दिल्ली हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला – वसीयत विवाद लंबित रहने तक ‘बिना वसीयत’ के आधार पर संपत्ति दावा नहीं चलेगा
दिल्ली हाई कोर्ट ने मेवाड़ राजपरिवार से जुड़े एक महत्वपूर्ण संपत्ति विवाद में अहम निर्णय देते हुए पद्मजा कुमारी परमार की याचिका को खारिज कर दिया। पद्मजा ने अपने दिवंगत पिता अरविंद सिंह मेवाड़ की संपत्ति के लिए ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ यानी प्रशासन पत्र जारी करने की मांग की थी। उनका दावा था कि उनके पिता की मृत्यु बिना किसी वैध वसीयत के हुई थी, इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति उनके सभी प्रथम श्रेणी के वारिसों में बराबर बांटी जानी चाहिए।
हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया कि जब वसीयत की वैधता से संबंधित मामला पहले से ही अदालत में लंबित है, तब ‘बिना वसीयत’ के आधार पर समानांतर कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने की, जिन्होंने 17 मार्च को यह फैसला सुनाया।
यह मामला केवल पारिवारिक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारतीय उत्तराधिकार कानून के महत्वपूर्ण सिद्धांत भी स्पष्ट होते हैं, खासकर उन परिस्थितियों में जब वसीयत की वैधता पर प्रश्न उठाया जाता है और एक ही संपत्ति को लेकर अलग-अलग कानूनी दावे किए जाते हैं।
अरविंद सिंह मेवाड़ और संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद उदयपुर के मेवाड़ राजपरिवार के प्रमुख सदस्य रहे स्वर्गीय अरविंद सिंह मेवाड़ की विशाल संपत्ति से जुड़ा है। अरविंद सिंह मेवाड़ का निधन 16 मार्च 2025 को उदयपुर में हुआ था। उनके निधन के बाद परिवार के भीतर संपत्ति को लेकर विवाद सामने आया।
पद्मजा कुमारी परमार ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए दावा किया कि उनके पिता ने कोई वैध वसीयत नहीं छोड़ी थी। इसलिए उनकी संपत्ति को ‘बिना वसीयत’ यानी इंटेस्टेट उत्तराधिकार के सिद्धांत के आधार पर बांटा जाना चाहिए।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार, यदि कोई हिंदू व्यक्ति बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसकी संपत्ति उसके प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिसों में समान रूप से बांटी जाती है। अरविंद सिंह मेवाड़ के मामले में ऐसे चार वारिस बताए गए—उनकी पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा। इस आधार पर पद्मजा ने दावा किया कि प्रत्येक वारिस को संपत्ति में एक-चौथाई हिस्सा मिलना चाहिए।
इसी आधार पर उन्होंने अदालत से ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ जारी करने की मांग की थी, ताकि संपत्ति के प्रबंधन और वितरण की प्रक्रिया शुरू की जा सके।
भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ की ओर से पेश की गई वसीयत
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब पद्मजा के भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने अदालत में एक पंजीकृत वसीयतनामा प्रस्तुत किया। यह वसीयत 7 फरवरी 2025 की बताई गई थी। इस वसीयत के अनुसार, अरविंद सिंह मेवाड़ ने अपनी पूरी संपत्ति का एकमात्र वारिस और उत्तराधिकारी लक्ष्यराज सिंह को घोषित किया था।
लक्ष्यराज ने अदालत में यह भी बताया कि इस वसीयत को विधिवत तरीके से तैयार और निष्पादित किया गया था। उन्होंने दावा किया कि वसीयत बनाते समय उनके पिता पूरी तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ थे और उन्होंने सोच-समझकर यह निर्णय लिया था।
इसके समर्थन में उन्होंने यह भी कहा कि वसीयत के समय एक पारिवारिक डॉक्टर की उपस्थिति थी, जिसने प्रमाणित किया था कि अरविंद सिंह मेवाड़ उस समय पूर्ण रूप से मानसिक रूप से सक्षम थे और किसी प्रकार के दबाव में नहीं थे।
लक्ष्यराज सिंह ने यह भी तर्क दिया कि भविष्य में पारिवारिक विवाद से बचने के लिए उनकी बहनों ने पहले ही अपने हिस्से के शेयर अपने पिता को वापस ट्रांसफर कर दिए थे और पारिवारिक कंपनियों के निदेशक पदों से इस्तीफा दे दिया था।
पद्मजा कुमारी परमार की आपत्तियां
पद्मजा कुमारी परमार ने इस वसीयत की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जिस समय वसीयत बनाई गई थी, उस समय उनके पिता मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं थे।
उन्होंने अदालत को बताया कि उनके पिता कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे, जिनमें कानूनी रूप से दृष्टिहीनता, डिमेंशिया और पार्किंसंस जैसी बीमारियां शामिल थीं। इन बीमारियों के कारण उनकी स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो चुकी थी।
पद्मजा ने यह भी आरोप लगाया कि उनके भाई ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए पिता पर अनुचित दबाव डाला और इसी दबाव के तहत यह वसीयत तैयार करवाई गई। उन्होंने दावा किया कि उस समय उनके पिता को लगातार निगरानी में रखा जा रहा था और उन्हें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की स्थिति में नहीं छोड़ा गया था।
उनका कहना था कि ऐसी परिस्थितियों में बनाई गई वसीयत को वैध नहीं माना जा सकता और इसे अदालत द्वारा जांचा जाना चाहिए।
अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न
इस मामले में अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी व्यक्ति की संपत्ति के संबंध में ‘बिना वसीयत’ के आधार पर ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ की मांग तब भी की जा सकती है, जब उसी संपत्ति को लेकर एक वसीयत पहले से ही अदालत में प्रस्तुत की जा चुकी हो और उसकी वैधता पर विचार चल रहा हो।
दूसरे शब्दों में, अदालत को यह तय करना था कि क्या एक ही संपत्ति को लेकर दो अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियां—एक वसीयत के आधार पर और दूसरी बिना वसीयत के आधार पर—समानांतर रूप से चल सकती हैं या नहीं।
दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत जब किसी वसीयत के साथ ‘लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन’ या प्रोबेट के लिए याचिका दायर की जाती है, तो उस वसीयत की वैधता से जुड़ा विवाद उसी कार्यवाही के भीतर तय किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि यदि किसी वसीयत को अदालत में प्रस्तुत किया जा चुका है और उसे वैध साबित करने की प्रक्रिया चल रही है, तो उस दौरान यह मानकर कि मृतक ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी, अलग से कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि ‘इंटेस्टेट उत्तराधिकार’ यानी बिना वसीयत के उत्तराधिकार की प्रक्रिया तभी लागू होती है, जब यह स्पष्ट हो जाए कि कोई वैध वसीयत मौजूद नहीं है। लेकिन यदि वसीयत की मौजूदगी का दावा किया गया है और उसकी वैधता पर न्यायिक परीक्षण होना बाकी है, तो पहले उसी प्रश्न का समाधान किया जाना आवश्यक है।
याचिका खारिज, लेकिन दलीलें रखने की अनुमति
हालांकि अदालत ने पद्मजा कुमारी परमार की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन उन्हें पूरी तरह से राहत से वंचित नहीं किया गया। अदालत ने उन्हें यह अनुमति दी कि वे अपने भाई द्वारा पेश की गई वसीयत को चुनौती देने वाली अपनी दलीलें उसी मामले में पेश कर सकती हैं, जिसमें वसीयत की वैधता पर विचार किया जा रहा है।
इसका मतलब यह है कि पद्मजा अब यह साबित करने की कोशिश कर सकती हैं कि वसीयत संदिग्ध परिस्थितियों में बनाई गई थी या उस समय उनके पिता मानसिक रूप से सक्षम नहीं थे।
इस मामले में आगे की सुनवाई 4 मई 2026 को तय की गई है।
प्रक्रियात्मक टकराव का समाधान
इस फैसले के साथ ही मेवाड़ परिवार के भीतर चल रही दो अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियों के बीच पैदा हुए प्रक्रियात्मक टकराव का भी समाधान हो गया। पहले एक तरफ वसीयत को वैध साबित करने की कार्यवाही चल रही थी, जबकि दूसरी ओर ‘बिना वसीयत’ के आधार पर संपत्ति के प्रशासन की मांग की जा रही थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में समानांतर कार्यवाहियां न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बना सकती हैं। इसलिए पहले यह तय होना जरूरी है कि वसीयत वैध है या नहीं।
यदि अदालत यह पाती है कि वसीयत वैध है, तो उसी के अनुसार संपत्ति का वितरण होगा। लेकिन यदि वसीयत अमान्य पाई जाती है, तब ‘इंटेस्टेट उत्तराधिकार’ के नियम लागू होंगे।
फैसले का व्यापक महत्व
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला केवल मेवाड़ परिवार के विवाद तक सीमित नहीं है। यह उन सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जहां किसी मृतक की संपत्ति को लेकर वसीयत की वैधता पर विवाद उठता है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब वसीयत की मौजूदगी और उसकी वैधता पर सवाल उठाया जाता है, तो सबसे पहले उसी प्रश्न का निपटारा किया जाना चाहिए। इसके बाद ही अन्य उत्तराधिकार संबंधी दावों पर विचार किया जा सकता है।
यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और समानांतर मुकदमों से बचने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निष्कर्ष
मेवाड़ राजपरिवार की इस संपत्ति विवाद ने एक बार फिर यह दिखाया है कि पारिवारिक संपत्ति और वसीयत से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया कितनी जटिल हो सकती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि जब वसीयत का प्रश्न अदालत के सामने हो, तब ‘बिना वसीयत’ के आधार पर समानांतर दावा नहीं किया जा सकता।
अब इस मामले का अगला चरण उस वसीयत की वैधता तय करने से जुड़ा होगा, जिसे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने पेश किया है। यदि अदालत उस वसीयत को वैध मानती है, तो संपत्ति उसी के अनुसार हस्तांतरित होगी। लेकिन यदि वसीयत संदिग्ध या अवैध पाई जाती है, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के नियमों के अनुसार सभी कानूनी वारिसों के बीच संपत्ति का बंटवारा किया जा सकता है।
इस प्रकार, यह मामला न केवल मेवाड़ परिवार के लिए बल्कि उत्तराधिकार कानून के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।