घर खरीदारों के साथ धोखाधड़ी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बैंकों और बिल्डरों के ‘अपवित्र गठजोड़’ की सीबीआई जांच में देरी पर जताई नाराजगी
देश में रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े एक बड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य हिस्सों में घर खरीदारों के साथ कथित धोखाधड़ी के मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की धीमी जांच पर नाराजगी व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि जांच में देरी से उन हजारों फ्लैट खरीदारों की पीड़ा और बढ़ेगी, जो पहले ही बिल्डरों और वित्तीय संस्थानों की वजह से आर्थिक और मानसिक दबाव झेल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत जांच के निष्कर्ष का अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं कर सकती। अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इस मामले में की जा रही प्रारंभिक जांच को जल्द से जल्द नियमित मामलों यानी एफआईआर में बदलकर आगे की कार्रवाई करे।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के उस रुख पर आपत्ति जताई, जिसमें एजेंसी ने सुझाव दिया था कि सबवेंशन स्कीम से जुड़े कुछ मामलों को जांच के लिए राज्य की एजेंसियों को स्थानांतरित किया जा सकता है।
अदालत ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि इतने बड़े और व्यापक प्रभाव वाले मामलों को अलग-अलग एजेंसियों में बांटना उचित नहीं होगा। इससे जांच प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है तथा पीड़ित घर खरीदारों को न्याय मिलने में और देरी हो सकती है।
पीठ ने कहा कि अदालत इस बात को लेकर गंभीर है कि जिन लोगों ने जीवन भर की जमा-पूंजी से घर खरीदने का सपना देखा, वे आज कानूनी लड़ाई और आर्थिक दबाव में फंसे हुए हैं।
“अपवित्र गठजोड़” की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि बिल्डरों और वित्तीय संस्थानों के बीच मिलीभगत रही है। अदालत ने इस कथित साठगांठ को “अपवित्र गठजोड़” करार दिया।
अदालत के अनुसार, अगर बिल्डर, डेवलपर और बैंक आपसी समझ से ऐसी योजनाएं बनाते हैं जिनसे घर खरीदारों को नुकसान होता है, तो यह गंभीर आर्थिक अनियमितता का मामला बनता है।
इसी कारण अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इन सभी मामलों की व्यापक जांच करे और किसी भी स्तर पर जांच को टुकड़ों में न बांटे।
1200 से अधिक घर खरीदारों की याचिकाएं
यह मामला 1200 से अधिक घर खरीदारों द्वारा दायर याचिकाओं के समूह से जुड़ा है। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कई आवास परियोजनाओं में सबवेंशन योजना के तहत फ्लैट बुक करने वाले खरीदारों को गंभीर वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है।
मुख्य याचिका हिमांशु सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिसे अधिवक्ता अक्षय श्रीवास्तव के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम की विभिन्न आवास परियोजनाओं में फ्लैट खरीदे थे। इन परियोजनाओं में बिल्डरों ने सबवेंशन योजना के तहत आकर्षक प्रस्ताव देकर लोगों को निवेश के लिए प्रेरित किया।
सबवेंशन स्कीम क्या है
सबवेंशन स्कीम रियल एस्टेट क्षेत्र में प्रचलित एक वित्तीय व्यवस्था है, जिसके तहत बैंक घर खरीदार को ऋण स्वीकृत करते हैं और उस राशि को सीधे बिल्डर के खाते में स्थानांतरित कर देते हैं।
इस योजना की शर्तों के अनुसार, जब तक फ्लैट का निर्माण पूरा होकर खरीदार को सौंपा नहीं जाता, तब तक ऋण की ईएमआई बिल्डर द्वारा चुकाई जाती है।
इस व्यवस्था में तीन पक्ष शामिल होते हैं—घर खरीदार, बिल्डर और बैंक। तीनों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता किया जाता है, जिसमें यह तय होता है कि फ्लैट का कब्जा मिलने तक ईएमआई का भुगतान बिल्डर करेगा।
विवाद की शुरुआत
समस्या तब शुरू हुई जब कई परियोजनाओं में बिल्डरों ने बैंकों को ईएमआई का भुगतान करना बंद कर दिया।
जब बिल्डरों ने भुगतान में चूक की, तो बैंकों ने सीधे घर खरीदारों से ईएमआई की मांग शुरू कर दी।
इस स्थिति में खरीदार दोहरी परेशानी में फंस गए। एक ओर उन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिला, दूसरी ओर बैंक उनसे ऋण की किश्तें मांगने लगे।
कई खरीदारों ने आरोप लगाया कि उन्होंने बिल्डरों के वादों और बैंकों की वित्तीय योजनाओं पर भरोसा करके फ्लैट बुक किए थे, लेकिन अब उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
इन परिस्थितियों में घर खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई को जांच का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं की संभावना हो सकती है।
इसलिए अदालत ने यह सुनिश्चित करना जरूरी समझा कि जांच निष्पक्ष और व्यापक तरीके से की जाए।
जांच में देरी पर चिंता
हालिया सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जांच प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है।
सीबीआई ने कुछ मामलों को राज्य की एजेंसियों को सौंपने की बात कही थी, जिस पर अदालत ने असहमति जताई।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर जांच लंबी खिंचती रही, तो इससे केवल पीड़ित घर खरीदारों की परेशानी बढ़ेगी।
निगरानी समिति बनाने का संकेत
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच की गति में सुधार नहीं होता, तो वह इस मामले में एक निगरानी समिति गठित करने पर विचार कर सकती है।
इस समिति का उद्देश्य सीबीआई की जांच प्रक्रिया की निगरानी करना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच समयबद्ध और प्रभावी तरीके से पूरी हो।
घर खरीदारों की स्थिति
इस मामले में शामिल कई घर खरीदारों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन की बचत और बैंक ऋण के आधार पर फ्लैट खरीदे थे।
कुछ लोगों ने तो अपने परिवार की आर्थिक योजनाएं भी इन आवास परियोजनाओं पर आधारित कर ली थीं।
लेकिन परियोजनाओं के अधूरे रहने और वित्तीय विवादों के कारण वे लंबे समय से अनिश्चितता की स्थिति में जी रहे हैं।
रियल एस्टेट क्षेत्र पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का प्रभाव केवल कुछ परियोजनाओं तक सीमित नहीं है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि बैंकों और बिल्डरों के बीच मिलीभगत हुई है, तो इससे रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही के नए मानदंड स्थापित हो सकते हैं।
साथ ही यह मामला भविष्य में ऐसी योजनाओं के संचालन पर भी असर डाल सकता है।
निष्कर्ष
दिल्ली-एनसीआर में घर खरीदारों से जुड़ा यह विवाद देश के रियल एस्टेट क्षेत्र की गंभीर चुनौतियों को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट संकेत दिया है कि वह जांच में देरी को स्वीकार नहीं करेगा और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सख्त रुख अपनाएगा।
अदालत के निर्देशों के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि सीबीआई जांच को तेज करेगी और पूरे मामले की सच्चाई सामने लाएगी।
आने वाले समय में इस मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया न केवल प्रभावित घर खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण होगी, बल्कि यह रियल एस्टेट और बैंकिंग क्षेत्र में जवाबदेही तय करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।