दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: सेलिना जेटली के भाई विक्रांत जेटली की यूएई हिरासत मामले में याचिका बंद, कानूनी सहायता जारी रखने के निर्देश
विदेश में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और कानूनी अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में Delhi High Court ने अभिनेत्री Celina Jaitly के भाई विक्रांत जेटली की संयुक्त अरब अमीरात में हिरासत से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए कार्यवाही समाप्त कर दी है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह विक्रांत जेटली को उपलब्ध राजनयिक और कानूनी सहायता जारी रखे तथा उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखे।
यह आदेश न्यायमूर्ति Purushaindra Kumar Kaurav की एकल पीठ ने पारित किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि भारत सरकार और विदेश मंत्रालय के माध्यम से अबू धाबी स्थित भारतीय दूतावास लगातार विक्रांत जेटली के संपर्क में है और उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे में इस मामले में रिट याचिका को लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं बनता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तब सामने आया जब अभिनेत्री सेलिना जेटली ने अपने भाई विक्रांत जेटली के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिका में दावा किया गया था कि विक्रांत जेटली, जो भारतीय सेना से सेवानिवृत्त मेजर हैं, को 6 सितंबर 2024 को संयुक्त अरब अमीरात में कथित रूप से अवैध रूप से अगवा कर हिरासत में ले लिया गया था।
याचिका में यह भी कहा गया था कि हिरासत में लिए जाने के बाद उनके पास पर्याप्त कानूनी प्रतिनिधित्व उपलब्ध नहीं था और भारतीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें उचित कानूनी सहायता और राजनयिक संरक्षण मिले।
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि वह केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय को निर्देश दे कि वे यूएई में हिरासत में लिए गए विक्रांत जेटली की स्थिति पर हस्तक्षेप करें और उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।
भारतीय दूतावास की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि अबू धाबी स्थित भारतीय दूतावास विक्रांत जेटली से नियमित रूप से संपर्क बनाए हुए है।
अदालत को बताया गया कि गिरफ्तारी के बाद से भारतीय दूतावास के अधिकारी उनसे नौ बार मिल चुके हैं। इन मुलाकातों के दौरान उनकी स्थिति, स्वास्थ्य और कानूनी सहायता की आवश्यकताओं के बारे में जानकारी ली गई।
अदालत ने माना कि यह दर्शाता है कि भारत सरकार अपने नागरिक की सहायता के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार इस मामले में निष्क्रिय है।
कानूनी प्रतिनिधित्व पर विक्रांत जेटली की राय
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह भी जानकारी आई कि विक्रांत जेटली ने स्वयं कहा है कि उनके कानूनी प्रतिनिधित्व से जुड़ा निर्णय उनकी बहन नहीं बल्कि उनकी पत्नी को लेना चाहिए।
इस पर अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि ऐसे में उनके पास इस मामले को आगे बढ़ाने का अधिकार किस आधार पर है। अदालत ने संकेत दिया कि जब स्वयं हिरासत में लिया गया व्यक्ति अपने कानूनी प्रतिनिधित्व के बारे में स्पष्ट राय दे चुका है, तब इस याचिका को आगे जारी रखने का औचित्य कम हो जाता है।
अदालत का आदेश: याचिका समाप्त, सहायता जारी
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट है कि विदेश मंत्रालय और संबंधित भारतीय प्राधिकरण लगातार विक्रांत जेटली के संपर्क में हैं और उन्हें आवश्यक राजनयिक पहुंच भी प्रदान की जा रही है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब सरकार सक्रिय रूप से सहायता प्रदान कर रही है, तब रिट याचिका को लंबित रखने का कोई कारण नहीं है। इसलिए अदालत ने इस याचिका का निपटारा करते हुए कार्यवाही समाप्त कर दी।
हालांकि अदालत ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह विक्रांत जेटली के संपर्क में बनी रहे और कानून के तहत उपलब्ध सभी प्रकार की कानूनी सहायता प्रदान करती रहे।
विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी पर जोर
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेश में किसी भारतीय नागरिक के हिरासत में होने की स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह उसकी स्थिति पर नजर रखे और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराए।
इस संदर्भ में अदालत ने कहा कि भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विक्रांत जेटली के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कानूनी अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय प्राधिकरणों को समय-समय पर उनसे संपर्क बनाए रखना चाहिए ताकि किसी भी समस्या की स्थिति में तुरंत सहायता प्रदान की जा सके।
विदेशों में भारतीय नागरिकों के अधिकार
यह मामला एक बार फिर इस प्रश्न को सामने लाता है कि जब कोई भारतीय नागरिक विदेश में कानूनी समस्या में फंस जाता है तो भारत सरकार की भूमिका क्या होती है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रथाओं के अनुसार किसी भी देश का दूतावास अपने नागरिकों को बुनियादी सहायता प्रदान करता है। इसमें कानूनी सहायता के बारे में जानकारी देना, स्थानीय वकील उपलब्ध कराने में मदद करना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्थिति पर नजर रखना शामिल होता है।
हालांकि दूतावास सीधे किसी देश की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन वह यह सुनिश्चित करता है कि उस देश के कानूनों के अनुसार संबंधित व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह फैसला न्यायिक संतुलन का उदाहरण है। अदालत ने एक ओर यह सुनिश्चित किया कि भारतीय नागरिक को सहायता मिलती रहे, वहीं दूसरी ओर यह भी देखा कि जब सरकार पहले से सक्रिय है तो मामले को अनावश्यक रूप से लंबित रखना उचित नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले से यह संदेश जाता है कि अदालतें विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों के अधिकारों को लेकर संवेदनशील हैं, लेकिन वे प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सम्मान भी करती हैं।
सेलिना जेटली की चिंता
इस मामले में अभिनेत्री सेलिना जेटली ने अपने भाई की सुरक्षा और कानूनी सहायता को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने अदालत में कहा था कि परिवार को उनके भाई की स्थिति को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं मिल रही थी।
याचिका के माध्यम से उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भारतीय सरकार उनके भाई की मदद के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाए।
हालांकि अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन सरकार को सहायता जारी रखने के निर्देश देकर यह सुनिश्चित किया कि विक्रांत जेटली को आवश्यक सहयोग मिलता रहे।
निष्कर्ष
Delhi High Court के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विदेश में किसी भारतीय नागरिक की हिरासत के मामलों में अदालतें स्थिति की गंभीरता को समझते हुए संतुलित निर्णय लेती हैं।
अदालत ने एक ओर याचिका को समाप्त किया, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह विक्रांत जेटली के संपर्क में बनी रहे और उन्हें उपलब्ध कानूनी सहायता जारी रखे।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सहायता के लिए भारतीय दूतावास और सरकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, और आवश्यकता पड़ने पर अदालतें भी इस प्रक्रिया की निगरानी कर सकती हैं।