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मुस्लिम ‘हिबा’ को रजिस्ट्रेशन से छूट देने वाली धारा 129 को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार,

मुस्लिम ‘हिबा’ को रजिस्ट्रेशन से छूट देने वाली धारा 129 को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार, कहा—विधि आयोग के पास जाएं

मुस्लिम कानून के तहत दिए जाने वाले उपहार यानी ‘हिबा’ (Hiba) को पंजीकरण से छूट देने वाले प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर Supreme Court of India ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह ऐसा मुद्दा है जिस पर विशेषज्ञ स्तर पर विचार किया जाना चाहिए, इसलिए याचिकाकर्ता को Law Commission of India के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी जाती है।

यह मामला Transfer of Property Act, 1882 की धारा 129 से जुड़ा था, जो मुस्लिम कानून के तहत किए गए उपहार (हिबा) को इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों से छूट प्रदान करती है। अदालत ने कहा कि ऐसे विधायी और नीतिगत प्रश्नों पर विचार करना विधि आयोग और संसद जैसे मंचों के लिए अधिक उपयुक्त है।


किस बेंच ने सुना मामला

इस याचिका पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस Vipul Pancholi की खंडपीठ ने की।

पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद यह कहा कि अदालत इस याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं देखती और याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह इस विषय को विधि आयोग के समक्ष उठाएं, ताकि विशेषज्ञ स्तर पर इसकी समीक्षा की जा सके।


क्या कहती है धारा 129

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 129 के अनुसार मुस्लिम कानून के तहत किए गए उपहार, जिन्हें हिबा कहा जाता है, इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों से मुक्त रहते हैं।

इसका अर्थ यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार दिए गए उपहार कई मामलों में पंजीकरण (registration) और स्टांप ड्यूटी की अनिवार्यता से मुक्त हो सकते हैं, विशेषकर तब जब उपहार मौखिक रूप से दिया गया हो और उसे मुस्लिम कानून की शर्तों के अनुसार वैध माना गया हो।

मुस्लिम कानून के अनुसार किसी हिबा को वैध मानने के लिए सामान्यतः तीन आवश्यक तत्व माने जाते हैं—

  1. दाता द्वारा उपहार देने की स्पष्ट घोषणा
  2. प्राप्तकर्ता द्वारा उसे स्वीकार करना
  3. संपत्ति का वास्तविक हस्तांतरण

इन शर्तों के पूरा होने पर मौखिक उपहार भी मान्य माना जा सकता है।


याचिकाकर्ता की दलील

इस मामले में याचिका Hari Shankar Jain द्वारा दायर की गई थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि धारा 129 के कारण मुस्लिम कानून के तहत दिए जाने वाले उपहारों को पंजीकरण और स्टांप ड्यूटी से छूट मिल जाती है, जिससे सरकार को राजस्व का नुकसान होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रावधान धर्म के आधार पर भेदभाव पैदा करता है, क्योंकि अन्य धर्मों के लोगों द्वारा दिए गए उपहारों के लिए पंजीकरण और स्टांप ड्यूटी अनिवार्य है, जबकि मुसलमानों के लिए ऐसा नहीं है।

याचिकाकर्ता के अनुसार यह व्यवस्था संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है और इसे समाप्त किया जाना चाहिए।


अदालत के सवाल

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से यह पूछा कि वह इस कानून से व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस प्रावधान से सरकारी राजस्व को नुकसान होता है, तो यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है और संसद चाहें तो कानून में संशोधन कर सकती है।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है, तो इसे पहले संसद में या किसी सांसद द्वारा क्यों नहीं उठाया गया।


जस्टिस बागची की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इस मुद्दे को एक अलग दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि हिबा को केवल धर्म के आधार पर भेदभाव के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उपहार देने वाला व्यक्ति मुस्लिम हो सकता है, लेकिन उपहार प्राप्त करने वाला व्यक्ति किसी अन्य धर्म का भी हो सकता है।

इस प्रकार यह प्रावधान केवल मुसलमानों को लाभ देने के लिए नहीं है, बल्कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ की पारंपरिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।


विधायी वर्गीकरण का प्रश्न

अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि संसद ने मौखिक उपहारों को पंजीकरण से छूट देने के लिए एक विशेष वर्गीकरण (classification) किया है।

कानून में ऐसे वर्गीकरण तब तक स्वीकार्य माने जाते हैं जब तक वे तर्कसंगत हों और उनका कोई वैध उद्देश्य हो।

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यह एक नीतिगत और विधायी मुद्दा है, जिस पर अदालत के बजाय संसद या विधि आयोग जैसे संस्थानों द्वारा विचार किया जाना अधिक उचित है।


विधि आयोग को उचित मंच बताया

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि याचिकाकर्ता इस प्रावधान में बदलाव चाहते हैं, तो उन्हें इस विषय को भारत के विधि आयोग के समक्ष उठाना चाहिए।

विधि आयोग एक विशेषज्ञ निकाय है जो कानूनों की समीक्षा करता है और उनमें सुधार या संशोधन के लिए सरकार को सिफारिशें देता है।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार के जटिल और व्यापक प्रभाव वाले मुद्दों पर विधि आयोग द्वारा विस्तृत अध्ययन करना अधिक उपयुक्त होगा।


व्यक्तिगत कानून और संवैधानिक बहस

यह मामला भारत में लंबे समय से चल रही उस बहस से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन की चर्चा होती रही है।

भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और उपहार जैसे कई विषयों पर अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं।

समय-समय पर इन कानूनों की संवैधानिकता को अदालतों में चुनौती दी जाती रही है। हालांकि कई मामलों में अदालतें यह मानती हैं कि ऐसे मुद्दों पर व्यापक सामाजिक और विधायी विचार-विमर्श की आवश्यकता होती है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को विधि आयोग के पास जाने की अनुमति देना यह दर्शाता है कि अदालत इस मुद्दे को एक व्यापक नीतिगत प्रश्न के रूप में देखती है।

अदालत का मानना है कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 129 जैसे प्रावधानों की समीक्षा विशेषज्ञ निकाय और संसद के स्तर पर की जानी चाहिए।

इस निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि सभी विधायी प्रावधानों की संवैधानिकता का प्रश्न सीधे न्यायिक हस्तक्षेप का विषय नहीं होता, बल्कि कई मामलों में पहले नीति निर्माण और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही समाधान तलाशा जाना चाहिए।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मुद्दे को वास्तव में विधि आयोग के समक्ष उठाया जाता है और भविष्य में इस प्रावधान में किसी प्रकार का संशोधन प्रस्तावित किया जाता है या नहीं।