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3 वर्ष से अधिक हिरासत के बाद PMLA मामले में ज़मानत — कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा

3 वर्ष से अधिक हिरासत के बाद PMLA मामले में ज़मानत — कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा, लंबे समय तक ट्रायल से पहले हिरासत अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकती है

भारतीय न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार माना गया है। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए Calcutta High Court ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में एक आरोपी को ज़मानत प्रदान की। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को ट्रायल शुरू हुए बिना या समाप्त हुए बिना तीन वर्ष से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है, तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) की धारा 45 के तहत लागू कठोर “दोहरी शर्तें” (Twin Conditions) भी हर स्थिति में सर्वोपरि नहीं हो सकतीं। यदि किसी मामले में हिरासत की अवधि अत्यधिक लंबी हो जाए और ट्रायल में देरी हो रही हो, तो Article 21 of the Constitution of India के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार इन शर्तों पर भारी पड़ सकता है।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति Justice Subhra Ghosh ने करते हुए आरोपी की ज़मानत याचिका स्वीकार की।


मामला क्या था

यह मामला कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा हुआ था, जिसकी जांच Enforcement Directorate (ED) द्वारा की जा रही थी। जांच एजेंसी ने आरोपी के खिलाफ PMLA के तहत मामला दर्ज किया और उसे हिरासत में ले लिया।

रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता को 9 फरवरी 2023 से हिरासत में रखा गया था। अदालत के समक्ष यह तर्क दिया गया कि आरोपी को लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रखा गया है, जबकि मामले का ट्रायल अभी तक शुरू भी नहीं हुआ है और निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना भी नहीं दिखाई दे रही है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि इतनी लंबी अवधि तक ट्रायल से पहले हिरासत में रखना संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।


अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। अदालत ने कहा कि किसी भी दंडात्मक कानून की कठोरता के बावजूद न्यायालय का मूल कर्तव्य संविधान और कानून के शासन की रक्षा करना है।

न्यायमूर्ति सुव्रा घोष ने कहा कि:

  • संविधानिक अदालतें हमेशा संविधानवाद और कानून के शासन के पक्ष में झुकती हैं
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान की मूल आत्मा का हिस्सा है
  • किसी भी कानून की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि वह मौलिक अधिकारों को अनावश्यक रूप से सीमित कर दे

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को अत्यधिक लंबे समय तक ट्रायल से पहले हिरासत में रखा जाता है, तो वह हिरासत धीरे-धीरे दंडात्मक हिरासत का रूप ले सकती है, जो न्यायिक सिद्धांतों के विरुद्ध है।


अनुच्छेद 21 की सर्वोच्चता

अदालत ने अपने आदेश में विशेष रूप से अनुच्छेद 21 का उल्लेख किया। यह अनुच्छेद प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

अदालत ने कहा कि:

  • अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है
  • यदि किसी कानून की कठोर शर्तें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनुचित रूप से सीमित कर रही हों, तो न्यायालय को संतुलन बनाना चाहिए

इसी संदर्भ में अदालत ने कहा कि उचित मामलों में अनुच्छेद 21, PMLA की धारा 45 के तहत निर्धारित “दोहरी शर्तों” से भी ऊपर हो सकता है।


PMLA की धारा 45 और दोहरी शर्तें

PMLA के तहत ज़मानत प्राप्त करना सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अधिक कठिन होता है। धारा 45 के तहत अदालत को ज़मानत देने से पहले दो शर्तों को संतुष्ट करना होता है:

  1. अदालत को यह विश्वास होना चाहिए कि आरोपी प्रथम दृष्टया अपराध का दोषी नहीं है
  2. आरोपी ज़मानत पर रिहा होने के बाद कोई और अपराध नहीं करेगा

इन्हें ही “ट्विन कंडीशन्स” या दोहरी शर्तें कहा जाता है।

हालांकि अदालत ने कहा कि यदि आरोपी लंबे समय से हिरासत में है और ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही है, तो इन शर्तों को कठोर रूप से लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा।


ट्रायल में संभावित देरी

अदालत ने मामले की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए पाया कि निकट भविष्य में ट्रायल के समाप्त होने की संभावना बहुत कम है।

इसके कई कारण बताए गए:

  • मामले में 30 से अधिक गवाह हैं
  • बड़ी मात्रा में दस्तावेज़ी साक्ष्य शामिल हैं
  • मूल अपराध (Predicate Offence) का मामला अभी भी लंबित है

इसके अलावा, उस मूल अपराध से संबंधित कुछ कानूनी कार्यवाहियाँ हाईकोर्ट में भी लंबित हैं, जिसके कारण ट्रायल की प्रक्रिया और भी लंबी हो सकती है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।


साक्ष्यों की प्रकृति

अदालत ने यह भी गौर किया कि इस मामले में अधिकांश साक्ष्य दस्तावेज़ी प्रकृति के हैं।

ये दस्तावेज़ पहले ही जब्त किए जा चुके हैं और जांच एजेंसी की हिरासत में हैं। इसलिए आरोपी द्वारा साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना काफी कम हो जाती है।

अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले के अधिकांश गवाह सरकारी अधिकारी हैं। ऐसे में यह संभावना भी बहुत कम है कि आरोपी उन्हें प्रभावित कर सकेगा।


धारा 50 के तहत दिए गए बयान

अदालत ने अपने आदेश में PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज किए गए बयानों के संबंध में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि:

  • धारा 50 के तहत दर्ज किए गए बयान मुख्य साक्ष्य (Substantive Evidence) नहीं माने जाते
  • इनका उपयोग केवल अन्य साक्ष्यों की पुष्टि या समर्थन के लिए किया जा सकता है

इसलिए केवल इन बयानों के आधार पर आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता।


मूल अपराध में पहले ही ज़मानत

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जिस मूल अपराध के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज हुआ था, उसमें आरोपी को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है।

इसके अलावा उस मामले में जांच भी पूरी हो चुकी है। इसलिए अदालत ने कहा कि आरोपी को आगे पूछताछ के लिए हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।


आर्थिक अपराध की गंभीरता

हालांकि अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि आर्थिक अपराध सामान्य अपराधों की तुलना में अधिक गंभीर माने जाते हैं और उनके समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ सकते हैं।

फिर भी अदालत ने कहा कि:

  • अपराध की गंभीरता महत्वपूर्ण है
  • लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है

इसलिए न्यायालय को दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।


सह-आरोपी को पहले मिल चुकी थी ज़मानत

अदालत ने यह भी देखा कि इसी मामले में एक अन्य सह-आरोपी को पहले ही ज़मानत दी जा चुकी है और उसकी स्थिति वर्तमान याचिकाकर्ता के समान थी।

इस तथ्य को भी अदालत ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना और कहा कि समान परिस्थितियों में समान राहत मिलनी चाहिए।


ज़मानत की शर्तें

अदालत ने आरोपी को ज़मानत देते समय कुछ सख्त शर्तें भी लगाईं ताकि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।

इन शर्तों में शामिल हैं:

  • ₹10 लाख का निजी बॉन्ड जमा करना
  • पासपोर्ट अदालत के समक्ष जमा करना
  • बिना अनुमति देश से बाहर यात्रा न करना
  • ट्रायल कोर्ट के समक्ष नियमित रूप से उपस्थित होना
  • किसी भी गवाह को प्रभावित न करना
  • साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ न करना

इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी ज़मानत पर रहते हुए न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करे।


अदालत की अंतिम टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियाँ केवल ज़मानत याचिका के निपटारे के उद्देश्य से हैं। इनका उपयोग ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष तय करने के लिए नहीं किया जाएगा।

इस प्रकार अदालत ने आरोपी को राहत देते हुए यह सुनिश्चित किया कि न्यायिक प्रक्रिया आगे निष्पक्ष रूप से जारी रह सके।


निष्कर्ष

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को पुनः रेखांकित करता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी कठोर कानून की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जानी चाहिए जिससे संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन हो।

यह फैसला विशेष रूप से उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां आरोपी लंबे समय तक ट्रायल से पहले हिरासत में रहते हैं। अदालत ने यह संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया की देरी के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अनिश्चितकाल तक सीमित नहीं की जा सकती।

इस निर्णय से यह सिद्धांत फिर स्थापित हुआ है कि संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल स्तंभ हैं, और आवश्यक होने पर वे कठोर विधिक प्रावधानों से भी ऊपर हो सकते हैं।