IndianLawNotes.com

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) पर स्पष्ट कानून की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) पर स्पष्ट कानून की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट ने विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई

भारत में गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु के अधिकार पर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) से संबंधित मामलों को स्पष्ट रूप से नियंत्रित करने के लिए संसद को एक व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब अदालत ऐसे मामलों से जुड़े कानूनी और नैतिक पहलुओं पर विचार कर रही थी।

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि वर्तमान में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित दिशा-निर्देश न्यायिक फैसलों के माध्यम से विकसित हुए हैं, लेकिन इस विषय पर एक समग्र और स्पष्ट कानून की कमी महसूस की जा रही है। अदालत के अनुसार, यदि संसद इस विषय पर विस्तृत कानून बनाए तो इससे न केवल कानूनी अस्पष्टता दूर होगी बल्कि मरीजों, परिवारों और चिकित्सकों के लिए भी स्पष्ट मार्गदर्शन उपलब्ध होगा।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है

निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ उस स्थिति से है जब किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के उपचार को रोक दिया जाता है या जीवनरक्षक उपकरणों को हटा लिया जाता है ताकि व्यक्ति प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त हो सके। यह आमतौर पर उन परिस्थितियों में लागू होती है जब मरीज असाध्य बीमारी से पीड़ित हो, लंबे समय से कोमा या स्थायी वनस्पतिक अवस्था (vegetative state) में हो, और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उसके स्वस्थ होने की संभावना अत्यंत कम हो।

इस प्रकार की इच्छामृत्यु को सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) से अलग माना जाता है। सक्रिय इच्छामृत्यु में किसी व्यक्ति की मृत्यु जानबूझकर किसी दवा या अन्य साधन से कराई जाती है, जो अधिकांश देशों में अवैध मानी जाती है। इसके विपरीत, निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपायों को हटाया जाता है।

भारत में कानूनी स्थिति

भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मान्यता सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से दी है।

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी थी। इसके बाद 2018 में अदालत ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

इस निर्णय में अदालत ने “लिविंग विल” या “एडवांस डायरेक्टिव” की अवधारणा को भी मान्यता दी। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही यह लिखित निर्देश दे सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम न हो, तो उसके जीवनरक्षक उपचार को जारी रखा जाए या नहीं।

लिविंग विल का महत्व

लिविंग विल एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज होता है जिसमें व्यक्ति यह स्पष्ट कर सकता है कि गंभीर बीमारी या कोमा की स्थिति में उसके उपचार के संबंध में क्या निर्णय लिया जाए।

इस दस्तावेज का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज की इच्छा का सम्मान किया जाए। कई बार ऐसा होता है कि मरीज बोलने या निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता, और परिवार या डॉक्टरों के सामने कठिन नैतिक और कानूनी सवाल खड़े हो जाते हैं।

लिविंग विल के माध्यम से इन परिस्थितियों में मार्गदर्शन मिल सकता है और विवाद की संभावना कम हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता

हालिया सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित व्यवस्था मुख्य रूप से न्यायालय के दिशानिर्देशों पर आधारित है। हालांकि ये दिशानिर्देश महत्वपूर्ण हैं, लेकिन एक समर्पित कानून की अनुपस्थिति में कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं।

अदालत ने कहा कि अस्पतालों, डॉक्टरों और परिवारों के सामने कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहां यह तय करना कठिन हो जाता है कि जीवनरक्षक उपचार को जारी रखा जाए या नहीं।

यदि इस विषय पर स्पष्ट कानून मौजूद हो, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित हो सकती है।

नैतिक और सामाजिक पहलू

इच्छामृत्यु का प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत जटिल है।

एक ओर यह तर्क दिया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी से अत्यधिक पीड़ा में है और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है, तो उसे गरिमा के साथ मृत्यु का विकल्प मिलना चाहिए।

दूसरी ओर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जीवन को समाप्त करने से जुड़ा कोई भी निर्णय अत्यंत संवेदनशील है और इसके दुरुपयोग की संभावना भी हो सकती है।

इसी कारण कई देशों में इच्छामृत्यु को लेकर अलग-अलग नियम और सीमाएँ तय की गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु या चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु (assisted dying) के संबंध में अलग-अलग कानून मौजूद हैं।

कुछ देशों में इसे सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी गई है, जबकि कई देशों में यह पूरी तरह प्रतिबंधित है।

भारत में भी इस विषय पर बहस लंबे समय से चल रही है और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने इस बहस को एक नया आयाम दिया है।

विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में संकेत दिया कि संसद द्वारा बनाए गए कानून से इस विषय पर अधिक स्पष्टता आएगी।

ऐसा कानून यह निर्धारित कर सकता है कि—

  • किन परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जा सकती है
  • लिविंग विल की प्रक्रिया क्या होगी
  • डॉक्टरों और अस्पतालों की जिम्मेदारियाँ क्या होंगी
  • दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या सुरक्षा उपाय होंगे

इन सभी पहलुओं को स्पष्ट करने से मरीजों और उनके परिवारों को कानूनी सुरक्षा और मार्गदर्शन मिल सकेगा।

चिकित्सा समुदाय की भूमिका

इस विषय में चिकित्सा समुदाय की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉक्टरों को अक्सर ऐसे निर्णयों का सामना करना पड़ता है जहां उन्हें मरीज के जीवन और मृत्यु से जुड़े कठिन विकल्पों पर विचार करना पड़ता है।

यदि स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद हो, तो डॉक्टरों के लिए भी निर्णय लेना आसान हो सकता है और उन्हें कानूनी जोखिम का सामना नहीं करना पड़ेगा।

भविष्य की दिशा

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को कई विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देख रहे हैं। इससे यह संभावना बनती है कि भविष्य में संसद इस विषय पर व्यापक चर्चा कर सकती है और एक स्पष्ट कानून बनाने की दिशा में कदम उठा सकती है।

ऐसा कानून भारत में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और मरीजों के अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

निष्कर्ष

निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मुद्दा मानव गरिमा, चिकित्सा नैतिकता और कानूनी व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया अवलोकन में यह स्पष्ट किया है कि इस संवेदनशील विषय पर एक स्पष्ट और व्यापक कानून की आवश्यकता है।

यदि संसद इस दिशा में कानून बनाती है, तो इससे न केवल कानूनी अस्पष्टता दूर होगी बल्कि मरीजों, उनके परिवारों और चिकित्सकों के लिए भी एक स्पष्ट और सुरक्षित ढांचा तैयार हो सकेगा।

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित कानूनी और नैतिक विमर्श को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।