एक ही FIR से जुड़ी अगली ज़मानत अर्जियों की सुनवाई आम तौर पर उसी जज को करनी चाहिए: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ही FIR से संबंधित अगली ज़मानत अर्जियों को सामान्यतः उसी जज या बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाना चाहिए, जिसने आरोपी की पिछली ज़मानत अर्जी पर फैसला दिया था। अदालत ने कहा कि ऐसा करने का उद्देश्य अलग-अलग बेंचों द्वारा दिए जाने वाले परस्पर विरोधी या असंगत आदेशों से बचना है।
यह टिप्पणी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने उस समय की, जब वह भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कुछ धाराओं के तहत दर्ज एक FIR से जुड़े मामले में आरोपी की नियमित ज़मानत अर्जी पर सुनवाई कर रही थीं।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि अदालत की रजिस्ट्री सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों के अनुसार, यदि किसी आरोपी की ज़मानत अर्जी पहले किसी जज ने खारिज की है और वही जज अभी भी आपराधिक मामलों की सुनवाई के रोस्टर में हैं, तो उसी FIR से जुड़ी अगली ज़मानत अर्जी—चाहे वह अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) हो या नियमित ज़मानत (Regular Bail)—आम तौर पर उसी जज के सामने लिस्ट की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था न्यायिक अनुशासन और आदेशों की एकरूपता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
किस मामले में आई यह टिप्पणी
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई जिसमें आरोपी ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80(2), 85 और 3(5) के तहत दर्ज FIR के संबंध में नियमित ज़मानत अर्जी दायर की थी।
सुनवाई की शुरुआत में ही आरोपी के वकील ने अदालत को बताया कि आरोपी ने पहले अग्रिम ज़मानत अर्जी दायर की थी, जिसे इसी बेंच ने 31 अक्टूबर 2025 को मामले के गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया था।
इसी आधार पर वकील ने अनुरोध किया कि वर्तमान नियमित ज़मानत अर्जी को किसी दूसरी बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए।
आरोपी के वकील का तर्क
आरोपी के वकील ने अदालत के सामने यह दलील दी कि चूंकि कोर्ट पहले ही मामले के गुण-दोष पर अपनी राय व्यक्त कर चुका है, इसलिए संभव है कि वही अदालत अब नियमित ज़मानत देने के पक्ष में न हो।
वकील का कहना था कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए बेहतर होगा कि मामले की सुनवाई किसी दूसरी बेंच के सामने की जाए।
राज्य सरकार का विरोध
इस अनुरोध का राज्य सरकार की ओर से विरोध किया गया। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि एक ही FIR से जुड़े मामलों की अगली ज़मानत अर्जियों को उसी जज के सामने सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार का तर्क था कि यदि ऐसे मामलों को अलग-अलग बेंचों के सामने भेजने की अनुमति दी जाती है, तो इससे मुकदमेबाज़ों को “फोरम शॉपिंग” (अपने पक्ष में आदेश पाने की उम्मीद में अलग-अलग अदालतों या बेंचों के सामने जाना) का अवसर मिल जाएगा।
अभियोजन पक्ष के अनुसार यह न्यायिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लेख
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि एक ही FIR से जुड़े मामलों—विशेषकर ज़मानत अर्जियों—को उसी जज के सामने सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से:
- परस्पर विरोधी आदेशों से बचा जा सकता है
- न्यायिक प्रक्रिया में स्थिरता बनी रहती है
- मुकदमेबाज़ों द्वारा अलग-अलग बेंचों के सामने जाने की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री मामलों को सूचीबद्ध करते समय इन निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हालांकि अदालत ने आरोपी के वकील की दलील को स्वीकार नहीं किया, लेकिन यह भी कहा कि यदि वकील को लगता है कि मामले को किसी दूसरी बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, तो वह कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी कदम उठा सकते हैं।
अदालत ने कहा कि यदि वकील का यह मानना है कि उन्हें इस बेंच से ज़मानत मिलने की संभावना नहीं है, तो वे कानून के अनुसार उचित उपाय अपना सकते हैं।
न्यायिक व्यवस्था में इस सिद्धांत का महत्व
अदालत की यह टिप्पणी न्यायिक प्रणाली के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करती है—न्यायिक अनुशासन और आदेशों की निरंतरता।
यदि एक ही FIR से जुड़े मामलों की सुनवाई अलग-अलग बेंचों के सामने होती रहे, तो कई बार अलग-अलग आदेश सामने आ सकते हैं, जिससे कानूनी भ्रम पैदा हो सकता है।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि संबंधित मामलों की सुनवाई यथासंभव उसी जज के सामने होनी चाहिए जिसने पहले आदेश दिया था।
फोरम शॉपिंग रोकने का उद्देश्य
अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य फोरम शॉपिंग की प्रवृत्ति को रोकना भी है।
फोरम शॉपिंग का मतलब है कि कोई पक्षकार अपने पक्ष में अनुकूल आदेश पाने के लिए अलग-अलग अदालतों या बेंचों के सामने याचिकाएं दायर करता है।
यदि इस तरह की प्रवृत्ति को अनुमति दी जाए तो न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
मामले की अगली सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 15 अप्रैल को सूचीबद्ध किया है। उस दिन अदालत आरोपी की नियमित ज़मानत अर्जी पर आगे की सुनवाई करेगी।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ज़मानत से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक ही FIR से जुड़े मामलों को आम तौर पर उसी जज के सामने सुनना न्यायिक अनुशासन और आदेशों की एकरूपता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
यह सिद्धांत न केवल विरोधाभासी आदेशों को रोकने में मदद करता है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था में विश्वास और स्थिरता को भी मजबूत करता है।