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विदेश में नौकरी के नाम पर भारतीय युवाओं की तस्करी: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड को ज़मानत देने से किया इनकार

विदेश में नौकरी के नाम पर भारतीय युवाओं की तस्करी: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड को ज़मानत देने से किया इनकार

विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर भारतीय युवाओं को फंसाकर उन्हें लाओस में अवैध कॉल सेंटरों में काम करने के लिए मजबूर करने वाले कथित अंतरराष्ट्रीय रैकेट से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले के कथित मास्टरमाइंड को ज़मानत देने से इनकार करते हुए कहा कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि भारतीय नागरिकों की विदेश में तस्करी की गई और उन्हें अवैध गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।

न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति श्याम चंदक की खंडपीठ ने 10 मार्च को पारित आदेश में 46 वर्षीय आरोपी जेरी फिलिप्स जैकब की ज़मानत याचिका खारिज कर दी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने जैकब को इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख संचालक बताया है।


अंतरराष्ट्रीय नौकरी रैकेट का आरोप

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला एक संगठित आपराधिक नेटवर्क से जुड़ा है जो भारत के पढ़े-लिखे लेकिन बेरोज़गार युवाओं को विदेश में आकर्षक नौकरी का लालच देकर फंसाता था।

बताया गया कि आरोपी और उसके सहयोगियों ने एक सिंडिकेट बनाकर योजनाबद्ध तरीके से ऐसे युवाओं को निशाना बनाया जो बेहतर रोजगार की तलाश में थे। उन्हें विदेशी कंपनियों में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों का वादा किया जाता था।

हालांकि, जब ये लोग विदेश पहुंचते थे, तो वास्तविकता बिल्कुल अलग होती थी। उन्हें कथित तौर पर ऐसे कॉल सेंटरों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था जहां से विदेशी नागरिकों के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी की जाती थी।


बैंकॉक से लाओस तक तस्करी का नेटवर्क

जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी पहले भारतीय युवाओं को थाईलैंड के बैंकॉक ले जाता था। वहां से चीनी नागरिकों के सहयोग से उन्हें नाव के जरिए लाओस पहुंचाया जाता था।

लाओस पहुंचने के बाद भर्ती किए गए लोगों के पासपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ छीन लिए जाते थे। इसके बाद उन्हें वहां स्थित कथित कॉल सेंटरों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था।

इन कॉल सेंटरों से विदेशी नागरिकों—खासकर अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों—को क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने के लिए उकसाया जाता था और इस प्रक्रिया में उनसे बड़ी रकम ठगी जाती थी।


अवैध गतिविधियों में शामिल होने के लिए दबाव

अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री के अनुसार, जिन युवाओं को इस नेटवर्क के माध्यम से विदेश ले जाया गया था, उन्हें वहां अवैध ऑनलाइन धोखाधड़ी करने के लिए मजबूर किया जाता था।

अगर कोई व्यक्ति इस तरह के काम में शामिल होने से इनकार करता था या वापस भारत लौटने की इच्छा जताता था, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी।

कई मामलों में आरोप है कि ऐसे लोगों को यह कहकर मनाने की कोशिश की जाती थी कि यदि वे कंपनी के लिए काम जारी रखते हैं तो उन्हें “लॉन्गशेंग कंपनी” में टीम लीडर जैसे पदों पर पदोन्नति दी जाएगी।


भारत लौटने के लिए भी मांगी जाती थी रकम

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि यदि कोई पीड़ित व्यक्ति वहां से मुक्त होकर भारत लौटना चाहता था, तो उससे इसके बदले में बड़ी रकम मांगी जाती थी।

अभियोजन पक्ष का कहना है कि यह नेटवर्क न केवल लोगों को विदेश ले जाकर अवैध गतिविधियों में शामिल करता था बल्कि उनके साथ आर्थिक शोषण भी करता था।

ऐसी स्थिति में पीड़ितों के पास बहुत कम विकल्प रह जाते थे, क्योंकि उनके पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज पहले ही उनसे ले लिए जाते थे।


बड़ी संख्या में शिकायतें

मुंबई पुलिस के अनुसार, इस पूरे रैकेट के खिलाफ 50 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई थीं।

जांच में सामने आया कि कई भारतीय युवाओं को इसी तरीके से विदेश ले जाकर अवैध गतिविधियों में शामिल किया गया था।

जब आरोपी और उसके सहयोगी मार्च 2024 में लाओस से मुंबई पहुंचे, तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद से आरोपी न्यायिक हिरासत में है।


विशेष NIA अदालत में ज़मानत याचिका खारिज

गिरफ्तारी के बाद आरोपी ने ज़मानत पाने के लिए विशेष NIA अदालत में याचिका दायर की थी।

हालांकि 6 दिसंबर 2024 को विशेष अदालत ने उसकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि आरोप गंभीर हैं और जांच में पर्याप्त सामग्री मौजूद है जो आरोपी की भूमिका की ओर संकेत करती है।

इसके बाद आरोपी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की।


हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दी ज़मानत

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों और साक्ष्यों का अवलोकन किया।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपी ने अन्य लोगों के साथ मिलकर एक आपराधिक साजिश रची और भारतीय नागरिकों की विदेश में तस्करी की।

अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं और इनके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 371 के तहत आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।


फरार होने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका

अदालत ने यह भी माना कि यदि आरोपी को ज़मानत पर रिहा किया जाता है, तो उसके फरार होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा यह आशंका भी जताई गई कि आरोपी बाहर आने के बाद अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि आरोपी को ज़मानत देना न्यायहित में उचित नहीं होगा।


अदालत का निष्कर्ष

इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी जेरी फिलिप्स जैकब की ज़मानत याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि भारतीय युवाओं को विदेश ले जाकर उनका शोषण किया गया और उन्हें अवैध गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।

इस निर्णय को मानव तस्करी और अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।