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GPSC परीक्षा विवाद पर गुजरात हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी — ‘अर्थशास्त्र’ के प्रश्न पर आयोग से मांगी मूल पुस्तक

GPSC परीक्षा विवाद पर गुजरात हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी — ‘अर्थशास्त्र’ के प्रश्न पर आयोग से मांगी मूल पुस्तक

प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर Gujarat Public Service Commission (GPSC) की कार्यप्रणाली पर Gujarat High Court ने गंभीर सवाल उठाए हैं। एक प्रतियोगी परीक्षा में पूछे गए कौटिल्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ से संबंधित प्रश्न को लेकर उठे विवाद पर अदालत ने आयोग को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आयोग के पास उस ग्रंथ की प्रामाणिक प्रति ही उपलब्ध नहीं है, तो ऐसे प्रश्न तैयार करने की प्रक्रिया पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।

यह मामला एक अभ्यर्थी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें GPSC की परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रश्न का आधिकारिक उत्तर गलत है और यह मूल ग्रंथ के प्रामाणिक स्रोतों से मेल नहीं खाता। जब यह मामला अदालत में पहुंचा, तो सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से प्रस्तुत की गई सामग्री और तर्कों ने अदालत को और भी अधिक चिंतित कर दिया।


विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद GPSC द्वारा आयोजित एक प्रतियोगी परीक्षा से शुरू हुआ। परीक्षा में प्राचीन भारतीय राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा से संबंधित एक प्रश्न पूछा गया था, जो कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ से जुड़ा था। प्रश्न का आधिकारिक उत्तर आयोग ने जारी किया, लेकिन कुछ अभ्यर्थियों ने इसे गलत बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई।

अभ्यर्थियों का कहना था कि आयोग द्वारा दिया गया उत्तर उस मूल ग्रंथ की मान्य व्याख्याओं से मेल नहीं खाता, जिसे भारतीय प्रशासनिक और ऐतिहासिक अध्ययन में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। जब आयोग ने आपत्ति पर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया, तो मामला अदालत तक पहुंच गया।

याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों और उनके उत्तरों की सटीकता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इनके आधार पर अभ्यर्थियों का चयन और भविष्य तय होता है। यदि किसी प्रश्न का उत्तर गलत हो या संदिग्ध स्रोत पर आधारित हो, तो इससे हजारों अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हो सकता है।


अदालत ने मांगी 1915 का मूल अनुवाद

सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग से उस मूल स्रोत की जानकारी मांगी, जिसके आधार पर प्रश्न तैयार किया गया था। आयोग ने बताया कि प्रश्न कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित था, जिसे 1915 में विद्वान आर. शामशास्त्री ने प्रकाशित किया था।

यह सुनने के बाद अदालत ने आयोग से उस मूल पुस्तक या उसके विश्वसनीय संस्करण को पेश करने को कहा। अदालत का उद्देश्य यह जानना था कि आयोग ने वास्तव में किस स्रोत के आधार पर प्रश्न तैयार किया था और क्या आधिकारिक उत्तर उसी स्रोत के अनुरूप है।

लेकिन सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से जो सामग्री प्रस्तुत की गई, उसने अदालत को संतुष्ट नहीं किया।


इंटरनेट से डाउनलोड की गई PDF पर सवाल

अदालत के सामने आयोग ने जो दस्तावेज प्रस्तुत किया, वह इंटरनेट से डाउनलोड की गई एक PDF फाइल थी। आयोग यह स्पष्ट नहीं कर सका कि यह PDF किस वेबसाइट या स्रोत से डाउनलोड की गई थी और क्या यह वास्तव में उसी मूल अनुवाद का प्रमाणिक संस्करण है।

इस स्थिति पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि एक संवैधानिक संस्था होने के नाते आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने प्रश्नपत्रों और उत्तर कुंजी के लिए विश्वसनीय और प्रमाणिक स्रोतों का उपयोग करे।

यदि आयोग के पास मूल पुस्तक या उसका प्रमाणिक संस्करण ही उपलब्ध नहीं है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रश्न किस आधार पर तैयार किया गया और उत्तर किस स्रोत से निर्धारित किया गया।


न्यायमूर्ति निरजर देसाई की तीखी टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Nirzar Desai ने आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आयोग की ओर से पेश की गई सामग्री अत्यंत निराशाजनक है और इससे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रश्नपत्र तैयार करने में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई।

अदालत ने यह भी कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गए प्रत्येक प्रश्न का आधार स्पष्ट और प्रमाणिक होना चाहिए। यदि आयोग स्वयं यह नहीं बता सकता कि उसने किस किताब या स्रोत के आधार पर प्रश्न तैयार किया है, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

न्यायमूर्ति देसाई ने आयोग से यह भी पूछा कि जब उसके पास मूल ग्रंथ की प्रमाणिक प्रति ही उपलब्ध नहीं है, तो उसने यह कैसे तय किया कि प्रश्न और उसका उत्तर सही है।


परीक्षार्थियों के भविष्य पर असर

अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम केवल एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि इनसे हजारों युवाओं का करियर और भविष्य जुड़ा होता है।

ऐसे में यदि प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी में कोई त्रुटि होती है, तो इसका सीधा प्रभाव उन अभ्यर्थियों पर पड़ता है जिन्होंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से परीक्षा दी होती है। इसलिए आयोग जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने काम में पूरी पारदर्शिता और सटीकता बनाए रखें।

अदालत ने कहा कि परीक्षार्थियों के साथ न्याय तभी संभव है जब प्रश्नपत्र तैयार करने और उत्तर कुंजी तय करने की प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक, निष्पक्ष और प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित हो।


आयोग की जिम्मेदारी और पारदर्शिता का सवाल

इस मामले ने प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाए हैं। आयोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रश्नपत्र तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की मदद लें और हर प्रश्न के लिए प्रमाणिक संदर्भ उपलब्ध रखें।

लेकिन यदि अदालत में आयोग स्वयं यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि प्रश्न किस स्रोत से लिया गया है, तो इससे उसकी विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। अदालत ने इस संदर्भ में आयोग को सावधानी बरतने की सलाह भी दी।

अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए आयोग को अपने प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना चाहिए।


व्यापक प्रभाव

यह मामला केवल GPSC तक सीमित नहीं है। भारत में कई राज्यों और केंद्र स्तर पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इन परीक्षाओं में लाखों उम्मीदवार भाग लेते हैं और इनके परिणामों के आधार पर सरकारी सेवाओं में नियुक्तियां होती हैं।

ऐसे में यदि किसी प्रश्न की प्रामाणिकता पर सवाल उठता है, तो यह पूरी चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अदालत का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में आयोगों को अधिक सतर्क और जिम्मेदार बनाने में मदद कर सकता है।


निष्कर्ष

Gujarat High Court द्वारा की गई यह टिप्पणी प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को अपने काम में पूरी सावधानी और पारदर्शिता बरतनी चाहिए।

यदि किसी प्रश्न का आधार ही संदिग्ध हो या आयोग स्वयं उसके स्रोत को प्रमाणित न कर सके, तो इससे पूरी परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

इस मामले की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि आयोग किस प्रकार अदालत के सामने अपने पक्ष को साबित करता है। लेकिन फिलहाल अदालत की कड़ी टिप्पणी ने यह संकेत दे दिया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लापरवाही को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।