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इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: सहमति से बने लंबे रिश्ते को हर हाल में ‘रेप’ नहीं माना जा सकता

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: सहमति से बने लंबे रिश्ते को हर हाल में ‘रेप’ नहीं माना जा सकता

Allahabad High Court ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने हों, तो केवल रिश्ते के टूटने या शादी का वादा पूरा न होने के आधार पर उसे बलात्कार का मामला नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आपराधिक कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और न्यायिक प्रणाली को इस तरह के विवादों से बचाने की आवश्यकता है।

यह फैसला रामपुर जिले के निवासी अजय सैनी के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले में सुनाया गया। न्यायमूर्ति Avnish Saxena की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद आरोपी के खिलाफ निचली अदालत में लंबित आरोप पत्र और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच संबंध लंबे समय तक सहमति से चले थे और बाद में संबंध टूटने के बाद उसे आपराधिक स्वरूप देने की कोशिश की गई।


मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, वर्ष 2024 में एक युवती ने अजय सैनी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उसने वर्ष 2019 में नौकरी दिलाने के बहाने उसे मुरादाबाद ले जाकर नशीला पदार्थ पिलाया और उसके साथ दुष्कर्म किया।

पीड़िता का आरोप था कि इसके बाद आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया और उसी बहाने चार वर्षों तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में जब उसे पता चला कि आरोपी किसी अन्य महिला से विवाह करने जा रहा है, तब उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

इस शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया और जांच के बाद आरोप पत्र अदालत में दाखिल कर दिया गया।

इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।


पीड़िता के बयानों में विरोधाभास

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़िता के बयानों और रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद हैं।

एफआईआर में जहां यह कहा गया था कि आरोपी ने होटल के कमरे में नशीला पदार्थ पिलाकर दुष्कर्म किया, वहीं बाद के बयानों में यह कहा गया कि उसे रेस्टोरेंट में नशीला पदार्थ दिया गया था।

अदालत ने यह भी गौर किया कि कथित घटना के बाद पीड़िता ने लंबे समय तक किसी भी मंच पर शिकायत नहीं की। चार वर्षों तक संबंध जारी रहने के बावजूद उसने न तो पुलिस में शिकायत की और न ही किसी अन्य प्राधिकरण के समक्ष मामला उठाया।

इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने कहा कि मामले की परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि दोनों पक्षों के बीच संबंध सहमति से बने थे।


सहमति और धोखाधड़ी के बीच अंतर

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सहमति से बने संबंध और धोखाधड़ी या जबरदस्ती से बने संबंधों में स्पष्ट अंतर होता है।

यदि कोई व्यक्ति शुरू से ही शादी करने के इरादे से संबंध बनाता है और बाद में परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो पाता, तो इसे हमेशा धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

लेकिन यदि यह साबित हो कि आरोपी ने शुरू से ही झूठा वादा करके महिला को शारीरिक संबंध के लिए तैयार किया था, तो वह अलग स्थिति होगी और उसे आपराधिक कृत्य माना जा सकता है।

इस मामले में अदालत को ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखाधड़ी के उद्देश्य से संबंध बनाए थे।


चार वर्षों तक संबंध बने रहने पर अदालत की टिप्पणी

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बीच चार वर्षों तक संबंध बने रहे। यदि संबंध पूरी तरह से जबरदस्ती या धोखे पर आधारित होते, तो इतनी लंबी अवधि तक उनका जारी रहना असामान्य प्रतीत होता।

न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार के मामलों में अदालत को पूरे घटनाक्रम और परिस्थितियों का व्यापक मूल्यांकन करना होता है।

केवल इस आधार पर कि विवाह नहीं हुआ या संबंध समाप्त हो गया, किसी व्यक्ति को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध के आरोप में घसीटना उचित नहीं माना जा सकता।


आपराधिक कानून के दुरुपयोग पर चिंता

अदालत ने अपने फैसले में आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग पर भी चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध की धाराओं का इस्तेमाल केवल उन मामलों में होना चाहिए जहां वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती या स्पष्ट धोखाधड़ी के प्रमाण मौजूद हों।

यदि हर असफल या टूटे रिश्ते को दुष्कर्म का मामला बना दिया जाए तो इससे न केवल कानून की गंभीरता कम होती है बल्कि न्यायिक व्यवस्था पर भी अनावश्यक दबाव बढ़ता है।


‘हर असफल रिश्ता रेप नहीं’

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि हर असफल या टूटे रिश्ते को दुष्कर्म का मामला बना देना उचित नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी को सामाजिक रूप से गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है। एक बार दुष्कर्म का आरोप लग जाने के बाद व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य पर गहरा असर पड़ता है।

इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए और तथ्यों का गहन विश्लेषण करना चाहिए।


निचली अदालत की कार्यवाही रद्द

सभी तथ्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद अदालत ने आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए रामपुर की निचली अदालत में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला दुष्कर्म के अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए इस मामले को आगे चलाने का कोई औचित्य नहीं है।


कानूनी दृष्टि से फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा सकता है जहां विवाह के वादे के आधार पर बाद में दुष्कर्म के आरोप लगाए जाते हैं।

अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले में परिस्थितियों, साक्ष्यों और दोनों पक्षों के व्यवहार का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।

यदि यह साबित होता है कि संबंध पूरी तरह से सहमति से बने थे, तो बाद में रिश्ते के टूटने को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।


निष्कर्ष

Allahabad High Court का यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध के प्रावधानों का उपयोग केवल वास्तविक अपराधों के मामलों में ही होना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि व्यक्तिगत विवादों या असफल रिश्तों को आपराधिक मुकदमों में बदलना। इस निर्णय से यह संदेश जाता है कि अदालतें ऐसे मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों का संतुलित और गहन विश्लेषण करने के बाद ही निर्णय देती हैं।