हिमाचल में जलविद्युत परियोजनाओं पर 2% भू-राजस्व लगाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती, राज्य सरकार से मांगा जवाब
हिमाचल प्रदेश में संचालित जलविद्युत परियोजनाओं पर दो प्रतिशत भू-राजस्व लगाने के राज्य सरकार के फैसले को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले में कंपनियों की ओर से दायर कई याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को तय की है।
यह विवाद राज्य सरकार द्वारा जलविद्युत परियोजनाओं के बाजार मूल्य पर दो प्रतिशत भू-राजस्व लगाने के निर्णय से जुड़ा है, जिसे कई परियोजना कंपनियों ने असंवैधानिक बताते हुए अदालत में चुनौती दी है।
किस फैसले को दी गई चुनौती
याचिकाओं में राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2025 में जारी तीन महत्वपूर्ण अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है।
इन अधिसूचनाओं को 6 अक्टूबर, 1 दिसंबर और 11 दिसंबर 2025 को जारी किया गया था। इनके माध्यम से राज्य सरकार ने यह प्रावधान किया कि 1 जनवरी 2026 से राज्य में संचालित जलविद्युत परियोजनाओं के औसत बाजार मूल्य पर दो प्रतिशत की दर से भू-राजस्व वसूला जाएगा।
सरकार के इस निर्णय का असर राज्य में चल रही बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ने वाला है।
कंपनियों की मुख्य आपत्ति
जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों ने अपनी याचिकाओं में कहा है कि राज्य सरकार द्वारा लगाया गया यह भू-राजस्व संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान के तहत राज्य सरकार को केवल भूमि पर भू-राजस्व लगाने का अधिकार है। लेकिन सरकार ने पूरे जलविद्युत परियोजना के बाजार मूल्य पर भू-राजस्व लगाने का प्रावधान कर दिया है, जो कानून की मूल भावना के विपरीत है।
कंपनियों का कहना है कि किसी परियोजना का बाजार मूल्य केवल भूमि तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें मशीनरी, संरचना, तकनीकी उपकरण और अन्य परिसंपत्तियां भी शामिल होती हैं। ऐसे में पूरे प्रोजेक्ट के मूल्य पर भू-राजस्व लगाना कानूनी रूप से उचित नहीं है।
कानून के प्रावधानों का उल्लंघन होने का आरोप
याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि यह संशोधन हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस अधिनियम के तहत भू-राजस्व केवल भूमि से संबंधित मामलों में लगाया जा सकता है।
लेकिन राज्य सरकार द्वारा किए गए संशोधन के तहत भू-राजस्व का दायरा बढ़ाकर पूरे जलविद्युत प्रोजेक्ट के बाजार मूल्य तक कर दिया गया है।
याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि यह कदम भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और इसलिए अदालत को इसे रद्द करना चाहिए।
अदालत से क्या मांग की गई
कंपनियों ने अपनी याचिकाओं में अदालत से यह मांग की है कि राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं को रद्द किया जाए।
इसके साथ ही अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि सरकार को इस नए प्रावधान के तहत भू-राजस्व वसूलने से रोका जाए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि यह प्रावधान लागू रहता है तो इससे जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन और वित्तीय स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
राज्य सरकार का पक्ष
दूसरी ओर राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि यह निर्णय प्रदेश की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
सरकार के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य राज्य के लिए अतिरिक्त राजस्व के स्रोत पैदा करना है।
सरकार का अनुमान है कि इस भू-राजस्व के माध्यम से राज्य को हर साल लगभग 1800 से 2000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है।
कितनी परियोजनाओं पर पड़ेगा असर
राज्य सरकार के अनुसार यह नया भू-राजस्व प्रावधान हिमाचल प्रदेश में संचालित लगभग 191 जलविद्युत परियोजनाओं पर लागू होगा।
इनमें सबसे अधिक परियोजनाएं चंबा जिले में हैं, जहां लगभग 45 परियोजनाएं संचालित हो रही हैं।
इसके बाद कुल्लू जिले में लगभग 35 परियोजनाएं हैं। इसके अलावा राज्य के अन्य जिलों में भी बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हो रही हैं, जिन पर इस प्रावधान का प्रभाव पड़ेगा।
सरकार ने क्यों लिया फैसला
राज्य सरकार का कहना है कि प्रदेश की वित्तीय स्थिति पिछले कुछ वर्षों में चुनौतीपूर्ण रही है।
सरकार ने अदालत को बताया कि राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant – RDG) समाप्त होने के बाद राज्य के सामने राजस्व जुटाने के नए स्रोत तलाशने की आवश्यकता पैदा हो गई है।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं से भू-राजस्व के रूप में अतिरिक्त आय प्राप्त करने का निर्णय लिया।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत का महत्व
हिमाचल प्रदेश को देश में जलविद्युत उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है।
राज्य में पहाड़ी भूगोल और नदियों की उपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित की गई हैं।
इन परियोजनाओं से न केवल बिजली उत्पादन होता है बल्कि राज्य सरकार को रॉयल्टी और अन्य शुल्कों के माध्यम से भी राजस्व प्राप्त होता है।
उद्योग पर संभावित प्रभाव
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि परियोजनाओं के बाजार मूल्य पर दो प्रतिशत भू-राजस्व लगाया जाता है तो इससे परियोजनाओं की लागत और संचालन खर्च बढ़ जाएगा।
उनका कहना है कि इससे निवेशकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा और भविष्य में नई परियोजनाओं में निवेश करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि इस तरह के कर या शुल्क निवेश के माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
अदालत की प्रारंभिक कार्रवाई
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिया है।
अदालत ने सरकार से कहा है कि वह इस मामले में अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करे और यह स्पष्ट करे कि भू-राजस्व लगाने का यह प्रावधान किस कानूनी आधार पर किया गया है।
अदालत ने फिलहाल मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए अगली तारीख 23 मार्च निर्धारित की है।
आगे क्या होगा
अगली सुनवाई में अदालत राज्य सरकार और याचिकाकर्ता कंपनियों दोनों के तर्कों को विस्तार से सुनेगी।
अदालत को यह तय करना होगा कि क्या राज्य सरकार द्वारा लगाया गया भू-राजस्व संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।
यदि अदालत को यह लगता है कि यह प्रावधान कानून के अनुरूप नहीं है, तो वह अधिसूचनाओं को रद्द भी कर सकती है।
दूसरी ओर यदि अदालत सरकार के तर्कों से संतुष्ट होती है, तो यह प्रावधान लागू रह सकता है।
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं पर दो प्रतिशत भू-राजस्व लगाने का मुद्दा अब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गया है।
यह मामला न केवल राज्य सरकार की वित्तीय नीतियों से जुड़ा है बल्कि इससे ऊर्जा क्षेत्र और निवेश के माहौल पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
अब सभी की नजरें 23 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जब अदालत इस मामले में आगे की दिशा तय करेगी।