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दिव्यांग कोटे में नियुक्त कर्मचारियों की पुनः मेडिकल जांच वैध: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को ठहराया सही

दिव्यांग कोटे में नियुक्त कर्मचारियों की पुनः मेडिकल जांच वैध: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को ठहराया सही

दिव्यांग (Persons with Disabilities – PwD) कोटे में नियुक्त सरकारी कर्मचारियों की विकलांगता की दोबारा जांच कराने के राज्य सरकार के निर्णय को Rajasthan High Court ने वैध ठहराया है। अदालत ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें इस आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस Ashok Kumar Jain की एकल पीठ ने कहा कि राज्य सरकार का यह कर्तव्य है कि वह आरक्षण नीतियों को पारदर्शी और कानूनी तरीके से लागू करे, ताकि समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि समावेशी व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है जब उसके दुरुपयोग को रोका जाए और वास्तविक पात्र व्यक्तियों को ही उसका लाभ मिले।


क्या था विवाद

यह मामला राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा 28 अगस्त 2025 को जारी किए गए एक प्रशासनिक आदेश से जुड़ा था। इस आदेश के तहत निर्देश दिया गया था कि वे कर्मचारी जो दिव्यांग कोटे के तहत सरकारी सेवा में नियुक्त हुए हैं और जिनकी नियुक्ति को पाँच वर्ष या उससे अधिक समय हो चुका है, उनकी “बेंचमार्क डिसेबिलिटी” का अनिवार्य पुनर्मूल्यांकन (reassessment) कराया जाएगा।

सरकार ने यह निर्णय तब लिया जब कुछ मामलों में यह आशंका सामने आई कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में अनियमितताएँ हुई हैं। प्रशासन का कहना था कि यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पात्र दिव्यांग व्यक्तियों को ही मिल रहा है।


याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें

इस आदेश के खिलाफ कई कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएँ दाखिल कीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी नियुक्ति वैध तरीके से हुई है और उनके दिव्यांगता प्रमाणपत्र Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी किए गए थे।

उन्होंने तर्क दिया कि एक बार सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र जारी हो जाने के बाद राज्य सरकार को उस पर संदेह करने या दोबारा जांच कराने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का यह निर्णय मनमाना है और इससे उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। उन्होंने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 16 और अनुच्छेद 21 का हवाला दिया।

उनका कहना था कि यह आदेश समानता के अधिकार, सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि सरकार का यह कदम “रिज़नेबल अकॉमोडेशन” (reasonable accommodation) के सिद्धांत के खिलाफ है, जो दिव्यांग व्यक्तियों को उनके अधिकारों के प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करने की बात करता है।


राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अदालत में यह कहा गया कि प्रशासन का उद्देश्य किसी कर्मचारी को परेशान करना नहीं है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना है।

सरकार ने यह भी बताया कि कुछ मामलों में यह पाया गया था कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में अनियमितताएँ हुई हैं और कुछ लोगों ने कथित रूप से गलत या फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त की है।

ऐसी स्थिति में सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह पूरे तंत्र की समीक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक पात्र व्यक्तियों को ही मिले।


अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश को वैध ठहराया और सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि RPWD अधिनियम, 2016 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि एक बार जारी हुआ दिव्यांगता प्रमाणपत्र हर परिस्थिति में अंतिम और बाध्यकारी होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कानून में फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर लाभ लेने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान है, तो इसका मतलब है कि कानून बनाने वालों को पहले से इस प्रकार की संभावना का अंदेशा था। इसलिए सरकार द्वारा पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू करना कानून के खिलाफ नहीं है।


सामान्य आदेश लागू करने की अनुमति

अदालत ने यह भी कहा कि जब बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ होती हैं, तो हर मामले में अलग-अलग जांच करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सरकार सभी कर्मचारियों के लिए एक सामान्य आदेश (general order) लागू कर सकती है, ताकि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष और व्यापक समीक्षा की जा सके।

कोर्ट ने कहा कि सरकारी पद और सार्वजनिक धन दोनों ही जनता से जुड़े होते हैं, इसलिए सरकार का दायित्व है कि वह किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या गलत दावों को रोकने के लिए उचित कदम उठाए।


आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर जोर

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करना है।

लेकिन यदि इस व्यवस्था का दुरुपयोग होने लगे और अयोग्य लोग इसका लाभ उठाने लगें, तो इससे वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों का हनन होता है।

इसलिए सरकार द्वारा समय-समय पर इस व्यवस्था की समीक्षा करना और अनियमितताओं को रोकने के लिए कदम उठाना आवश्यक है।


अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में हर सरकार बदलने के साथ कर्मचारियों को बार-बार पुनर्मूल्यांकन के लिए मजबूर किया जाए, तो ऐसी स्थिति में कर्मचारी उस कार्रवाई को चुनौती दे सकते हैं।

लेकिन वर्तमान मामले में राज्य सरकार का आदेश किसी राजनीतिक या मनमाने उद्देश्य से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी किया गया है।

इसलिए अदालत ने यह माना कि यह आदेश न तो किसी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन करता है और न ही किसी मौलिक अधिकार का।


निष्कर्ष

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बनाए रखने के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को यह अधिकार है कि वह आरक्षण नीतियों के सही क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

दिव्यांग कोटे में नियुक्त कर्मचारियों की विकलांगता का पुनर्मूल्यांकन कराने का आदेश इसी उद्देश्य से जारी किया गया था और यह कानून के अनुरूप है।

इस निर्णय के साथ ही अदालत ने यह संदेश दिया है कि आरक्षण व्यवस्था का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जो वास्तव में इसके पात्र हैं, और किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या गलत दावों को रोकना सरकार की जिम्मेदारी है।