पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को ‘बचाने’ के नाम पर 1 करोड़ रुपये की मांग करने वाली याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा—ऐसा दावा स्वीकार्य नहीं
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक ऐसी याचिका को खारिज कर दिया जिसमें केंद्र सरकार से 1 करोड़ रुपये की राशि फीस और खर्च के रूप में देने की मांग की गई थी। यह याचिका अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दायर की गई थी। उनका दावा था कि उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को “बचाने” के उद्देश्य से कई मामलों में याचिकाएं दायर की थीं और इसके लिए उन्हें सरकार से पारिश्रमिक मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को पूरी तरह से अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी अधिवक्ता द्वारा अपने स्तर पर दायर की गई याचिकाओं के लिए सरकार से इस प्रकार का भुगतान मांगना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आती है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
याचिका का आधार क्या था
अधिवक्ता अशोक पांडेय ने अपनी याचिका में दावा किया था कि उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ लगाए गए आरोपों और विवादों के दौरान कई मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनके अनुसार, इन मामलों का उद्देश्य न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत प्रतिष्ठा की रक्षा करना था।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि इन मामलों को दायर करने में उन्हें काफी आर्थिक खर्च उठाना पड़ा और उन्होंने अपने निजी संसाधनों का उपयोग किया। इसलिए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह उनके द्वारा किए गए खर्च और फीस के रूप में उन्हें 1 करोड़ रुपये का भुगतान करे।
हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक हित में या किसी अन्य उद्देश्य से याचिका दायर करता है, तो वह स्वयं की इच्छा से करता है। इसके लिए बाद में सरकार से भुगतान मांगना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी वकील को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने स्तर पर मुकदमे दायर करने के बाद सरकार से पारिश्रमिक की मांग करे, जब तक कि उसे सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से नियुक्त न किया गया हो।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह के दावों को स्वीकार किया जाने लगे तो न्यायालयों में अनावश्यक और निरर्थक मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा का प्रश्न
इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा के महत्व पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसके कार्यों या निर्णयों की रक्षा के लिए कोई भी व्यक्ति स्वयं को अधिकृत नहीं मान सकता।
न्यायालय ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा की रक्षा का दायित्व स्वयं संस्थागत व्यवस्था और संविधान के तहत स्थापित प्रक्रियाओं का है। किसी व्यक्ति द्वारा यह दावा करना कि उसने किसी न्यायाधीश या संस्था को “बचाया” है, अपने आप में उचित नहीं माना जा सकता।
पृष्ठभूमि: दीपक मिश्रा से जुड़े विवाद
पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का कार्यकाल कई महत्वपूर्ण घटनाओं और विवादों के कारण चर्चा में रहा था। उनके कार्यकाल के दौरान कुछ राजनीतिक और न्यायिक मुद्दों पर व्यापक बहस हुई थी।
2018 में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा की गई ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने भी न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक मामलों को लेकर बहस को जन्म दिया था। उस समय कई याचिकाएं और सार्वजनिक बहसें सामने आई थीं।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इन विवादों से संबंधित मामलों में किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं याचिका दायर करने से यह अधिकार नहीं बनता कि वह बाद में सरकार से आर्थिक लाभ की मांग करे।
लोकहित याचिका की अवधारणा
भारत में लोकहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) की व्यवस्था का उद्देश्य आम जनता के हितों की रक्षा करना है। इस व्यवस्था के माध्यम से कोई भी नागरिक न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है, विशेषकर तब जब समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह भी कहा है कि लोकहित याचिका का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति निजी लाभ या प्रचार के उद्देश्य से याचिका दायर करता है, तो अदालत उसे स्वीकार नहीं करती।
इस मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि किसी भी याचिका के माध्यम से निजी आर्थिक लाभ की मांग करना लोकहित याचिका की मूल भावना के विपरीत है।
न्यायालयों में बढ़ते अनावश्यक मुकदमे
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि अदालतों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले दायर किए जाते हैं जिनका कोई वास्तविक कानूनी आधार नहीं होता।
ऐसे मामलों के कारण न्यायालयों का समय और संसाधन दोनों व्यर्थ होते हैं। इसके साथ ही उन मामलों की सुनवाई में देरी होती है जो वास्तव में महत्वपूर्ण और जरूरी होते हैं।
इस संदर्भ में अदालत ने कई बार कहा है कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।
अदालत का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अशोक पांडेय की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार से इस प्रकार की फीस या खर्च की मांग करने का कोई प्रावधान नहीं है।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जो भी मामले दायर किए थे, वे उनकी व्यक्तिगत पहल पर किए गए थे और इसके लिए सरकार को भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार अदालत ने इस याचिका को निराधार बताते हुए इसे खारिज कर दिया।
व्यापक संदेश
इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायालयों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ या प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
लोकहित याचिका और अन्य कानूनी उपायों का उद्देश्य न्याय और सार्वजनिक हित की रक्षा करना है, न कि निजी आर्थिक लाभ प्राप्त करना।
यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में अनुशासन बनाए रखने और अनावश्यक मुकदमों को हतोत्साहित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।