‘गुस्से में लगाया गया आरोप’ का दावा बेहद मनगढ़ंत: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी
यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में भारतीय न्यायालय लगातार सख्त रुख अपनाते रहे हैं। इसी क्रम में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए उस व्यक्ति की अपील खारिज कर दी, जिसने अपनी ही नाबालिग बेटी द्वारा लगाए गए बलात्कार के आरोप को “गुस्से में लगाया गया झूठा आरोप” बताया था। अदालत ने इस दलील को “बेहद मनगढ़ंत” करार दिया और आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
यह फैसला न्यायमूर्ति मनीष पिताले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पीड़िता का बयान विश्वसनीय और सुसंगत है तथा आरोपी द्वारा दिया गया बचाव तर्क न्यायालय को स्वीकार्य नहीं है।
यह मामला न केवल पारिवारिक रिश्तों के भीतर होने वाले यौन अपराधों की गंभीरता को उजागर करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि अदालतें ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चों की गवाही को किस प्रकार महत्व देती हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला महाराष्ट्र के मुंबई से जुड़ा है, जहां एक व्यक्ति पर अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ कई वर्षों तक यौन शोषण करने का आरोप लगा था।
मामले के अनुसार पीड़िता उस समय कक्षा 10 की छात्रा थी। उसने अपने स्कूल में आयोजित एक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान पहली बार अपने साथ हुए यौन शोषण का खुलासा किया।
वर्ष 2018 में स्कूल में आयोजित “पुलिस दीदी” जागरूकता कार्यक्रम के दौरान एक परामर्शदाता से बातचीत करते समय लड़की ने बताया कि उसका पिता लंबे समय से उसके साथ यौन उत्पीड़न कर रहा है।
लड़की के इस खुलासे के बाद मामला सामने आया और पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी पिता के खिलाफ मुकदमा चलाया गया।
पॉक्सो अदालत का फैसला
मामले की सुनवाई विशेष अदालत में हुई, जो बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करती है।
सुनवाई के बाद विशेष अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
यह सजा पॉक्सो अधिनियम 2012 के तहत दी गई थी, जो बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है।
अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान में पर्याप्त विश्वसनीयता है और आरोपी के खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य उसके अपराध को सिद्ध करते हैं।
हाईकोर्ट में आरोपी की अपील
विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अपील में उसने मार्च 2020 में दिए गए उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उसे कई बार अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार करने के आरोप में दोषी ठहराया गया था।
अपील में आरोपी ने दावा किया कि उसकी बेटी ने उसके खिलाफ झूठा आरोप लगाया है और इसका कारण पारिवारिक अनुशासन से जुड़ा विवाद है।
आरोपी का तर्क: पढ़ाई छुड़ाने से नाराज थी बेटी
अपील में आरोपी ने यह दलील दी कि उसने अपनी बेटी को पढ़ाई बीच में छोड़ने के लिए मजबूर किया था।
उसने इसे माता-पिता द्वारा उठाया गया एक अनुशासनात्मक कदम बताया और कहा कि इसी कारण उसकी बेटी उससे नाराज हो गई। आरोपी के अनुसार उसी नाराजगी के चलते लड़की ने उसके खिलाफ इतना गंभीर आरोप लगा दिया।
आरोपी ने अदालत से यह भी कहा कि यह आरोप वास्तविक नहीं है बल्कि गुस्से और भावनात्मक प्रतिक्रिया के कारण लगाया गया है।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आरोपी की दलीलों का विस्तार से परीक्षण किया।
अदालत ने कहा कि यह मानना अत्यंत कठिन है कि कोई नाबालिग लड़की केवल पढ़ाई छुड़ाने जैसे कारण से अपने ही पिता के खिलाफ इतना गंभीर और संवेदनशील आरोप लगा दे।
न्यायालय ने आरोपी के तर्क को “बेहद मनगढ़ंत” बताते हुए स्पष्ट किया कि ऐसा बचाव तर्क वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता।
खंडपीठ ने कहा कि आरोपी द्वारा पेश किया गया यह तर्क न्यायालय को विश्वसनीय नहीं लगता और यह केवल अपराध से बचने का प्रयास प्रतीत होता है।
पीड़िता के बयान को माना विश्वसनीय
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पीड़िता का बयान स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता की गवाही अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, विशेष रूप से तब जब घटना घर के भीतर हुई हो और बाहरी प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों।
अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता का बयान स्वाभाविक, सुसंगत और विश्वसनीय है, तो केवल उसी के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान में कोई ऐसी विसंगति नहीं है जो उसकी विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न करे।
पारिवारिक संबंधों में अपराध की गंभीरता
अदालत ने यह भी कहा कि जब यौन अपराध परिवार के भीतर होते हैं, तो उनका प्रभाव और भी अधिक गंभीर होता है।
ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चे के लिए सच बताना और न्याय की मांग करना अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि आरोपी वही व्यक्ति होता है जिस पर वह भरोसा करता है।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को विशेष संवेदनशीलता और सावधानी के साथ तथ्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।
पॉक्सो कानून का उद्देश्य
पॉक्सो अधिनियम 2012 का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है।
इस कानून के तहत—
- बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है
- पीड़ितों के लिए विशेष न्यायिक प्रक्रिया निर्धारित की गई है
- मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की गई हैं
- दोषी पाए जाने पर कठोर सजा का प्रावधान किया गया है
इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों के साथ होने वाले अपराधों में दोषियों को कड़ी सजा मिले और पीड़ितों को न्याय मिल सके।
अदालत का अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि—
- आरोपी की दलीलें अविश्वसनीय हैं
- पीड़िता का बयान भरोसेमंद है
- विशेष अदालत का निर्णय सही और न्यायसंगत है
इस आधार पर अदालत ने आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
निर्णय का महत्व
यह निर्णय कई महत्वपूर्ण संदेश देता है।
पहला, अदालतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में आरोपी द्वारा दिए गए कमजोर और मनगढ़ंत बचाव तर्कों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दूसरा, यह फैसला यह भी दर्शाता है कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है, तो अदालतें उसे पर्याप्त साक्ष्य मान सकती हैं।
तीसरा, यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि परिवार के भीतर होने वाले यौन अपराधों को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाएगा जितना अन्य अपराधों को।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में न्यायपालिका की सख्त और संवेदनशील दृष्टि को दर्शाता है।
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल झूठे या मनगढ़ंत तर्क देकर ऐसे गंभीर अपराधों से बचा नहीं जा सकता।
इस मामले में पीड़िता के साहस और अदालत की संवेदनशीलता ने यह सुनिश्चित किया कि आरोपी को उसके अपराध के लिए कठोर सजा मिले और न्याय की प्रक्रिया पूरी हो सके।
यह निर्णय न केवल पीड़ितों के लिए न्याय का उदाहरण है बल्कि समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों को किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।