डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज की, कहा—नेटवर्क का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित “डिजिटल अरेस्ट” साइबर ठगी से जुड़े एक गंभीर मामले में आरोपी ओम कांत गुप्ता की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि मामले की प्रकृति और सामने आए तथ्यों को देखते हुए आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना आवश्यक है, ताकि पूरे साइबर ठगी नेटवर्क और उसके तौर-तरीकों का पता लगाया जा सके।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि आरोपी के बैंक खाते में बड़ी मात्रा में धनराशि का लेन-देन हुआ है, जिससे यह संदेह मजबूत होता है कि आरोपी इस नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों को देखते हुए जांच एजेंसियों को पूरी जांच करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत की टिप्पणी: हिरासत में पूछताछ जरूरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में आरोपी से हिरासत में पूछताछ किए बिना पूरे अपराध की सच्चाई सामने आना मुश्किल है।
अदालत ने कहा कि साइबर ठगी के मामलों में अक्सर संगठित नेटवर्क काम करते हैं, जिनमें कई लोग अलग-अलग भूमिकाओं में शामिल होते हैं। ऐसे मामलों में यह जानना जरूरी होता है कि पैसे किस तरह से एक खाते से दूसरे खाते में भेजे गए और पूरे नेटवर्क का संचालन किस प्रकार किया जा रहा था।
अदालत ने कहा कि यदि आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी जाती है तो जांच प्रभावित हो सकती है और इससे पूरे नेटवर्क तक पहुंचने में कठिनाई हो सकती है।
बैंक खाते में संदिग्ध लेन-देन
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि सितंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच आरोपी के बैंक खाते में लगभग 1.5 करोड़ रुपये जमा हुए और बाद में निकाल भी लिए गए।
इसके बावजूद आरोपी ने बैंक में किसी प्रकार की शिकायत दर्ज नहीं कराई कि उसके खाते में बिना जानकारी के पैसे आ रहे हैं या निकल रहे हैं।
अदालत ने कहा कि यह तथ्य आरोपी के उस तर्क को कमजोर करता है जिसमें उसने दावा किया था कि उसे अपने बैंक खाते में हो रहे लेन-देन की जानकारी नहीं थी।
पीठ ने कहा कि इतनी बड़ी रकम के लेन-देन के बावजूद किसी प्रकार की शिकायत न करना यह दर्शाता है कि मामले में कई सवाल उठते हैं, जिनकी जांच जरूरी है।
साइबर ठगी का गंभीर मामला
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला गंभीर साइबर धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है।
अदालत ने कहा कि आजकल तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को डराकर या भ्रमित कर उनसे पैसे ठगे जा रहे हैं। ऐसे अपराधों की संख्या देशभर में तेजी से बढ़ रही है और यह समाज के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को इस तरह के मामलों में पूरे नेटवर्क का पता लगाने और जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
पुलिस का पक्ष
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया कि आरोपी को जांच में शामिल होने के लिए नोटिस भेजा गया था।
पुलिस के अनुसार, आरोपी को पिछले वर्ष जांच में सहयोग करने के लिए बुलाया गया था, लेकिन वह निर्धारित समय पर पेश नहीं हुआ।
पुलिस ने कहा कि आरोपी का जांच में सहयोग न करना यह दर्शाता है कि वह जांच प्रक्रिया से बचने की कोशिश कर रहा है। इसी कारण पुलिस ने अदालत से आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने का अनुरोध किया।
शिकायत कैसे सामने आई
यह मामला दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में रहने वाली एक महिला की शिकायत से जुड़ा है।
महिला ने पुलिस को बताया कि 15 मार्च 2025 को उसे व्हाट्सऐप कॉल के माध्यम से संपर्क किया गया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को एक “सर्विलांस अधिकारी” बताया।
उस व्यक्ति ने महिला से कहा कि उस पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत उसे “डिजिटल अरेस्ट” किया गया है।
“डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर ठगी
शिकायतकर्ता के अनुसार, कॉल करने वाले व्यक्ति ने उसे डराया और कहा कि यदि उसने निर्देशों का पालन नहीं किया तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस डर के कारण महिला मानसिक दबाव में आ गई और उसने कॉल करने वाले व्यक्ति के निर्देशों का पालन करना शुरू कर दिया।
आरोप है कि आरोपी और उसके सहयोगियों ने इसी डर का फायदा उठाते हुए महिला से लगभग 1.3 करोड़ रुपये दो अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए।
जांच में सामने आया बैंक खाते का लिंक
पुलिस जांच के दौरान यह पता चला कि जिन बैंक खातों में पैसे भेजे गए थे, उनमें से एक खाता ओम कांत गुप्ता के नाम पर था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस खाते में लगभग 30 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए थे।
बताया गया कि यह रकम उसी दिन कई अन्य बैंक खातों में स्थानांतरित कर दी गई, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि यह एक संगठित साइबर ठगी नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।
किन धाराओं में दर्ज हुआ मामला
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।
इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- धोखाधड़ी से संबंधित धाराएं
- जबरन वसूली के आरोप
- फर्जी पहचान का उपयोग
- आपराधिक साजिश
इन धाराओं के तहत पुलिस आगे की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस साइबर ठगी में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।
साइबर अपराध का नया तरीका
पिछले कुछ वर्षों में “डिजिटल अरेस्ट” जैसे साइबर अपराधों के मामले तेजी से सामने आए हैं।
इन मामलों में अपराधी खुद को पुलिस अधिकारी, जांच एजेंसी का अधिकारी या किसी सरकारी संस्था का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं।
इसके बाद वे यह कहते हैं कि व्यक्ति किसी गंभीर अपराध में शामिल है और उसे तुरंत जांच में सहयोग करना होगा।
इस डर का फायदा उठाकर वे पीड़ितों से बैंक खाते की जानकारी या सीधे पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहते हैं।
अदालत का निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि मामले की जांच अभी जारी है और कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने बाकी हैं।
अदालत ने कहा कि आरोपी की भूमिका की पूरी तरह जांच करना आवश्यक है और इसके लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी हो सकती है।
इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
बढ़ते साइबर अपराधों पर चिंता
यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि साइबर अपराध किस तरह से आम लोगों को निशाना बना रहे हैं।
तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ-साथ अपराधियों ने भी नए-नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं।
ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के लिए पूरे नेटवर्क का पता लगाना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि अपराधी अक्सर अलग-अलग देशों या शहरों से काम करते हैं और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय यह संकेत देता है कि अदालतें साइबर अपराधों को गंभीरता से ले रही हैं और जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में पूरी जांच करने का अवसर देना चाहती हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मामले में गंभीर आरोप और संदिग्ध वित्तीय लेन-देन सामने आते हैं, तो आरोपी को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं माना जा सकता।
अब इस मामले में पुलिस की जांच आगे बढ़ेगी और यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि इस साइबर ठगी के पीछे पूरा नेटवर्क कौन चला रहा था और इसमें कितने लोग शामिल थे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।