों के लिए उन खातों का पता लगाना लगभग असंभव हो जाता है।


अदालत की चिंता – धोखाधड़ी का खतरा

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने एक महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि बिना दावे वाले खातों की जानकारी सार्वजनिक कर दी जाती है तो इससे ऑनलाइन धोखाधड़ी और जालसाजी का खतरा बढ़ सकता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि:

  • यदि किसी मृत व्यक्ति के खाते की जानकारी सार्वजनिक हो जाती है
  • तो कोई भी व्यक्ति खुद को वारिस बताकर उस रकम पर दावा कर सकता है

इसलिए अदालत ने यह भी जानना चाहा कि ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिसमें वारिसों को जानकारी भी मिल सके और धोखाधड़ी की संभावना भी कम हो।


केंद्रीकृत डेटाबेस की मांग

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि RBI स्वयं भी एक केंद्रीयकृत और खोजने योग्य डेटाबेस (Centralised & Searchable Database) की आवश्यकता पर जोर दे चुका है।

उन्होंने कहा कि यदि ऐसा डेटाबेस बनाया जाए तो लोग अपने मृत माता-पिता या रिश्तेदारों के नाम से मौजूद खातों को आसानी से खोज सकेंगे।

याचिका में केवल बैंक खातों ही नहीं बल्कि अन्य वित्तीय साधनों को भी शामिल करने की मांग की गई है, जैसे:

  • प्रतिभूतियां (Securities)
  • बीमा पॉलिसियां
  • डाकघर खाते
  • निवेश योजनाएं

भूषण ने यह भी बताया कि कई प्रकार के कल्याणकारी फंड (Welfare Funds) की राशि भी इसी प्रकार बिना दावे के जमा हो गई है।


बिना दावे वाली राशि कितनी है

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि भारत में बिना दावे वाली राशि की कुल मात्रा अत्यंत बड़ी है। अनुमान के अनुसार यह राशि 1.5 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकती है।

यह रकम अलग-अलग सरकारी फंड और योजनाओं में स्थानांतरित हो चुकी है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • Depositor Education and Awareness Fund (DEAF)
  • Investor Education and Protection Fund (IEPF)
  • Senior Citizens Welfare Fund (SCWF)

इन फंडों में वह पैसा जमा किया जाता है जिस पर लंबे समय तक किसी ने दावा नहीं किया।


केंद्र सरकार की दलील

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल N. Venkataraman ने अदालत को बताया कि यदि कोई बैंक खाता 10 वर्ष तक बिना दावे के पड़ा रहता है, तो उसकी राशि Depositor Education and Awareness Fund में स्थानांतरित कर दी जाती है।

उन्होंने कहा कि इस फंड का उपयोग वित्तीय साक्षरता और जन-जागरूकता कार्यक्रमों के लिए किया जाता है।

ASG ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बाद में कोई वास्तविक कानूनी वारिस सामने आता है, तो उसे उस फंड से उसकी राशि वापस मिल सकती है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस PIL में बिना दावे वाली राशि के संबंध में पर्याप्त आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।


अदालत का महत्वपूर्ण प्रश्न

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने एक उदाहरण देते हुए पूछा:

यदि किसी व्यक्ति के अलग-अलग देशों में कई बैंक खाते हों और उसकी मृत्यु बिना वसीयत किए हो जाए, तो उसके वारिसों को उन खातों की जानकारी कैसे मिलेगी?

उन्होंने यह भी कहा कि:

  • कई मामलों में खाताधारक ने KYC पूरा नहीं किया होता
  • या परिवार को उसके निवेशों की जानकारी नहीं होती

ऐसी स्थिति में वारिसों के लिए पैसे का पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है।


नीति बनाम अधिकार का प्रश्न

केंद्र सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि यह मामला नीतिगत (Policy) क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

लेकिन अदालत ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई। न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि वारिसों को जानकारी देना कोई नीतिगत मुद्दा नहीं है।

उन्होंने कहा:

“हम यह नहीं कह रहे कि फंड का ट्रांसफर अवैध है। हम सिर्फ यह पूछ रहे हैं कि यदि कानूनी वारिसों को जानकारी दे दी जाए तो इसमें क्या समस्या है?”


निजता और दुरुपयोग की चिंता

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • निजता का अधिकार (Right to Privacy)
  • जानकारी के दुरुपयोग की संभावना
  • धोखाधड़ी और जालसाजी का जोखिम

RBI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता Ranjit Kumar ने अदालत को बताया कि इस तरह के मामलों में सेंट्रल KYC सिस्टम पहले से मौजूद है।

उन्होंने कहा कि बैंक इन खातों की राशि को एक ट्रस्ट (अमानत) के रूप में रखते हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति दावा करता है तो बैंक को पहले उसकी पहचान और अधिकार के बारे में संतुष्ट होना पड़ता है।


अदालत का निर्देश

सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और RBI को चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया

अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार और नियामक संस्थाओं का स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए।

मामले की अगली सुनवाई 5 मई को निर्धारित की गई है।


याचिका में क्या मांग की गई है

याचिका में अदालत से यह अनुरोध किया गया है कि:

  • RBI के नियंत्रण में एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस बनाया जाए
  • इसमें मृत खाताधारकों की जानकारी उपलब्ध कराई जाए
  • बैंकों को निष्क्रिय या सुप्त खातों की जानकारी RBI को देना अनिवार्य किया जाए

इस डेटाबेस में निम्न जानकारी शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया है:

  • मृत खाताधारक का नाम
  • पता
  • खाते से जुड़ा अंतिम लेन-देन
  • संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था

IEPF से जुड़ी समस्याएँ

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि Investor Education and Protection Fund की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी तक पहुंचना आसान नहीं है।

कई लोगों को:

  • वेबसाइट खोलने में तकनीकी समस्याएं आती हैं
  • जानकारी ढूंढना कठिन होता है

इस वजह से लोग अक्सर बिचौलियों (Middlemen) की मदद लेने को मजबूर हो जाते हैं।

याचिका के अनुसार IEPF में जमा राशि भी लगातार बढ़ रही है। उदाहरण के तौर पर:

  • 1999 में यह राशि लगभग 400 करोड़ रुपये थी
  • मार्च 2020 तक यह बढ़कर 4100 करोड़ रुपये से अधिक हो गई

निष्कर्ष

मृत व्यक्तियों के बैंक खातों और निवेशों में पड़ी बिना दावे वाली रकम का मुद्दा भारत में एक बड़ी वित्तीय और कानूनी चुनौती बन चुका है। लाखों परिवार ऐसे हो सकते हैं जिन्हें यह पता ही नहीं कि उनके रिश्तेदारों के नाम से कोई बैंक खाता या निवेश मौजूद था।

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि अदालत के निर्देश पर कोई केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार होता है तो इससे लाखों लोगों को अपने परिवार की जमा पूंजी का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार और RBI इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या भविष्य में ऐसी कोई प्रणाली विकसित की जाती है जिससे बिना दावे वाले खातों की जानकारी वास्तविक वारिसों तक पहुंच सके

केस शीर्षक:
Sucheta Dalal v. Union of India & Ors. | W.P. (C) No. 185/2022