न्यायिक सेवा भर्ती में 3 वर्ष की वकालत शर्त पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाने का निर्देश
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निचली न्यायिक सेवा में भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुनवाई करते हुए सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पदों के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाई जाए। यह आदेश उस समय आया जब न्यायालय के समक्ष तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त को लेकर दायर समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि जिन उच्च न्यायालयों ने पहले ही भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर दिए हैं, वे भी आवेदन की अंतिम तिथि को 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाएं। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में जारी होने वाले नए विज्ञापनों में भी यही अंतिम तिथि निर्धारित की जानी चाहिए, ताकि सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिल सके।
भर्ती प्रक्रिया के बीच उठा विवाद
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कुछ राज्यों में निचली न्यायिक सेवा की भर्ती प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। कई राज्यों में आवेदन आमंत्रित किए जा चुके हैं और कुछ जगहों पर परीक्षा की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक समीक्षा याचिकाओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उम्मीदवारों को आवेदन करने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए।
इसी कारण अदालत ने आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाने का निर्देश दिया, ताकि उम्मीदवारों को किसी प्रकार की तात्कालिक परेशानी का सामना न करना पड़े। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समीक्षा याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई अगले सप्ताह की जाएगी।
प्रैक्टिस की अनिवार्यता पर फिलहाल राहत नहीं
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने अदालत से आग्रह किया कि जब तक समीक्षा याचिकाओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक तीन वर्ष की वकालत की अनिवार्यता को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया जाए।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि तीन वर्ष की प्रैक्टिस की शर्त सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय के आधार पर तय की गई है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि फिलहाल अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि यह शर्त रहेगी या नहीं, बल्कि यह है कि इसे लागू करने की प्रक्रिया क्या होगी और इसके लिए व्यावहारिक तौर पर क्या व्यवस्था बनाई जाए।
न्यायिक सेवा में अनुभव और परिपक्वता की आवश्यकता
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के अनुभव और परिपक्वता के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अदालतों में कार्य करने के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता, बल्कि व्यावहारिक अनुभव भी अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि न्यायिक सेवा में ऐसे लोगों का चयन होना चाहिए जो अदालतों के कामकाज को समझते हों और न्यायिक प्रक्रिया की व्यावहारिक जटिलताओं से परिचित हों।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका में थोड़ा परिपक्व व्यक्ति आना चाहिए। उनका कहना था कि केवल अदालत में बैठकर समय बिताना प्रैक्टिस का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं करता, बल्कि उम्मीदवारों को वास्तविक मुकदमों और अदालत की कार्यवाही का अनुभव होना चाहिए।
कोचिंग संस्थानों के प्रभाव पर अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रैक्टिस की अनिवार्यता को हटाने की मांग मुख्य रूप से कोचिंग संस्थानों के प्रभाव के कारण उठाई जा रही है।
उन्होंने कहा कि कई बार ऐसे उम्मीदवार सीधे विश्वविद्यालय से निकलकर कोचिंग संस्थानों के माध्यम से न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन उन्हें अदालतों के वास्तविक कामकाज का अनुभव नहीं होता।
न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा कि यह टिप्पणी उनके व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है और न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के पास अदालत का व्यावहारिक अनुभव होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विशेष छूट देना क्यों मुश्किल
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी उठाया गया कि क्या महिलाओं या दिव्यांग उम्मीदवारों को तीन वर्ष की प्रैक्टिस की शर्त से छूट दी जा सकती है।
इस पर अदालत ने कहा कि ऐसी छूट देना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में समानता और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी एक वर्ग को विशेष छूट दी जाती है तो इससे अन्य उम्मीदवारों के बीच असमानता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
पृष्ठभूमि: 20 मई 2025 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 20 मई 2025 के उस महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ा है, जिसमें निचली न्यायिक सेवा में भर्ती के लिए न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत का अनुभव अनिवार्य कर दिया गया था।
इस फैसले से पहले 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को समाप्त कर दिया था, जिसके बाद नए कानून स्नातकों को सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा देने की अनुमति मिल गई थी। लगभग दो दशकों तक यही व्यवस्था लागू रही और बड़ी संख्या में नए कानून स्नातक सीधे न्यायिक सेवा में शामिल होते रहे।
हालांकि 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के पास अदालत का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए, ताकि वे न्यायिक कार्यों को बेहतर ढंग से समझ सकें।
समीक्षा याचिकाओं में उठाए गए मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कई समीक्षा याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि तीन वर्ष की प्रैक्टिस की अनिवार्यता नए कानून स्नातकों के लिए बड़ी बाधा बन सकती है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले कई कानून स्नातकों के लिए लंबे समय तक बिना स्थिर आय के वकालत करना मुश्किल होता है।
इसके अलावा यह भी कहा गया है कि कई वकील पारंपरिक मुकदमेबाजी के बजाय लॉ फर्म, कॉर्पोरेट क्षेत्र या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्य करते हैं, जिनके लिए अदालत में नियमित रूप से प्रैक्टिस करना आवश्यक नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए भी यह शर्त समस्या पैदा कर सकती है।
इंटर्नशिप और प्रशिक्षण को बताया गया पर्याप्त अनुभव
कुछ याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि कानून की पढ़ाई के दौरान छात्रों को इंटर्नशिप, मूट कोर्ट और विभिन्न प्रकार के न्यायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिल जाता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आधुनिक विधि शिक्षा प्रणाली में पहले से ही कई ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जो छात्रों को न्यायिक कार्यप्रणाली से परिचित कराते हैं। इसलिए अलग से तीन वर्ष की वकालत की शर्त लगाना आवश्यक नहीं है।
खुली अदालत में सुनवाई का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में इन समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सुनने का निर्णय लिया था। सामान्यतः समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई न्यायाधीशों के कक्ष में होती है, लेकिन इस मामले के महत्व को देखते हुए अदालत ने खुली अदालत में सुनवाई करने का फैसला किया।
यह कदम इस बात का संकेत है कि अदालत इस मुद्दे को गंभीरता से देख रही है और सभी पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार करना चाहती है।
आगे क्या होगा
अब सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह इन समीक्षा याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई करेगा। इस सुनवाई में यह तय हो सकता है कि तीन वर्ष की प्रैक्टिस की शर्त को किस प्रकार लागू किया जाएगा या इसमें कोई संशोधन किया जाएगा।
हालांकि फिलहाल अदालत का रुख यह संकेत देता है कि न्यायिक सेवा में अनुभव और परिपक्वता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाने का आदेश उम्मीदवारों के लिए राहत लेकर आया है। इससे उन अभ्यर्थियों को भी आवेदन का अवसर मिल सकेगा जो इस मुद्दे को लेकर असमंजस की स्थिति में थे।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।