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गंगा के फ्लडप्लेन पर अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त:

गंगा के फ्लडप्लेन पर अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सभी राज्यों से मांगी विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट

भारत की सबसे पवित्र और ऐतिहासिक नदियों में शामिल गंगा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा भी है। गंगा नदी का महत्व पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, कृषि और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। हालांकि पिछले कई दशकों में नदी के किनारों और उसके बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) पर तेजी से बढ़ते अतिक्रमण ने इसकी प्राकृतिक संरचना और पारिस्थितिकी तंत्र के सामने गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाते हुए गंगा नदी के किनारों और फ्लडप्लेन पर हो रहे अतिक्रमण की स्थिति पर पूरे देश से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब अदालत पटना (बिहार) में गंगा के फ्लडप्लेन पर अवैध निर्माण से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच कर रही थी। अदालत ने केंद्र सरकार, बिहार सरकार और उन सभी राज्यों को निर्देश दिया है जिनसे होकर गंगा नदी गुजरती है कि वे गंगा के किनारों पर हो रहे अतिक्रमण की मौजूदा स्थिति, उन्हें हटाने के लिए किए गए प्रयासों और भविष्य की योजना के बारे में विस्तृत जानकारी कोर्ट के सामने प्रस्तुत करें।

कई राज्यों को जारी किया गया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल बिहार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे व्यापक राष्ट्रीय समस्या के रूप में देखते हुए कई राज्यों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित उन सभी राज्यों से जवाब मांगा है जिनसे होकर गंगा नदी या उसकी सहायक नदियां गुजरती हैं।

अदालत के सामने यह जानकारी रखी गई कि गंगा नदी के किनारों पर अतिक्रमण की समस्या केवल पटना तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में यह समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। कई स्थानों पर नदी के बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियां और स्थायी ढांचे खड़े कर दिए गए हैं, जिससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

पटना में अतिक्रमण की गंभीर स्थिति

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पटना में गंगा नदी के किनारे किए गए एक सर्वे में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण सामने आया है। दीघा घाट से नौज़र घाट के बीच किए गए सर्वेक्षण में कुल 213 अतिक्रमण चिन्हित किए गए। इनमें से 58 अतिक्रमणों को हटाया जा चुका है, जबकि 145 अतिक्रमण अब भी बने हुए हैं।

यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि गंगा के फ्लडप्लेन पर अवैध निर्माण की समस्या काफी व्यापक है। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि नौज़र घाट से नूरपुर घाट के बीच भी सैकड़ों अतिक्रमण मौजूद हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल कुछ स्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े क्षेत्र में फैली हुई है।

अदालत में राज्य सरकार का पक्ष

बिहार सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि कई अतिक्रमणों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यह कार्रवाई विभिन्न अदालतों द्वारा दिए गए अंतरिम आदेशों के कारण रुक गई है। राज्य सरकार के अनुसार, हाईकोर्ट और जिला अदालतों में दायर याचिकाओं के कारण कई मामलों में स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर दिए गए, जिससे अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए यह संकेत दिया कि गंगा के फ्लडप्लेन की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा है और इसे हल करने के लिए सभी संबंधित संस्थाओं को समन्वित प्रयास करने होंगे।

एनजीटी के आदेश से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के 2020 के एक आदेश से भी जुड़ा हुआ है। उस समय एनजीटी ने पटना में गंगा नदी के किनारे अतिक्रमण के आरोपों से जुड़ी एक याचिका को खारिज कर दिया था। एनजीटी का कहना था कि याचिका में कथित उल्लंघनों और अतिक्रमण करने वालों के बारे में पर्याप्त और ठोस जानकारी नहीं दी गई थी।

हालांकि बाद में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद अब सर्वोच्च अदालत इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर स्थिति की समीक्षा कर रही है।

2016 की अधिसूचना पर भी मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और राज्यों से यह भी पूछा है कि 7 अक्टूबर 2016 को जारी अधिसूचना को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। यह अधिसूचना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत जारी की गई थी और इसका उद्देश्य गंगा नदी के संरक्षण, पुनर्जीवन और प्रबंधन के लिए एक समग्र ढांचा तैयार करना था।

इस अधिसूचना के तहत गंगा नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को बनाए रखने, प्रदूषण को नियंत्रित करने और नदी के किनारों तथा फ्लडप्लेन को सुरक्षित रखने के लिए कई दिशानिर्देश तय किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा करना जरूरी है, क्योंकि लगातार अतिक्रमण की खबरें सामने आ रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल रखे। अदालत ने पूछा कि गंगा नदी के किनारों और फ्लडप्लेन पर वर्तमान में अतिक्रमण की स्थिति क्या है और उन्हें हटाने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

इसके अलावा अदालत ने यह भी पूछा कि 2016 की अधिसूचना के प्रभावी क्रियान्वयन में क्या बाधाएं आ रही हैं और भविष्य में अतिक्रमण हटाने के लिए क्या ठोस कदम प्रस्तावित किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि गंगा के फ्लडप्लेन की डिमार्केशन यानी सीमा निर्धारण की स्थिति क्या है। कई बार अतिक्रमण की समस्या इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि नदी के बाढ़ क्षेत्र की स्पष्ट सीमा तय नहीं होती, जिससे लोग धीरे-धीरे उस क्षेत्र में निर्माण शुरू कर देते हैं।

नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा की रिपोर्ट

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने पहले इस विषय पर एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें कई राज्यों में अतिक्रमण की स्थिति के बारे में जानकारी दी गई थी। हालांकि अदालत ने कहा कि वह हलफनामा वर्ष 2024 का है, इसलिए वर्तमान स्थिति को समझने के लिए एक ताजा और विस्तृत रिपोर्ट आवश्यक है।

इसी कारण अदालत ने केंद्र सरकार और राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अद्यतन जानकारी के साथ एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कर कोर्ट में प्रस्तुत करें।

पर्यावरणीय दृष्टि से गंभीर चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा के फ्लडप्लेन पर बढ़ते अतिक्रमण से नदी की प्राकृतिक प्रणाली प्रभावित हो रही है। फ्लडप्लेन वह क्षेत्र होता है जहां नदी बाढ़ के समय फैलती है और अतिरिक्त पानी को समाहित करती है। यदि इस क्षेत्र में स्थायी निर्माण कर दिए जाएं तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है और नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो सकता है।

इसके अलावा फ्लडप्लेन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यह क्षेत्र भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और प्राकृतिक जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गंगा संरक्षण की चुनौती

गंगा नदी को साफ और सुरक्षित बनाने के लिए पिछले कई वर्षों से विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें नमामि गंगे कार्यक्रम प्रमुख है। इसके बावजूद अतिक्रमण और प्रदूषण जैसी समस्याएं अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सफाई अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नदी के किनारों और फ्लडप्लेन को संरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। यदि इन क्षेत्रों पर अवैध निर्माण जारी रहता है, तो नदी के संरक्षण के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाएंगे।

अगली सुनवाई 23 अप्रैल 2026 को

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई से पहले अद्यतन स्टेटस रिपोर्ट अदालत में दाखिल करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर गंभीरता से कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि गंगा नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके।

इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है। उम्मीद की जा रही है कि तब तक केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें अदालत के सामने विस्तृत रिपोर्ट पेश करेंगी, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि गंगा के किनारों और फ्लडप्लेन पर हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

निष्कर्ष

गंगा नदी केवल एक जलधारा नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर है। इसके किनारों और फ्लडप्लेन पर हो रहे अतिक्रमण को रोकना केवल कानूनी दायित्व नहीं बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

यदि अदालत के निर्देशों के अनुसार राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, तो यह न केवल गंगा नदी के संरक्षण में मदद करेगा बल्कि देश के अन्य नदी तंत्रों के लिए भी एक उदाहरण स्थापित करेगा।