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दिल्ली दंगे: कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग खारिज, अदालत ने कहा– शिकायत के रूप में आगे बढ़ेगा मामला

दिल्ली दंगे: कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग खारिज, अदालत ने कहा– शिकायत के रूप में आगे बढ़ेगा मामला

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली की एक अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इस चरण में पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश देने का कोई आधार नहीं बनता।

यह आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार ने मोहम्मद इलियास नामक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि कपिल मिश्रा और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ कथित रूप से दंगों को भड़काने के आरोप में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया जाए।

हालांकि अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत दायर याचिका के आधार पर इस समय FIR दर्ज करने का निर्देश देना उचित नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रस्तुत सामग्री से ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता जिसके आधार पर पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया जाए।


अदालत ने याचिका को शिकायत के रूप में स्वीकार किया

हालांकि अदालत ने FIR दर्ज कराने की मांग को खारिज कर दिया, लेकिन याचिका को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि इस आवेदन को अब एक निजी शिकायत (Complaint) के रूप में माना जाएगा।

जज ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार है। इसके लिए उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 210(1)(a) के तहत अदालत के समक्ष साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी जाती है।

इसका अर्थ यह है कि अब अदालत शिकायतकर्ता की गवाही और उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को रिकॉर्ड करेगी। यदि अदालत को इन साक्ष्यों में प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता दिखाई देता है, तो आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च तय की है, जिसमें शिकायतकर्ता मोहम्मद इलियास से पूछताछ की जाएगी।


2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे

फरवरी 2020 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में व्यापक हिंसा हुई थी। यह हिंसा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के समर्थन और विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच भड़की थी।

इन दंगों में कई लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। इसके अलावा बड़ी मात्रा में सार्वजनिक और निजी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा था।

दिल्ली पुलिस ने इन घटनाओं से जुड़े कई मामले दर्ज किए थे और अनेक आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। इन दंगों की जांच को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर की गईं।


शिकायतकर्ता के आरोप

इस मामले में शिकायतकर्ता मोहम्मद इलियास ने आरोप लगाया कि 23 फरवरी 2020 को उन्होंने कपिल मिश्रा और उनके साथियों को सड़क पर मौजूद देखा था।

इलियास का दावा था कि उस समय कथित रूप से सड़क को रोका गया था और सड़क किनारे ठेले लगाने वाले लोगों के ठेलों को नुकसान पहुंचाया गया था।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उस समय पुलिस के कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर मौजूद थे। शिकायतकर्ता के अनुसार, उस समय उत्तर-पूर्वी दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस और अन्य पुलिसकर्मी वहां खड़े थे और प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दे रहे थे कि यदि उन्होंने उस स्थान को खाली नहीं किया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

इलियास ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि इस घटनाक्रम के बाद इलाके में तनाव और हिंसा बढ़ गई।


अन्य नेताओं के खिलाफ भी आरोप

मोहम्मद इलियास ने अपनी शिकायत में केवल कपिल मिश्रा ही नहीं बल्कि पांच अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की थी।

इनमें भाजपा के विधायक मोहन सिंह बिष्ट, भाजपा के पूर्व विधायक जगदीश प्रधान और सतपाल संसद सहित अन्य लोगों के नाम भी शामिल थे।

शिकायतकर्ता का कहना था कि इन लोगों की कथित भूमिका की भी जांच होनी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो उनके खिलाफ भी FIR दर्ज की जानी चाहिए।


दिल्ली पुलिस का पक्ष

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने अदालत के समक्ष याचिका का विरोध किया।

पुलिस ने अदालत को बताया कि कपिल मिश्रा को इस मामले में फंसाने के लिए एक सुनियोजित साजिश रची गई है। पुलिस के अनुसार, दंगों की जांच के दौरान कपिल मिश्रा की भूमिका की पूरी तरह जांच की जा चुकी है और उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक या दोष सिद्ध करने वाला साक्ष्य नहीं मिला है।

पुलिस ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर मिश्रा के खिलाफ एक विशेष नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की गई थी।


व्हाट्सएप चैट्स और सोशल मीडिया अभियान का हवाला

दिल्ली पुलिस ने अदालत के सामने यह भी बताया कि जांच के दौरान कुछ व्हाट्सएप ग्रुप्स की चैट्स सामने आई थीं।

इन ग्रुप्स में “दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप” (DPSG) सहित कई अन्य समूहों का उल्लेख किया गया था। पुलिस का दावा था कि इन समूहों में कपिल मिश्रा के खिलाफ एक खास नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हैशटैग अभियानों के जरिए यह संदेश फैलाया जा रहा था कि हिंसा की शुरुआत कपिल मिश्रा की अगुवाई वाली भीड़ ने की थी।

पुलिस का कहना था कि यह एक सुनियोजित डिजिटल अभियान था जिसका उद्देश्य सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करना था।


दंगों को लेकर पुलिस की जांच

अक्टूबर 2024 में दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया था कि 2020 के दंगे एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थे।

पुलिस के अनुसार, इस साजिश का उद्देश्य कुछ खास इलाकों में हिंसा भड़काना था, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां मस्जिदें या मजारें स्थित थीं या जहां मुस्लिम आबादी अधिक थी।

जांच एजेंसियों का कहना था कि योजना यह थी कि पहले विरोध प्रदर्शनों को तेज किया जाए और फिर उचित समय आने पर उन्हें चक्का जाम में बदल दिया जाए।

इसके बाद भीड़ के इकट्ठा होने पर स्थिति हिंसक रूप ले सकती थी।


अदालत ने क्यों नहीं दिया FIR का निर्देश

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि BNSS की धारा 175(3) के तहत पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश तभी दिया जाता है जब अदालत के सामने पर्याप्त सामग्री हो जिससे प्रथम दृष्टया अपराध का स्पष्ट संकेत मिले।

इस मामले में अदालत ने माना कि फिलहाल ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई है जो पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश देने को उचित ठहराए।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता को अपने आरोपों को साबित करने का अवसर दिया जाएगा।


आगे की प्रक्रिया

अब यह मामला एक निजी शिकायत के रूप में आगे बढ़ेगा। अदालत पहले शिकायतकर्ता के बयान दर्ज करेगी और उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण करेगी।

यदि अदालत को लगता है कि प्रस्तुत साक्ष्य किसी अपराध की ओर संकेत करते हैं, तो अदालत आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकती है, जिसमें आरोपियों को समन जारी करना भी शामिल हो सकता है।

इस प्रकार फिलहाल FIR दर्ज कराने की मांग तो खारिज हो गई है, लेकिन शिकायतकर्ता के लिए अदालत का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।


मामले का व्यापक महत्व

दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों को लेकर अब तक कई कानूनी विवाद सामने आए हैं। इस मामले में अदालत का यह आदेश यह दर्शाता है कि अदालतें FIR दर्ज करने के आदेश देने से पहले उपलब्ध सामग्री और जांच रिपोर्ट को गंभीरता से परखती हैं।

साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि पुलिस ने उसके आरोपों पर कार्रवाई नहीं की है, तो वह अदालत के समक्ष निजी शिकायत के माध्यम से न्याय की मांग कर सकता है।

अदालत का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के उस सिद्धांत को भी रेखांकित करता है जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले पर्याप्त आधार होना आवश्यक है।


निष्कर्ष

दिल्ली की अदालत द्वारा कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग को खारिज करने का यह फैसला 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम माना जा रहा है।

अदालत ने एक ओर जहां FIR दर्ज कराने की मांग को अस्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता को अपने आरोपों को साबित करने का अवसर भी प्रदान किया है।

अब 27 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में यह देखा जाएगा कि शिकायतकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में अदालत के सामने किस प्रकार के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं और मामला आगे किस दिशा में बढ़ता है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।