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पति की आय के एक चौथाई से अधिक गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की पुनरीक्षण याचिका खारिज की

पति की आय के एक चौथाई से अधिक गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की पुनरीक्षण याचिका खारिज की

परिवारिक विवादों में गुजारा भत्ता (Maintenance) का मुद्दा अक्सर न्यायालयों के सामने आता रहता है। ऐसे मामलों में अदालत को पति की आय, पत्नी की जरूरतों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय देना होता है। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि परिवार न्यायालय द्वारा तय किया गया गुजारा भत्ता उपलब्ध तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप है, तो उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर के परिवार न्यायालय द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखते हुए पत्नी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पति की आय को देखते हुए दो हजार रुपये प्रतिमाह का गुजारा भत्ता उचित और यथार्थवादी है।

मामला क्या था

यह मामला मुजफ्फरनगर जिले से संबंधित है, जहां परिवार न्यायालय ने 14 फरवरी 2025 को पत्नी के पक्ष में गुजारा भत्ता तय किया था। पत्नी नीता त्यागी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि परिवार न्यायालय द्वारा निर्धारित दो हजार रुपये प्रतिमाह का गुजारा भत्ता बहुत कम है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।

याची की ओर से यह भी दलील दी गई कि पहले परिवार न्यायालय ने अंतरिम गुजारा भत्ते के रूप में तीन हजार रुपये प्रतिमाह तय किया था। ऐसे में अंतिम आदेश में दो हजार रुपये तय करना न्यायसंगत नहीं है।

पत्नी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पति के पास लगभग 40 बीघा कृषि भूमि है और वह उससे पर्याप्त आय अर्जित करता है। इसलिए गुजारा भत्ते की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।

हाईकोर्ट में क्या हुआ

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड, प्रस्तुत साक्ष्यों और निचली अदालत के आदेश का गहन परीक्षण किया।

कोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय ने गुजारा भत्ता तय करते समय कई महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखा था। रिकॉर्ड के अनुसार प्रतिवादी पति अमित कुमार त्यागी वर्ष 2017 में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। इस दुर्घटना के कारण उसकी शारीरिक स्थिति प्रभावित हुई।

इसके बाद वह अपने पिता की मेडिकल दुकान पर काम करता है, जहां से उसे लगभग पांच हजार रुपये प्रतिमाह की आय होती है। अदालत ने कहा कि यह तथ्य रिकॉर्ड में मौजूद है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कृषि भूमि के दावे पर अदालत की टिप्पणी

पत्नी की ओर से यह दावा किया गया था कि पति के पास 40 बीघा कृषि भूमि है और उससे उसकी अच्छी आय होती है। हालांकि अदालत ने पाया कि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप या मौखिक दावे के आधार पर आय का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यदि किसी पक्ष द्वारा यह कहा जाता है कि प्रतिवादी के पास कृषि भूमि है या उससे आय होती है, तो इसके लिए राजस्व अभिलेख, खतौनी या अन्य दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक होता है।

चूंकि पत्नी की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए अदालत ने इस दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया। इनमें पहला मामला “रजनेश बनाम नेहा” और दूसरा “कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी” का है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में गुजारा भत्ता तय करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। इनमें पति-पत्नी की आय, उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर, आश्रित व्यक्तियों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखने की बात कही गई है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि गुजारा भत्ता ऐसा होना चाहिए जिससे पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने में मदद मिले, लेकिन यह पति की आय के अनुपात से पूरी तरह असंगत भी नहीं होना चाहिए।

आय का 25 प्रतिशत सिद्धांत

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में यह सिद्धांत भी सामने आया है कि सामान्य परिस्थितियों में पति की आय का लगभग 25 प्रतिशत गुजारा भत्ते के रूप में उचित माना जा सकता है।

इस मामले में अदालत ने पाया कि पति की कुल मासिक आय लगभग पांच हजार रुपये है। यदि इसका 25 प्रतिशत निकाला जाए तो यह लगभग 1250 रुपये प्रतिमाह बनता है।

ऐसी स्थिति में परिवार न्यायालय द्वारा तय किया गया दो हजार रुपये प्रतिमाह का गुजारा भत्ता पहले से ही 25 प्रतिशत से अधिक है। इसलिए इसे अनुचित या बहुत कम नहीं कहा जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब निचली अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय लिया है, तब हाईकोर्ट को उसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।

पुनरीक्षण याचिका पर अदालत का दृष्टिकोण

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) का उद्देश्य निचली अदालत के हर आदेश की पुनः सुनवाई करना नहीं होता। पुनरीक्षण तभी स्वीकार किया जाता है जब आदेश में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि, प्रक्रिया संबंधी गलती या न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन दिखाई दे।

इस मामले में अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि परिवार न्यायालय ने कानून या तथ्यों की गलत व्याख्या की है।

अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पति की आय, उसकी शारीरिक स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए गुजारा भत्ता तय किया है। इसलिए उसके आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं बनता।

सामाजिक और कानूनी संतुलन की आवश्यकता

गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में अदालतों को अक्सर बहुत सावधानी से संतुलन बनाना पड़ता है। एक ओर यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि पत्नी आर्थिक रूप से असहाय न रहे और उसे सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त सहायता मिले।

दूसरी ओर यह भी देखा जाता है कि पति की वास्तविक आय और आर्थिक क्षमता क्या है। यदि पति की आय सीमित है, तो उससे अत्यधिक गुजारा भत्ता तय करना भी न्यायसंगत नहीं माना जाता।

इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर अलग-अलग निर्णय देती हैं।

निर्णय का महत्व

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय इस बात को स्पष्ट करता है कि गुजारा भत्ता तय करते समय केवल आरोपों या अनुमान के आधार पर आय का आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है।

साथ ही यह फैसला यह भी दर्शाता है कि यदि निचली अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है, तो उच्च न्यायालय सामान्यतः उसमें हस्तक्षेप नहीं करता।

निष्कर्ष

अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि पति की आय, उसकी शारीरिक स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए दो हजार रुपये प्रतिमाह का गुजारा भत्ता उचित है।

यह फैसला गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में साक्ष्यों के महत्व और न्यायालयों द्वारा अपनाए जाने वाले संतुलित दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि अदालतें केवल दावों के आधार पर नहीं बल्कि ठोस तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर ही निर्णय देती हैं।