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महाराष्ट्र में मुकदमों की देरी पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘अभियोजन की कार्यप्रणाली चिंताजनक’

महाराष्ट्र में मुकदमों की देरी पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘अभियोजन की कार्यप्रणाली चिंताजनक’

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में मुकदमों के लंबित रहने और सुनवाई में अत्यधिक देरी को लेकर एक बार फिर Supreme Court of India ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से Maharashtra में आपराधिक मुकदमों के संचालन में हो रही “समझ से बाहर और भारी देरी” पर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य के अभियोजन तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Ahsanuddin Amanullah और न्यायमूर्ति R. Mahadevan की पीठ ने की। अदालत एक जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुकदमे की प्रगति को लेकर गंभीर सवाल उठे।


केवल एक गवाह की गवाही, छह साल से लंबित मामला

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मामले में एफआईआर जून 2019 में दर्ज हुई थी, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी मुकदमे में केवल एक गवाह की ही गवाही हो पाई है।

इस स्थिति पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अभियोजन पक्ष के कामकाज के बारे में बहुत कुछ बताता है। अदालत ने टिप्पणी की कि मुकदमे की प्रक्रिया इतनी धीमी होना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में न्याय तभी सार्थक होता है जब वह समय पर दिया जाए। यदि मुकदमे वर्षों तक लंबित रहते हैं, तो इससे न केवल आरोपी बल्कि पीड़ित और पूरे न्यायिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


नासिक पुलिस कमिश्नर से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने Nashik के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा दाखिल करें।

अदालत ने कहा कि हलफनामे में विस्तार से यह बताया जाए कि आखिर किन परिस्थितियों के कारण मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाई। इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि देरी के लिए जिम्मेदार कारकों और प्रत्येक आरोपी की भूमिका का भी स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल 2026 के लिए निर्धारित की है।


बार-बार उठ चुका है देरी का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में मुकदमों में हो रही देरी अदालत के सामने आई है।

इससे पहले भी कई मामलों में अदालत ने राज्य की आपराधिक अदालतों की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने एक अवसर पर इसे “चौंकाने वाली स्थिति” बताते हुए कहा था कि सैकड़ों मामले केवल आरोप तय होने के चरण पर ही वर्षों से लंबित पड़े हैं।

कुछ मामलों में तो आरोप तय होने की प्रक्रिया ही 2006 से लंबित बताई गई थी, जो न्याय प्रणाली की गंभीर समस्या को दर्शाता है।


चार साल तक बिना आरोप तय हुए हिरासत का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक ऐसे मामले में भी नाराज़गी जताई थी जिसमें एक विचाराधीन कैदी लगभग चार वर्षों तक हिरासत में रहा, जबकि उसके खिलाफ आरोप तक तय नहीं किए गए थे।

अदालत ने कहा कि इस प्रकार की स्थिति संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत है।

इस मामले में अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश भी जारी किए थे कि आरोपियों को समय पर अदालत में पेश किया जाए और उनकी अनुपस्थिति के कारण मुकदमों में अनावश्यक देरी न हो।


विशेष कानूनों के तहत मामलों में भी देरी

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों में भी इसी प्रकार की देरी देखने को मिल रही है।

विशेष रूप से Maharashtra Control of Organised Crime Act (MCOCA) और Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) जैसे कठोर कानूनों के तहत दर्ज मामलों में मुकदमों की लंबी अवधि तक लंबित रहने की समस्या सामने आई है।

अदालत ने कहा कि इन कानूनों के तहत दर्ज मामलों में आरोपी अक्सर लंबे समय तक हिरासत में रहते हैं, इसलिए मुकदमों का समय पर निपटारा होना अत्यंत आवश्यक है।


विशेष अदालतों की आवश्यकता पर जोर

मुकदमों की धीमी गति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे मामलों के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए।

अदालत का मानना है कि यदि विशेष अदालतें बनाई जाएं और उन्हें पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो मुकदमों की सुनवाई तेज़ी से की जा सकती है।

इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया तेज होगी बल्कि आरोपी और पीड़ित दोनों को समय पर न्याय मिल सकेगा।


मामले का शीर्षक

यह मामला Parmendra @ Gauravsing Rajendra Sinha v. State of Maharashtra से संबंधित है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए मुकदमे में देरी के मुद्दे को गंभीरता से उठाया है।


न्यायिक प्रणाली के लिए गंभीर संदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे आपराधिक न्याय तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है।

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि मुकदमों में अनावश्यक देरी होती है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों से जवाबदेही तय की जाएगी।


निष्कर्ष

Supreme Court of India की यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मुकदमों में अत्यधिक देरी न्याय के सिद्धांत के विपरीत है और इसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

महाराष्ट्र में मुकदमों की धीमी गति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी भविष्य में न्यायिक और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।