ममता बनर्जी की निजी ज़िंदगी पर किताब के अंश पोस्ट करने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने वकील कौस्तव बागची के खिलाफ मानहानि कार्यवाही पर लगाई रोक
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की निजी ज़िंदगी से जुड़े कथित टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर एक किताब का अंश पोस्ट करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम अंतरिम राहत दी है। शीर्ष अदालत ने वकील कौस्तव बागची के खिलाफ चल रही मानहानि की आपराधिक कार्यवाही पर फिलहाल रोक लगा दी है और मामले में नोटिस जारी करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जिसमें बागची ने अपने खिलाफ दर्ज मानहानि की शिकायत को रद्द करने की मांग की थी। यह शिकायत उनके द्वारा फेसबुक पर एक किताब का अंश साझा करने के बाद दर्ज की गई थी, जिसमें कथित तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की निजी ज़िंदगी से संबंधित कुछ टिप्पणियां की गई थीं।
मामला कैसे शुरू हुआ
मामले की शुरुआत मई 2025 में हुई, जब कौस्तव बागची—जो कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं—ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक किताब का अंश पोस्ट किया। यह किताब दीपक कुमार घोष द्वारा लिखी गई बताई जाती है और वर्ष 2015 में प्रकाशित हुई थी।
किताब में कथित तौर पर ममता बनर्जी के निजी जीवन से जुड़ी कुछ टिप्पणियां की गई थीं। बागची ने इसी किताब के कुछ हिस्सों और एक पत्र का उल्लेख करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था।
इसके बाद यह आरोप लगाया गया कि इस पोस्ट के माध्यम से मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है। इसी आधार पर मानहानि का मामला दर्ज किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने लिया संज्ञान
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 356(2) के तहत मानहानि के अपराध का संज्ञान लिया था।
इसके बाद बागची ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को रद्द किया जाए, क्योंकि उनका कहना था कि उन्होंने केवल एक प्रकाशित किताब का अंश साझा किया था।
हालांकि कलकत्ता हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर 2025 को उनके पुनर्विचार आवेदन को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद बागची ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई
सुप्रीम कोर्ट में बागची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने खंडपीठ के सामने कई महत्वपूर्ण दलीलें रखीं।
उन्होंने कहा कि जिस किताब के अंश को लेकर विवाद पैदा हुआ है, उस पर कभी किसी अदालत ने प्रतिबंध नहीं लगाया है और वह आज भी खुले तौर पर बाजार में उपलब्ध है। ऐसे में याचिकाकर्ता ने केवल उसी किताब का एक अंश सोशल मीडिया पर साझा किया था।
दवे ने यह भी कहा कि यदि किसी लोक पदाधिकारी—जैसे कि मुख्यमंत्री—के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज किया जाता है, तो कानून के अनुसार कुछ विशेष शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है।
लोक पदाधिकारी से जुड़े मामलों पर कानूनी प्रावधान
दलील के दौरान यह भी कहा गया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) की धारा 222 के तहत किसी लोक पदाधिकारी से जुड़े कथित अपराध का संज्ञान तभी लिया जा सकता है, जब वह मामला उस पदाधिकारी के सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़ा हो।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि इस मामले में जो टिप्पणियां बताई जा रही हैं, वे मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यों से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि कथित तौर पर निजी जीवन से संबंधित हैं। इसलिए इस आधार पर आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं माना जा सकता।
किताब और पत्र का संदर्भ
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि किताब के लेखक दीपक कुमार घोष ने वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर कुछ जानकारी मांगी थी।
कौस्तव बागची ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इसी पत्र और किताब के कुछ हिस्सों का उल्लेख किया था। इसके साथ ही उन्होंने कुछ टिप्पणियां भी की थीं, जिन्हें लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
इन पोस्टों के आधार पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।
शिकायत कैसे दर्ज हुई
मामले में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर द्वारा आवश्यक वैधानिक मंजूरी प्राप्त करने के बाद शिकायत दर्ज की गई थी।
यह शिकायत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 222(2) के तहत दर्ज की गई थी। इस प्रावधान के अनुसार, कुछ मामलों में मंत्री या उच्च पदाधिकारी को विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है, जिसके तहत उनके खिलाफ कथित अपराध से जुड़े मामलों में शिकायत दर्ज करने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने मामले में नोटिस जारी करते हुए फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।
अदालत के इस आदेश का अर्थ यह है कि जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक बागची के खिलाफ मानहानि की आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ेगी।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अस्थायी राहत प्रदान की है और राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम मानहानि का सवाल
यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानहानि कानून के बीच संतुलन के सवाल को भी सामने लाता है। एक ओर सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, वहीं दूसरी ओर किसी व्यक्ति—विशेष रूप से सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति—की प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार भी कानून द्वारा संरक्षित है।
ऐसे मामलों में अदालतों को यह तय करना होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है और कब किसी टिप्पणी को मानहानि माना जा सकता है।
आगे की सुनवाई
अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगा और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करेगा। अदालत को यह तय करना होगा कि क्या केवल एक प्रकाशित किताब का अंश सोशल मीडिया पर साझा करना आपराधिक मानहानि के दायरे में आता है या नहीं।
इस मामले का अंतिम फैसला न केवल संबंधित पक्षों के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि सोशल मीडिया पर किसी प्रकाशित सामग्री को साझा करने की कानूनी सीमा क्या है।
केस विवरण: Koustav Bagchi v State of West Bengal | Diary No. 14612-2026
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।