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पशुओं की हिरासत से जुड़े नियम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘पशु क्रूरता निवारण नियम, 2017’ के नियम-3 की वैधता पर केंद्र से मांगा जवाब

पशुओं की हिरासत से जुड़े नियम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘पशु क्रूरता निवारण नियम, 2017’ के नियम-3 की वैधता पर केंद्र से मांगा जवाब

पशुओं के अधिकारों और उनके संरक्षण से जुड़े कानूनों की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने पशुओं की हिरासत और स्वामित्व से संबंधित एक नियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार तथा अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए याचिका पर विचार करने के लिए सहमति जताई और केंद्र सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। यह मामला पशु क्रूरता निवारण कानून और उससे जुड़े नियमों की संवैधानिक वैधता से जुड़ा हुआ है, जिसमें संपत्ति के अधिकार और विधि के शासन जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की।


मामला क्या है

याचिका में मुख्य रूप से पशु क्रूरता निवारण नियम, 2017 के नियम 3 की वैधता को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 29 के प्रावधानों के विपरीत है।

याचिका में मांग की गई है कि नियम 3 को अधिनियम के विरुद्ध घोषित करते हुए असंवैधानिक करार दिया जाए।

अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि इस नियम के तहत पशुधन को दोषसिद्धि से पहले ही जब्त करने, हस्तांतरित करने या स्वामित्व से स्थायी रूप से वंचित करने की व्यवस्था को अवैध घोषित किया जाए।


अदालत की प्रारंभिक कार्यवाही

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका के मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हुए इसे सुनवाई योग्य पाया।

पीठ ने कहा कि मामले में उठाए गए संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों पर केंद्र सरकार तथा अन्य पक्षों का पक्ष जानना आवश्यक है।

इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा।

यह नोटिस इस बात का संकेत है कि अदालत इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगी और यह तय करेगी कि संबंधित नियम कानून और संविधान के अनुरूप है या नहीं।


धारा 29 का कानूनी महत्व

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 29 का संबंध उस स्थिति से है जब कोई व्यक्ति पशु क्रूरता के अपराध में दोषी पाया जाता है।

इस धारा के अनुसार यदि अदालत यह पाती है कि किसी व्यक्ति ने पशु के साथ क्रूरता की है, तो वह व्यक्ति को पशु के स्वामित्व से वंचित करने का आदेश दे सकती है।

अर्थात् यह अधिकार न्यायालय के पास है और इसका प्रयोग आमतौर पर तब किया जाता है जब आरोपी व्यक्ति दोषी सिद्ध हो जाता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि नियम 3 इस व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसे प्रावधान लागू करता है जिनके तहत दोषसिद्धि से पहले ही पशु को जब्त या स्थानांतरित किया जा सकता है।


नियम 3 को चुनौती क्यों

याचिका में कहा गया है कि नियम 3 के तहत संबंधित अधिकारियों को यह अधिकार मिल जाता है कि वे कथित पशु क्रूरता के मामलों में पशुओं को पहले ही जब्त कर लें और उन्हें किसी अन्य संस्था या व्यक्ति को सौंप दें।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रक्रिया के कारण कई बार पशु के मालिक को बिना किसी न्यायिक निर्णय के ही अपने पशुधन से वंचित कर दिया जाता है।

उनका तर्क है कि यह व्यवस्था मूल अधिनियम की मंशा के विपरीत है, क्योंकि अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पशु के स्वामित्व से वंचित करने का अधिकार अदालत के पास है और यह कदम दोषसिद्धि के बाद ही उठाया जाना चाहिए।


संविधान के अनुच्छेदों का मुद्दा

याचिका में यह भी कहा गया है कि नियम 3 कई संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

विशेष रूप से अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 300ए का हवाला दिया गया है।

अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण का अधिकार प्राप्त है।

याचिका में कहा गया है कि नियम 3 के तहत बिना उचित प्रक्रिया के पशुओं को जब्त करना मनमाना और असमान व्यवहार हो सकता है।

अनुच्छेद 300ए – संपत्ति का अधिकार

अनुच्छेद 300ए यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के प्रावधानों के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध किए बिना ही उसके पशुधन को स्थायी रूप से उससे छीन लिया जाता है, तो यह उसके संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।


पशु संरक्षण और संपत्ति अधिकार का संतुलन

यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी उठाता है—

पशुओं के संरक्षण और मालिक के संपत्ति अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

एक ओर पशु क्रूरता को रोकने के लिए कठोर नियमों की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न हो।

इस प्रकार अदालत को यह तय करना होगा कि क्या नियम 3 वास्तव में पशुओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक है या यह कानून के मूल प्रावधानों और संवैधानिक अधिकारों से टकराता है।


संभावित कानूनी प्रभाव

यदि सुप्रीम कोर्ट इस नियम को असंवैधानिक घोषित करता है, तो इससे पशु क्रूरता से जुड़े मामलों में जब्ती और हिरासत की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर यदि अदालत नियम को वैध मानती है, तो यह पशु संरक्षण के क्षेत्र में सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों को अधिक अधिकार प्रदान करेगा।

इसलिए इस मामले का अंतिम निर्णय पशु अधिकारों, संपत्ति अधिकारों और आपराधिक न्याय प्रक्रिया तीनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा जारी नोटिस यह संकेत देता है कि अदालत इस मामले में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करेगी।

मामला केवल एक नियम की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ा है कि कानून के तहत किसी व्यक्ति के अधिकारों और पशुओं की सुरक्षा के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।

अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार और अन्य पक्ष इस मामले में क्या जवाब देते हैं और अंततः सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर क्या निर्णय देता है।