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दिल्ली यूनिवर्सिटी में मीटिंग्स पर बैन को चुनौती: हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस, कहा– ‘पूर्ण प्रतिबंध’ पर उठते हैं संवैधानिक सवाल

दिल्ली यूनिवर्सिटी में मीटिंग्स पर बैन को चुनौती: हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस, कहा– ‘पूर्ण प्रतिबंध’ पर उठते हैं संवैधानिक सवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में सार्वजनिक मीटिंग्स और प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद सामने आया है। इस मामले में Delhi High Court ने गुरुवार (12 मार्च) को याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा।

याचिकाओं में University of Delhi के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत विश्वविद्यालय परिसर में एक महीने के लिए सार्वजनिक मीटिंग्स, जुलूस, प्रदर्शन और विरोध गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी संकेत दिया कि मीटिंग्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के संदर्भ में गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।


किस बेंच ने की सुनवाई

मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश Devendra Kumar Upadhyaya और जस्टिस Tejas Karia की डिवीजन बेंच ने की।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने 17 फरवरी को एक आदेश जारी कर परिसर में किसी भी प्रकार की सार्वजनिक मीटिंग्स, जुलूस, धरना या प्रदर्शन पर एक महीने के लिए प्रतिबंध लगा दिया था।

इसके अलावा अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि सिविल लाइंस पुलिस सब-डिवीजन ने भी CrPC की धारा 144 के तहत एक आदेश जारी किया था, जिसे अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है।


क्यों लगाया गया था प्रतिबंध

विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर द्वारा जारी आदेश में कहा गया था कि परिसर में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।

हालांकि, बाद में विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ कॉलेजों ने भी इसी तरह के निर्देश जारी कर दिए। इनमें विशेष रूप से Kirori Mal College और Dayal Singh College शामिल हैं।

इन निर्देशों को भी याचिकाकर्ताओं ने अदालत में चुनौती दी है।


याचिकाकर्ताओं का तर्क

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने तर्क दिया कि विश्वविद्यालय का यह आदेश भारत के संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

उन्होंने कहा कि यह आदेश विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b) और अनुच्छेद 19(1)(d) का उल्लंघन है।

इन अनुच्छेदों के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार और देश के भीतर स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार प्राप्त है।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विश्वविद्यालय परिसर में पूरी तरह से सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक लगाना इन अधिकारों को अनुचित रूप से सीमित करता है।


जमीनी स्थिति पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि इस आदेश का प्रभाव केवल बड़े प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर सामान्य छात्र गतिविधियों पर भी पड़ा है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक स्थिति यह है कि छात्र कॉलेज परिसर के अंदर चाय या खाने के स्टॉल पर भी एक साथ खड़े नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि प्रशासन इसे भी सार्वजनिक जमावड़े के रूप में देख रहा है।

वकील ने यह भी कहा कि आदेश में सार्वजनिक मीटिंग्स पर रोक लगाई गई है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर इस प्रकार का पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।


पुलिस का पक्ष

दूसरी ओर, Delhi Police की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि यह प्रतिबंध सुरक्षा कारणों से लगाया गया था।

पुलिस के अनुसार उन्हें खुफिया जानकारी मिली थी कि छात्रों के दो गुटों के बीच टकराव की संभावना है।

पुलिस ने अदालत को यह भी बताया कि पहले भी एक घटना में एक पुलिस थाने का घेराव किया गया था, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया था।

इसी प्रकार की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए ही सिविल लाइंस क्षेत्र में CrPC की धारा 144 के तहत आदेश जारी किया गया।


कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंसा करता है या कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

लेकिन अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या मीटिंग्स और सभाओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना उचित है।

अदालत ने कहा:
“अगर कोई हिंसा कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करें, लेकिन मीटिंग्स पर पूरी तरह से बैन लगाना क्या अनुच्छेद 19 का उल्लंघन नहीं होगा?”

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सरकार और प्रशासन को केवल ‘उचित प्रतिबंध’ (reasonable restrictions) लगाने का अधिकार है, न कि पूर्ण और व्यापक प्रतिबंध लगाने का।


संभव समाधान की ओर संकेत

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो तो कुछ शर्तों और सीमाओं के साथ मीटिंग्स की अनुमति दी जा सकती है।

इस पर पुलिस की वकील ने अदालत को बताया कि वह इस संबंध में संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराएंगी।


विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न

यह मामला केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई विश्वविद्यालयों में समय-समय पर उठने वाले उस बड़े प्रश्न से जुड़ा है, जिसमें यह तय करना होता है कि परिसर में छात्रों को अभिव्यक्ति और विरोध का कितना अधिकार होना चाहिए।

विश्वविद्यालयों को अक्सर एक ऐसे स्थान के रूप में देखा जाता है जहां विचारों का आदान-प्रदान, बहस और संवाद होता है। इसलिए कई बार अदालतें भी यह मानती हैं कि ऐसे परिसरों में लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए कुछ हद तक खुलापन होना चाहिए।

हालांकि, साथ ही यह भी जरूरी है कि परिसर में शांति और सुरक्षा बनी रहे और किसी भी प्रकार की हिंसा या टकराव की स्थिति न बने।


निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहा यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है।

एक ओर प्रशासन का दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे, वहीं दूसरी ओर छात्रों और नागरिकों को संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का भी सम्मान किया जाना चाहिए।

अदालत ने फिलहाल नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और यह संकेत दिया है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय उचित और संतुलित प्रतिबंध ही संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप माने जा सकते हैं।

अब इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान अदालत यह तय करेगी कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी आदेश और पुलिस द्वारा लगाया गया प्रतिबंध संविधान के अनुरूप है या नहीं।