हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के दो अहम फैसले: दिवंगत शिक्षक के वारिसों को एसीपी व बकाया वेतन देने का आदेश, धर्मपुर नगर पंचायत गठन को भी मिली न्यायिक मंजूरी
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में दो महत्वपूर्ण मामलों में फैसले सुनाए हैं, जिनका संबंध एक ओर सरकारी कर्मचारी के सेवा अधिकारों से है और दूसरी ओर स्थानीय निकाय के गठन से। पहले मामले में अदालत ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि दिवंगत जेबीटी शिक्षक के कानूनी वारिसों को उनके सेवाकाल से संबंधित तीन एसीपी इंक्रीमेंट और 68 दिनों का बकाया वेतन ब्याज सहित दिया जाए। वहीं दूसरे मामले में अदालत ने मंडी जिले में गठित धर्मपुर नगर पंचायत को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए राज्य सरकार की अधिसूचना को वैध ठहराया।
इन दोनों मामलों में अदालत ने प्रशासनिक फैसलों की वैधता, कर्मचारियों के अधिकारों और कानून के उचित पालन को लेकर स्पष्ट टिप्पणी की।
दिवंगत शिक्षक के वारिसों को मिलेगा एसीपी और बकाया वेतन
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि दिवंगत जेबीटी शिक्षक प्रकाश चंद के कानूनी वारिसों को उनकी सेवा अवधि के दौरान मिलने वाले तीन एसीपी (Assured Career Progression) इंक्रीमेंट और 68 दिनों का बकाया वेतन दिया जाए।
न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने यह आदेश याचिका स्वीकार करते हुए पारित किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी कर्मचारी के साथ विभागीय स्तर पर गलती हुई है, तो उसकी सजा कर्मचारी को नहीं दी जा सकती।
अदालत ने कहा कि जब बर्खास्तगी के आदेश को पहले ही अवैध करार दिया जा चुका है, तो उस अवधि का वेतन रोकना उचित नहीं है जिसमें कर्मचारी को जबरन सेवा से दूर रखा गया था।
तीन एसीपी इंक्रीमेंट देने का आदेश
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दिवंगत शिक्षक प्रकाश चंद की नियमित सेवा के 4 वर्ष, 9 वर्ष और 14 वर्ष पूरे होने पर उन्हें मिलने वाले तीनों एसीपी इंक्रीमेंट उनके कानूनी वारिसों को दिए जाएं।
एसीपी योजना के तहत सरकारी कर्मचारियों को एक निश्चित अवधि तक सेवा देने के बाद वेतन वृद्धि का लाभ दिया जाता है।
अदालत ने कहा कि यदि कर्मचारी इन लाभों का पात्र था, तो उसके निधन के बाद भी उसके वारिसों को यह अधिकार प्राप्त है।
तीन महीने में भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि यह भुगतान तीन महीने के भीतर किया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो विभाग को याचिका दायर होने की तिथि से भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
इस आदेश के माध्यम से अदालत ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि कर्मचारियों के वैधानिक लाभों को अनावश्यक रूप से रोका न जाए।
68 दिन का बकाया वेतन भी देना होगा
मामले में एक महत्वपूर्ण मुद्दा 68 दिनों के बकाया वेतन का भी था।
प्रदेश सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि “नो वर्क नो पे” के सिद्धांत के आधार पर उस अवधि का वेतन नहीं दिया जा सकता क्योंकि कर्मचारी ने उस दौरान कार्य नहीं किया था।
लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि जब कर्मचारी को विभागीय कार्रवाई के कारण जबरन काम करने से रोका गया था, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसने स्वेच्छा से काम नहीं किया।
इसलिए उस अवधि का वेतन रोकना अनुचित होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 1992 से जुड़ा है। उस समय प्रकाश चंद को राजकीय प्राथमिक पाठशाला सिंबल में स्वयंसेवी शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।
हालांकि उनकी नियुक्ति को एक अन्य अभ्यर्थी ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी।
लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के दौरान वर्ष 1998 में उनकी सेवाओं को नियमित कर दिया गया था।
2004 में नियुक्ति रद्द
बाद में वर्ष 2004 में ट्रिब्यूनल ने उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया।
इसके बाद शिक्षा विभाग ने 21 फरवरी 2005 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।
इस निर्णय के खिलाफ प्रकाश चंद ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने दी राहत
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान उनकी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और उनकी नियुक्ति को वैध ठहराया।
इसके बाद भी कई प्रशासनिक और वित्तीय लाभों का भुगतान नहीं किया गया, जिसके कारण यह मामला फिर अदालत के सामने आया।
धर्मपुर नगर पंचायत गठन को भी मिली अदालत की मंजूरी
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में मंडी जिले की नवगठित धर्मपुर नगर पंचायत को लेकर राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को वैध ठहराया है।
अदालत ने कहा कि इस अधिसूचना में कोई अवैधता या मनमानी नहीं पाई गई है।
याचिका खारिज
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि नगर पंचायत के गठन के लिए आवश्यक सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।
20 दिसंबर 2024 की अधिसूचना
राज्य सरकार ने 20 दिसंबर 2024 को एक अधिसूचना जारी कर मंडी जिले के धर्मपुर क्षेत्र को नगर पंचायत घोषित किया था।
इस अधिसूचना को कुछ ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां
याचिकाकर्ता राकेश कुमार और अन्य ग्रामीणों ने अदालत में कई आपत्तियां उठाई थीं।
उनका कहना था कि नगर पंचायत बनाने की प्रक्रिया में जनता की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र को ट्रांजिशनल एरिया घोषित करने के लिए जनसंख्या और आय के मानकों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
आपत्तियां दर्ज करने के लिए समय कम
याचिकाकर्ताओं का एक अन्य तर्क यह था कि लोगों को आपत्तियां दर्ज करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
उनका कहना था कि आमतौर पर 4 से 6 सप्ताह का समय दिया जाता है, लेकिन इस मामले में केवल दो सप्ताह का समय दिया गया।
सरकारी योजनाओं पर असर की चिंता
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि नगर पंचायत बनने से क्षेत्र के गरीब परिवारों को मिलने वाली कुछ सरकारी योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से मनरेगा और बीपीएल परिवारों से जुड़ी योजनाओं को लेकर चिंता जताई गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता अनूप रतन ने अदालत को बताया कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुरूप की गई है।
उन्होंने कहा कि नगर निगम अधिनियम, 1994 के संशोधित प्रावधानों के तहत ही आपत्तियां दर्ज करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया था।
जनसंख्या और आय के आंकड़े
सरकार ने अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पेश करते हुए बताया कि धर्मपुर की जनसंख्या 2000 से अधिक है।
इसके अलावा क्षेत्र में कई शैक्षणिक और संस्थागत सुविधाएं मौजूद हैं।
क्षेत्र के विकास का आकलन
अदालत को बताया गया कि क्षेत्र में 6 सरकारी और 4 निजी शिक्षण संस्थान हैं।
इसके अलावा यहां एचआरटीसी डिपो और अन्य संस्थान भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के शहरी विकास की ओर संकेत करते हैं।
आय का अनुमान
रिकॉर्ड के अनुसार क्षेत्र की अनुमानित वार्षिक आय लगभग 29 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
अदालत ने माना कि यह आय नगर पंचायत के गठन के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ग्रामीणों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां ठोस कानूनी आधार पर नहीं थीं।
पीठ ने कहा कि अधिकांश आपत्तियां केवल विरोध दर्ज कराने के उद्देश्य से दाखिल की गई थीं।
प्रशासनिक प्रक्रिया सही पाई गई
अदालत ने यह भी पाया कि उपायुक्त मंडी ने फील्ड स्टाफ के माध्यम से क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कराया था।
इस सर्वेक्षण में जनसंख्या, आय और गैर-कृषि रोजगार के स्रोतों का आकलन किया गया था।
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के इन दोनों फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि अदालत प्रशासनिक निर्णयों की वैधता और कर्मचारियों के अधिकारों दोनों पर बराबर ध्यान देती है।
एक ओर अदालत ने दिवंगत शिक्षक के वारिसों को उनके वैधानिक लाभ दिलाने का आदेश दिया, वहीं दूसरी ओर नगर पंचायत के गठन को वैध ठहराते हुए राज्य सरकार के निर्णय को सही माना।
इन फैसलों से यह संदेश भी मिलता है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो तो अदालत उसे बरकरार रखती है, लेकिन जहां कर्मचारियों के अधिकारों का प्रश्न हो, वहां न्यायिक हस्तक्षेप भी किया जाता है।