कृषि भूमि पर अवैध प्लाटिंग के खिलाफ हाई कोर्ट सख्त: हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण को एक सप्ताह में आदेश वापस लेने का निर्देश
उत्तराखंड में कृषि और बागों की भूमि पर अवैध प्लाटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमति दिए जाने के मामले में हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण (एचआरडीए) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह कृषि और बागों की भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति देने वाला अपना आदेश एक सप्ताह के भीतर वापस ले। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि प्राधिकरण ने निर्धारित समय सीमा में आदेश वापस नहीं लिया, तो उसके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्राधिकरण का आदेश सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व आदेशों की स्पष्ट अवहेलना है। अदालत ने कहा कि न्यायालयों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इस प्रकार का निर्णय लेना गंभीर मामला है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
जनहित याचिका की पृष्ठभूमि
यह मामला हरिद्वार निवासी अतुल कुमार चौहान द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि राज्य में कृषि और बागों की भूमि पहले से ही सीमित है और यदि इन भूमि पर बड़े पैमाने पर प्लाटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में कृषि गतिविधियों के लिए भूमि का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
याचिका में कहा गया कि हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण ने अपनी बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित करके कृषि और बागों की भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति देने का आदेश जारी कर दिया। इतना ही नहीं, प्राधिकरण ने दो अधिवक्ताओं की विधिक राय का हवाला देते हुए इस प्रकार की प्लाटिंग को अनुमति भी प्रदान कर दी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह निर्णय न्यायालयों के पूर्व आदेशों के सीधे-सीधे विपरीत है और इससे हरिद्वार क्षेत्र में कृषि भूमि तेजी से कम होती जा रही है।
2018 का हाई कोर्ट आदेश
इस मामले की जड़ें वर्ष 2018 के एक महत्वपूर्ण आदेश से जुड़ी हैं। 19 जून 2018 को उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान स्पष्ट आदेश दिया था कि राज्य में कृषि और बागों की भूमि पर प्लाटिंग या ग्रुप हाउसिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने उस समय कहा था कि राज्य में कृषि भूमि सीमित है और यदि उसे बड़े पैमाने पर आवासीय या व्यावसायिक उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव राज्य की कृषि व्यवस्था और पर्यावरण पर पड़ेगा।
इस आदेश का उद्देश्य राज्य में अनियंत्रित शहरीकरण को रोकना और कृषि भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
हाई कोर्ट के इस आदेश को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करते हुए हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप की मांग की थी।
हालांकि, 30 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने इस विशेष अनुमति याचिका को निस्तारित करते हुए हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार को आदेश में किसी प्रकार का संशोधन कराना है तो वह हाई कोर्ट के समक्ष जा सकती है।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि हाई कोर्ट का आदेश प्रभावी बना रहेगा।
सरकार ने हाई कोर्ट का रुख नहीं किया
सुप्रीम कोर्ट ने यह विकल्प दिया था कि राज्य सरकार यदि चाहे तो आदेश में संशोधन के लिए हाई कोर्ट के समक्ष आवेदन कर सकती है।
लेकिन याचिका में यह कहा गया कि राज्य सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। इसके बावजूद हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण ने अपनी बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित करके कृषि और बागों की भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति दे दी।
याचिकाकर्ता के अनुसार यह कदम न केवल न्यायालय के आदेश की अवहेलना है बल्कि कानून के शासन के सिद्धांत के भी विपरीत है।
2023 की सुनवाई और अदालत का आदेश
इस मामले में 2023 में भी हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट निर्देश दिए थे। चार सितंबर 2023 को अदालत ने कहा था कि यदि कृषि भूमि पर प्लाटिंग पर रोक का आदेश प्रभावी है, तो उसका पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए।
इसके बावजूद याचिकाकर्ता का कहना है कि प्राधिकरण ने उस आदेश का पालन नहीं किया और कृषि भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति देना जारी रखा।
इसी कारण याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि न्यायालय अपने पूर्व आदेशों का पालन सुनिश्चित कराए।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों के स्पष्ट आदेश मौजूद हैं, तब किसी भी प्राधिकरण को उनके विपरीत निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकारी एजेंसियां या प्राधिकरण न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करने लगें, तो कानून के शासन की व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी।
इसी कारण अदालत ने एचआरडीए को एक सप्ताह के भीतर अपना आदेश वापस लेने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी।
कृषि भूमि की सुरक्षा का मुद्दा
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू कृषि भूमि की सुरक्षा से भी जुड़ा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण कई राज्यों में कृषि भूमि का उपयोग आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया अनियंत्रित रूप से जारी रहती है, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां पहले से ही समतल भूमि सीमित है, वहां कृषि भूमि की सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पर्यावरण और शहरी नियोजन का प्रश्न
कृषि भूमि पर अनियंत्रित प्लाटिंग का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पर्यावरण, जल संसाधनों और शहरी नियोजन पर भी पड़ता है।
जब बड़ी मात्रा में कृषि भूमि को आवासीय कॉलोनियों में बदल दिया जाता है, तो इससे भूजल स्तर, हरित क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है।
इस कारण कई विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी विकास योजनाओं को पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाना चाहिए।
न्यायिक हस्तक्षेप का महत्व
इस मामले में हाई कोर्ट का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि न्यायपालिका पर्यावरण और सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
जनहित याचिका की व्यवस्था के माध्यम से नागरिक भी ऐसे मुद्दों को अदालत के सामने ला सकते हैं जो व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़े हों।
इस मामले में भी एक स्थानीय नागरिक द्वारा दायर जनहित याचिका ने एक बड़े प्रशासनिक निर्णय को न्यायिक समीक्षा के दायरे में ला दिया।
आगे की कार्यवाही
अब इस मामले में सबकी नजर हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण की अगली कार्रवाई पर है। यदि प्राधिकरण अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए अपना आदेश वापस ले लेता है, तो संभव है कि मामला यहीं समाप्त हो जाए।
लेकिन यदि आदेश वापस नहीं लिया गया, तो अदालत द्वारा अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ जाएगी।
निष्कर्ष
हरिद्वार–रुड़की विकास प्राधिकरण द्वारा कृषि और बागों की भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति देने के मामले में हाई कोर्ट का सख्त रुख यह स्पष्ट करता है कि न्यायालय अपने आदेशों के अनुपालन को लेकर गंभीर है।
यह मामला न केवल कानून के शासन बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कृषि भूमि की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
अदालत के निर्देशों के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि संबंधित प्राधिकरण न्यायालय के आदेश का सम्मान करेगा और कृषि भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।