पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के विस्तार प्रोजेक्ट में बेसमेंट विवाद: भवन नियमों ने बढ़ाई अड़चन, समाधान के लिए प्रशासन और कंसल्टेंट को साथ बैठने का निर्देश
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट परिसर के प्रस्तावित विस्तार प्रोजेक्ट को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। यह विवाद मुख्य रूप से बेसमेंट अथवा लोअर ग्राउंड फ्लोर के उपयोग और चंडीगढ़ भवन नियमों के अनुपालन से जुड़ा हुआ है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन और प्रोजेक्ट से जुड़े कंसल्टेंट को निर्देश दिया कि वे आपसी चर्चा के माध्यम से जल्द से जल्द इस गतिरोध का समाधान निकालें ताकि हाईकोर्ट के विस्तार की योजना में किसी प्रकार की बाधा न आए और परियोजना समय पर आगे बढ़ सके।
यह मामला उस समय सामने आया जब अदालत को बताया गया कि प्रस्तावित विस्तार योजना में बेसमेंट के निर्माण और उसके उपयोग को लेकर तकनीकी और कानूनी प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। विशेष रूप से यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या प्रस्तावित भवन में बेसमेंट या लोअर ग्राउंड फ्लोर को उपयोगी या रहने योग्य स्थान के रूप में विकसित किया जा सकता है। चंडीगढ़ प्रशासन ने अदालत को सूचित किया कि इस विषय पर प्रशासनिक अधिकारियों और परियोजना के कंसल्टेंट के बीच चर्चा हो चुकी है और फिलहाल इस पूरे मुद्दे की जांच की जा रही है।
चंडीगढ़ बिल्डिंग रूल्स, 2017 बना विवाद का केंद्र
विवाद का मुख्य आधार चंडीगढ़ बिल्डिंग रूल्स, 2017 हैं। इन नियमों के अनुसार बेसमेंट का उपयोग रहने योग्य स्थान के रूप में नहीं किया जा सकता। इसका मतलब यह है कि बेसमेंट को आवासीय या नियमित कार्यस्थल के रूप में विकसित करने की अनुमति नहीं है। आमतौर पर ऐसे स्थानों का उपयोग पार्किंग, स्टोरेज, सर्विस एरिया या तकनीकी सुविधाओं के लिए किया जाता है।
इसी नियम के कारण हाईकोर्ट के प्रस्तावित विस्तार प्रोजेक्ट के कुछ पहलुओं पर तकनीकी आपत्तियां सामने आई हैं। प्रशासन का कहना है कि यदि बेसमेंट को किसी भी प्रकार से रहने योग्य स्थान के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा जाता है तो वह भवन नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। यही कारण है कि परियोजना की योजना में बदलाव या स्पष्टीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
प्रशासनिक समिति की भूमिका पर अदालत के सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जब पहले इस परियोजना से संबंधित प्रशासनिक समिति गठित की गई थी, जिसमें मुख्य वास्तुकार और मुख्य अभियंता जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, तब क्या उन्होंने इस मुद्दे पर कोई आपत्ति नहीं उठाई थी।
अदालत का मानना था कि यदि प्रारंभिक स्तर पर ही इस तरह के नियमों का परीक्षण किया जाता तो आज इस तरह का विवाद सामने नहीं आता। पीठ ने संकेत दिया कि बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स की योजना बनाते समय संबंधित नियमों और तकनीकी मानकों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए ताकि बाद में परियोजना के क्रियान्वयन में बाधाएं न आएं।
प्रारंभिक योजना केवल अवधारणा आधारित थी
इस पर प्रशासन की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत को बताया कि प्रारंभिक चरण में जो योजना तैयार की गई थी वह केवल एक व्यापक अवधारणा योजना (कांसेप्ट प्लान) थी। उसमें मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे की रूपरेखा दी गई थी। विस्तृत तकनीकी योजना और निर्माण से संबंधित विवरण बाद में तैयार किया जाना था।
वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि बेसमेंट का प्रस्ताव मुख्य रूप से पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से था। इसे रहने योग्य स्थान बनाने का कोई इरादा नहीं था। उनका कहना था कि जब विस्तृत योजना तैयार की जा रही है तब भवन नियमों के अनुपालन से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं, जिनका समाधान खोजा जा रहा है।
भवन नियमों में छूट देने का प्रावधान
सुनवाई के दौरान प्रशासन ने यह भी बताया कि चंडीगढ़ के भवन नियमों में मुख्य प्रशासक को कुछ विशेष परिस्थितियों में नियमों में छूट देने का अधिकार प्राप्त है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई परियोजना सार्वजनिक महत्व की है और उसके लिए कुछ तकनीकी बदलाव आवश्यक हैं, तो प्रशासन नियमानुसार छूट प्रदान कर सकता है।
हालांकि इस तरह की छूट देने का निर्णय पूरी तरह प्रशासनिक विवेक और नियमों के अनुसार ही लिया जाता है। अदालत ने इस संदर्भ में कोई अंतिम राय नहीं दी, लेकिन यह उम्मीद जताई कि संबंधित पक्ष मिलकर ऐसा समाधान निकालेंगे जिससे परियोजना आगे बढ़ सके और नियमों का भी उल्लंघन न हो।
जनहित याचिका के दौरान उठाया गया मुद्दा
हाईकोर्ट ने यह निर्देश उस समय दिए जब विनोद धत्तरवाल और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी। इन याचिकाओं में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट परिसर में बुनियादी ढांचे की कमी का मुद्दा उठाया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान समय में हाईकोर्ट की कार्यक्षमता पर बुनियादी ढांचे की कमी का सीधा असर पड़ रहा है। अदालत परिसर में कोर्टरूम, चैंबर, पार्किंग और अन्य सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि अदालत के विस्तार की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है।
न्यायाधीशों की संख्या और कोर्टरूम की कमी
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 85 है, लेकिन वर्तमान में केवल 69 कोर्टरूम ही उपलब्ध हैं। इसका मतलब यह है कि यदि सभी स्वीकृत पदों पर न्यायाधीश नियुक्त भी हो जाएं तो उनके लिए पर्याप्त कोर्टरूम उपलब्ध नहीं होंगे।
अदालत पहले भी इस मुद्दे पर टिप्पणी कर चुकी है कि कोर्टरूम की कमी न्यायिक कार्यों के सुचारु संचालन में बाधा उत्पन्न करती है। न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यदि बुनियादी ढांचा पर्याप्त न हो तो न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
विस्तार परियोजना का महत्व
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट देश के सबसे महत्वपूर्ण उच्च न्यायालयों में से एक है। यह न केवल पंजाब और हरियाणा बल्कि केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ से जुड़े मामलों की भी सुनवाई करता है। इसलिए यहां मामलों की संख्या काफी अधिक रहती है।
ऐसे में अदालत के विस्तार की योजना केवल भवन निर्माण का मुद्दा नहीं बल्कि न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने से भी जुड़ी हुई है। यदि नए कोर्टरूम, चैंबर, रिकॉर्ड रूम, पार्किंग और अन्य सुविधाएं विकसित की जाती हैं तो इससे न्यायिक कार्यों में तेजी आएगी और न्याय वितरण प्रणाली अधिक प्रभावी बन सकेगी।
तकनीकी और प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता
इस पूरे विवाद से यह स्पष्ट होता है कि बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स में तकनीकी और प्रशासनिक समन्वय कितना महत्वपूर्ण होता है। यदि योजना के प्रारंभिक चरण में ही सभी संबंधित नियमों और तकनीकी पहलुओं की पूरी जांच कर ली जाए तो बाद में इस प्रकार के विवादों से बचा जा सकता है।
हाईकोर्ट ने भी अपने निर्देश में यही संकेत दिया है कि चंडीगढ़ प्रशासन और परियोजना के कंसल्टेंट को मिलकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए जो भवन नियमों के अनुरूप हो और साथ ही विस्तार परियोजना को आगे बढ़ाने में सहायक हो।
अदालत की अपेक्षा: जल्द समाप्त हो गतिरोध
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस मुद्दे का समाधान जल्द से जल्द किया जाना चाहिए ताकि परियोजना में अनावश्यक देरी न हो। अदालत ने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष आपसी सहयोग और संवाद के माध्यम से इस गतिरोध को समाप्त कर देंगे।
हाईकोर्ट का यह रुख इस बात को दर्शाता है कि न्यायपालिका भी अपने बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर गंभीर है। अदालत चाहती है कि विस्तार योजना बिना किसी बाधा के आगे बढ़े ताकि भविष्य में न्यायिक कार्यों को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सके।
निष्कर्ष
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के विस्तार प्रोजेक्ट में बेसमेंट के उपयोग को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद फिलहाल प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर विचाराधीन है। चंडीगढ़ बिल्डिंग रूल्स, 2017 के प्रावधानों के कारण इस मुद्दे ने एक कानूनी रूप ले लिया है, लेकिन अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी चर्चा के माध्यम से समाधान निकालने का निर्देश देकर एक व्यावहारिक रास्ता सुझाया है।
यदि प्रशासन और परियोजना से जुड़े विशेषज्ञ मिलकर नियमों के अनुरूप कोई समाधान निकाल लेते हैं तो यह परियोजना जल्द ही आगे बढ़ सकती है। हाईकोर्ट परिसर के विस्तार से न केवल न्यायाधीशों और वकीलों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी बल्कि आम नागरिकों को भी न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया अधिक सुगम और प्रभावी हो सकेगी।