5 साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के दोषी को मिली मौत की सजा पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: अपील की सुनवाई तक फांसी के अमल पर स्थगन
देश की सर्वोच्च अदालत ने मध्यप्रदेश में एक अत्यंत संवेदनशील और गंभीर आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में पांच वर्ष की एक बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को दी गई मौत की सजा के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने यह आदेश उस अपील की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें दोषी ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ—जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया—ने अपीलकर्ता अतुल निहाले की याचिका पर विचार करते हुए कहा कि अपील की अंतिम सुनवाई और निर्णय होने तक मृत्युदंड के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी। यह आदेश 10 मार्च 2026 को पारित किया गया।
मामला क्या है
यह मामला मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में वर्ष 2024 में हुई एक दर्दनाक घटना से जुड़ा है। उस समय पांच वर्ष की एक बच्ची के लापता होने की सूचना पुलिस को दी गई थी। बच्ची की मां ने सितंबर 2024 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी बेटी अचानक लापता हो गई है।
शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने बच्ची की तलाश के लिए व्यापक अभियान शुरू किया। खोजबीन के दौरान पुलिस को एक स्थान से दुर्गंध आने की सूचना मिली। इसके बाद पुलिस ईदगाह हिल्स क्षेत्र में स्थित एक फ्लैट तक पहुंची, जहां जांच करने पर बाथरूम में एक प्लास्टिक टैंक के अंदर बच्ची का शव बरामद हुआ।
इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया और पुलिस ने मामले की जांच तेज कर दी।
आरोपी के खिलाफ कार्रवाई
पुलिस जांच के बाद अतुल निहाले नामक व्यक्ति को इस मामले में आरोपी बनाया गया। जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों के आधार पर उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न और हत्या के आरोप लगाए गए।
मामले की सुनवाई निचली अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कई साक्ष्य और गवाह पेश किए, जिनके आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया।
निचली अदालत ने मार्च 2025 में दिए गए अपने फैसले में आरोपी को दोषी करार देते हुए उसे मौत की सजा सुनाई। अदालत ने इस मामले को अत्यंत गंभीर और जघन्य अपराध माना।
हाईकोर्ट में अपील
निचली अदालत के फैसले के बाद आरोपी ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील में उसने अपनी दोषसिद्धि और सजा दोनों को चुनौती दी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने भी यह माना कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त हैं और आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध होता है।
इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मृत्युदंड के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अपील की सुनवाई और अंतिम निपटारे तक फांसी की सजा लागू नहीं की जाएगी।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मामले से संबंधित सभी मूल दस्तावेज और रिकॉर्ड हाईकोर्ट तथा निचली अदालत से मंगवाए जाएं ताकि अपील की सुनवाई के दौरान उन्हें विस्तार से देखा जा सके।
परिवीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह अपीलकर्ता से संबंधित सभी परिवीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट 12 सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।
इन रिपोर्टों के माध्यम से अदालत यह जानना चाहती है कि आरोपी की पृष्ठभूमि, सामाजिक परिस्थितियां और अन्य संबंधित पहलू क्या हैं।
ऐसी रिपोर्टें कई मामलों में अदालत को यह समझने में मदद करती हैं कि आरोपी की परिस्थितियां क्या थीं और क्या उसके व्यवहार या व्यक्तित्व में कोई सुधार की संभावना है।
जेल अधीक्षक को निर्देश
अदालत ने भोपाल स्थित केंद्रीय कारागार के अधीक्षक को भी निर्देश दिया है कि वह आरोपी के जेल में रहते हुए किए गए कार्यों, उसके व्यवहार और आचरण से संबंधित एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके अदालत के सामने पेश करें।
यह रिपोर्ट भी 12 सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
अदालत इस रिपोर्ट के माध्यम से यह जानना चाहती है कि आरोपी का जेल में आचरण कैसा रहा है और क्या उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन या सुधार दिखाई देता है।
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। अदालत ने भोपाल मेमोरियल अस्पताल और अनुसंधान केंद्र के प्रमुख को आदेश दिया कि वे आरोपी का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराने के लिए एक विशेषज्ञ टीम गठित करें।
इस टीम का उद्देश्य आरोपी की मानसिक स्थिति और मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल का आकलन करना होगा।
अदालत ने कहा कि यह मूल्यांकन रिपोर्ट भी 12 सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जानी चाहिए।
गोपनीय साक्षात्कार की व्यवस्था
अदालत ने जेल अधीक्षक को यह भी निर्देश दिया कि आरोपी के साक्षात्कार के दौरान गोपनीयता सुनिश्चित की जाए।
इसके लिए कहा गया कि साक्षात्कार एक अलग कमरे में आयोजित किए जाएं, जहां कोई जेल अधिकारी या पुलिसकर्मी उपस्थित न हो।
अदालत ने यह भी अनुमति दी कि इन साक्षात्कारों को रिकॉर्ड करने के लिए ऑडियो रिकॉर्डर का उपयोग किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि साक्षात्कार की प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से पूरी हो सके।
अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 16 सप्ताह बाद निर्धारित की है। इस दौरान अदालत के समक्ष सभी आवश्यक रिपोर्टें और दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएंगे।
इन रिपोर्टों और रिकॉर्ड के आधार पर अदालत आगे यह तय करेगी कि आरोपी की अपील पर अंतिम निर्णय क्या होगा।
मृत्युदंड से जुड़े कानूनी सिद्धांत
भारत में मृत्युदंड को केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि फांसी की सजा केवल “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” यानी सबसे दुर्लभ मामलों में ही दी जानी चाहिए।
इस सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्युदंड का उपयोग अत्यंत सावधानी और गंभीरता के साथ किया जाए।
इसी कारण जब किसी मामले में मृत्युदंड दिया जाता है, तो उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट दोनों स्तरों पर उसकी विस्तृत समीक्षा की जाती है।
न्यायिक प्रक्रिया का महत्व
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मृत्युदंड के अमल पर रोक लगाना न्यायिक प्रक्रिया का एक सामान्य और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब कोई आरोपी उच्चतम न्यायालय में अपील करता है, तो अदालत यह सुनिश्चित करती है कि अंतिम निर्णय से पहले सभी पहलुओं की पूरी तरह से जांच हो।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह है कि न्यायिक निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष और न्यायसंगत हो।
निष्कर्ष
भोपाल में पांच साल की बच्ची के साथ हुई इस दर्दनाक घटना ने समाज को गहरे स्तर पर झकझोर दिया था। निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा दी थी।
हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील के कारण मामले की अंतिम समीक्षा हो रही है और इसी प्रक्रिया के तहत अदालत ने फिलहाल मृत्युदंड के अमल पर रोक लगा दी है।
आगामी सुनवाई में अदालत सभी रिपोर्टों और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद यह तय करेगी कि आरोपी की दोषसिद्धि और सजा के संबंध में अंतिम निर्णय क्या होगा।
इस प्रकार यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में अंतिम न्यायिक परीक्षण की प्रक्रिया से गुजर रहा है, जिसका निर्णय भविष्य में इस गंभीर अपराध के संबंध में अंतिम कानूनी स्थिति को स्पष्ट करेगा।