वित्तीय कठिनाइयों का बहाना बनाकर भरण-पोषण से नहीं बच सकता पति: दिल्ली हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
परिवारिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्णय में Delhi High Court ने स्पष्ट किया है कि नौकरी छूट जाना, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, कर्ज या अन्य वित्तीय कठिनाइयां पति को अपने आश्रितों के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकतीं, खासकर तब जब उसके पास पहले पर्याप्त आय क्षमता मौजूद रही हो। अदालत ने कहा कि पति की आर्थिक समस्याएं उस अवधि के लिए भरण-पोषण देने से इनकार करने का वैध आधार नहीं बन सकतीं, जब उसके पास पर्याप्त कमाई की क्षमता थी।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति Swarna Kanta Sharma की एकल पीठ ने की। अदालत एक महिला और उसकी दो बेटियों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पारिवारिक अदालत के एक आदेश को चुनौती दी गई थी।
फैमिली कोर्ट के आदेश को दी गई थी चुनौती
मामले में पत्नी ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे और उसकी दो बेटियों को अंतरिम भरण-पोषण तो दिया गया था, लेकिन भुगतान की शुरुआत याचिका दायर करने की तारीख से न करके काफी बाद की तारीख से तय की गई थी।
पारिवारिक अदालत ने Section 125 of the Code of Criminal Procedure के तहत दिए गए आदेश में पति को हर महीने 5,500 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था। हालांकि अदालत ने यह भी कहा था कि यह भुगतान मार्च 2016 में याचिका दाखिल करने की तारीख से न होकर 1 जनवरी 2019 से लागू होगा।
पत्नी को अदालत के आदेश का यही हिस्सा अनुचित लगा और उसने इसे चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
पति-पत्नी के संबंधों की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार महिला और उसके पति का विवाह वर्ष 2001 में हुआ था। इस विवाह से उनकी दो बेटियां भी हैं। समय के साथ पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ने लगे और अंततः दोनों अलग-अलग रहने लगे।
साल 2016 में महिला ने अदालत में आवेदन दाखिल कर अपने और अपनी दोनों नाबालिग बेटियों के लिए भरण-पोषण की मांग की। महिला का कहना था कि पति के पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन होने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर दिया।
पति पर लगाए गए आरोप
महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पति के पास पर्याप्त आय और संसाधन होने के बावजूद उसने पत्नी और बेटियों की आवश्यकताओं की अनदेखी की। उसने यह भी कहा कि पति ने जानबूझकर भरण-पोषण देने से इंकार किया, जिससे उसे और उसकी बेटियों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
महिला ने अदालत से अनुरोध किया कि उसे और उसकी बेटियों को भरण-पोषण उस तारीख से दिया जाए, जब उसने पहली बार अदालत में याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए Delhi High Court ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी और बच्चों को जीवन की आवश्यक जरूरतों के लिए आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
अदालत ने कहा कि यदि पति के पास किसी समय पर्याप्त आय या आय अर्जित करने की क्षमता थी, तो वह बाद में आई वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर उस अवधि के लिए भरण-पोषण देने से नहीं बच सकता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय लेन-देन से जुड़े विवाद या आर्थिक संकट भी पति को अपने आश्रितों के प्रति वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करते।
भरण-पोषण का अधिकार और कानूनी दायित्व
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि Section 125 of the Code of Criminal Procedure का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों—विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों—को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है।
यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने आश्रितों की देखभाल करने में सक्षम होते हुए भी उन्हें छोड़ देता है, तो अदालत उसे भरण-पोषण देने का आदेश दे सकती है।
अदालत ने कहा कि इस प्रावधान की व्याख्या हमेशा ऐसे तरीके से की जानी चाहिए जिससे पत्नी और बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
2016 से भरण-पोषण देने का आदेश
मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने पारिवारिक अदालत के आदेश में संशोधन किया।
अदालत ने निर्देश दिया कि पत्नी और उसकी बेटियों को भरण-पोषण 2016 से दिया जाएगा, यानी उसी समय से जब महिला ने अदालत में याचिका दायर की थी।
इस प्रकार अदालत ने महिला की अपील को स्वीकार करते हुए उसे और उसकी बेटियों को आर्थिक राहत प्रदान की।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है।
इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि पति अपनी वित्तीय समस्याओं का हवाला देकर पत्नी और बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता, खासकर तब जब उसके पास पहले पर्याप्त आय या आय अर्जित करने की क्षमता रही हो।
निष्कर्ष
Delhi High Court का यह फैसला महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आर्थिक कठिनाइयां पति को अपने आश्रितों के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकतीं।
यह निर्णय न केवल भरण-पोषण कानून की व्याख्या को मजबूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि पत्नी और बच्चों को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से समय पर आर्थिक सहायता मिल सके।