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विश्वविद्यालय परिसर में विरोध-प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध असंवैधानिक? दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न

विश्वविद्यालय परिसर में विरोध-प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध असंवैधानिक? दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न

भारत में विश्वविद्यालय केवल शिक्षा प्राप्त करने का स्थान नहीं होते, बल्कि वे लोकतांत्रिक विचारों, विमर्श और बहस के महत्वपूर्ण केंद्र भी माने जाते हैं। छात्रों द्वारा विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करना लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा रहा है। इसी संदर्भ में हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में विरोध-प्रदर्शन और सार्वजनिक सभाओं पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि सभी प्रकार के जमावड़ों पर पूरी तरह रोक लगाना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि पुलिस को केवल उन गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जिनसे कानून-व्यवस्था भंग होने की वास्तविक संभावना हो, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन या जुलूसों पर पूर्ण प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत हो सकता है।

यह मामला न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस के अधिकारों से जुड़ा है बल्कि इससे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार जैसे मूलभूत अधिकारों का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।


मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिल्ली विश्वविद्यालय में फरवरी 2026 के दौरान उत्पन्न हुआ। विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर कार्यालय द्वारा 17 फरवरी को एक अधिसूचना जारी की गई थी। इस अधिसूचना में विश्वविद्यालय परिसर में पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्रित होने, विरोध-प्रदर्शन करने और सार्वजनिक बैठक आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

यह आदेश उस समय जारी किया गया जब विश्वविद्यालय परिसर में यूजीसी की इक्विटी गाइडलाइंस को लेकर छात्रों के बीच टकराव और झड़प की घटनाएँ सामने आई थीं। प्रशासन ने तर्क दिया कि परिसर में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंध आवश्यक था।

इसके बाद कुछ कॉलेजों ने इन प्रतिबंधों को और कठोर बना दिया। उदाहरण के लिए—

  • किरोड़ीमल कॉलेज
  • दयाल सिंह कॉलेज

इन कॉलेजों ने छात्रों को चेतावनी दी कि यदि वे विरोध-प्रदर्शन में शामिल होते हैं या सोशल मीडिया पर संबंधित सामग्री साझा करते हैं, तो उनके खिलाफ निलंबन या निष्कासन (Rustication) जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

इसी अधिसूचना को चुनौती देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ फैकल्टी के छात्र उदय भदौरिया ने अदालत में याचिका दायर की।


याचिका में उठाए गए मुख्य प्रश्न

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए।

मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि—

  1. विश्वविद्यालय परिसर में सभी प्रकार की सभाओं और विरोध-प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) का उल्लंघन है।
  2. शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक समाज का अभिन्न हिस्सा है।
  3. प्रशासनिक आदेश अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट है।
  4. पुलिस और विश्वविद्यालय ने बिना पर्याप्त कारण के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 जैसी शक्तियों का सहारा लिया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि कोई विशेष घटना कानून-व्यवस्था को प्रभावित करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन पूरे परिसर में सामान्य रूप से प्रतिबंध लगाना अनुचित है।


अदालत की प्रारंभिक टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।

अदालत ने कहा कि—

“सभी प्रकार के जमावड़ों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना सही नहीं है। पुलिस को केवल कानून-व्यवस्था के वास्तविक उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई करनी चाहिए।”

पीठ ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण जुलूसों या सभाओं पर सामान्य प्रतिबंध लगाना समस्या पैदा कर सकता है और इससे नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।


धारा 144 और BNSS की धारा 163 का संदर्भ

सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से उस कानूनी आधार पर सवाल उठाया जिसके आधार पर यह प्रतिबंध लगाया गया था।

अदालत ने कहा कि—

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 144 या नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की समान धारा 163 का उपयोग केवल विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है।

इन धाराओं के उपयोग के लिए कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं—

  1. तत्काल खतरे की वास्तविक आशंका
  2. सार्वजनिक शांति को गंभीर खतरा
  3. स्थिति की आपात प्रकृति

अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों का उपयोग सामान्य प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं किया जा सकता


विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल

पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से भी सीधा सवाल किया।

अदालत ने पूछा कि यदि किसी छात्र या समूह द्वारा कानून का उल्लंघन किया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना पुलिस का काम है। ऐसे में विश्वविद्यालय को स्वयं इस प्रकार का व्यापक प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि न्यायालय विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका और अधिकारों की सीमा को लेकर गंभीरता से विचार कर रहा है।


छात्रों के व्यवहार पर अदालत की चिंता

हालांकि अदालत ने प्रतिबंध पर सवाल उठाए, लेकिन उसने छात्रों के हालिया व्यवहार पर भी चिंता व्यक्त की।

पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है और छात्रों को भी अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की सुनवाई इसलिए कर रही है क्योंकि इसमें संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों का प्रश्न शामिल है।


अनुच्छेद 19 और लोकतांत्रिक अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को कई महत्वपूर्ण स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है।

इनमें शामिल हैं—

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण और बिना हथियार के सभा करने का अधिकार
  • संगठन बनाने का अधिकार

हालांकि इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन ये प्रतिबंध—

  • तर्कसंगत होने चाहिए
  • आवश्यक होने चाहिए
  • और अत्यधिक व्यापक नहीं होने चाहिए।

इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने विश्वविद्यालय के आदेश की वैधता पर सवाल उठाया।


विश्वविद्यालयों में विरोध-प्रदर्शन की परंपरा

भारत के कई विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है।

चाहे वह शिक्षा नीति से जुड़े मुद्दे हों, सामाजिक न्याय के प्रश्न हों या राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषय—विश्वविद्यालय परिसर अक्सर विचारों के आदान-प्रदान और लोकतांत्रिक बहस के केंद्र रहे हैं।

इसी कारण कई न्यायालयों ने पहले भी कहा है कि विश्वविद्यालयों को विचारों की स्वतंत्रता का स्थान होना चाहिए।

लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से किए जाएँ।


पुलिस की भूमिका

इस मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आदेश भी विवाद का विषय बना।

पुलिस का कहना है कि परिसर में संभावित तनाव और टकराव को देखते हुए प्रतिबंध लगाया गया है।

पुलिस का आदेश फिलहाल अप्रैल तक लागू रहने वाला है।

अदालत इस बात की जांच कर रही है कि क्या यह आदेश वास्तव में आवश्यक था या यह अत्यधिक व्यापक है।


संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता

यह मामला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संतुलन की ओर संकेत करता है—

एक ओर नागरिकों का मौलिक अधिकार है कि वे अपनी बात रखें और शांतिपूर्ण विरोध करें।
दूसरी ओर राज्य और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखी जाए।

अदालत का कार्य इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना है।


निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही यह सुनवाई केवल एक विश्वविद्यालय के प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं है। यह मामला भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और प्रशासनिक अधिकारों की सीमा जैसे व्यापक प्रश्नों को सामने लाता है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सभी प्रकार के जमावड़ों पर सामान्य प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है और प्रशासन को केवल वास्तविक कानून-व्यवस्था के उल्लंघन के मामलों में ही कठोर कदम उठाने चाहिए।

यह मामला आने वाले समय में यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है कि विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएँ क्या होंगी। साथ ही यह भी स्पष्ट करेगा कि प्रशासनिक शक्ति और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाना चाहिए।