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लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े को सुरक्षा का अधिकार: हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

लिव-इन रिलेशनशिप पर हाई कोर्ट का अहम फैसला: विवाहित साथी होने के बावजूद जोड़े को मिला जीवन और स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण

भारत में बदलते सामाजिक परिवेश के साथ पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों की प्रकृति भी धीरे-धीरे बदल रही है। पारंपरिक विवाह संस्था के अलावा अब लिव-इन रिलेशनशिप भी एक वास्तविक सामाजिक स्थिति के रूप में सामने आ रही है। ऐसे मामलों में अक्सर सामाजिक विरोध, पारिवारिक दबाव और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न उठते रहते हैं। इसी संदर्भ में Punjab and Haryana High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त है, और किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है—भले ही उस रिश्ते में शामिल किसी एक साथी का पहले से विवाह क्यों न हुआ हो।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति Justice Rupinderjit Chahal की एकल पीठ द्वारा एक याचिका का निपटारा करते समय की गई। यह मामला उन परिस्थितियों को उजागर करता है जिनमें दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, लेकिन उन्हें समाज या परिवार से विरोध का सामना करना पड़ता है।


मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में एक युवक और एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। दोनों ने अदालत को बताया कि वे बालिग हैं और अपनी स्वतंत्र इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। हालांकि महिला पहले से विवाहित है और उसके पूर्व विवाह से तीन बच्चे भी हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों ने साथ रहने का निर्णय लिया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके इस संबंध का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं और उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। इस कारण उन्हें अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर खतरे की आशंका है। इसी भय के कारण उन्होंने न्यायालय से सुरक्षा प्रदान करने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्होंने 5 मार्च 2026 को हांसी के पुलिस अधीक्षक को एक लिखित आवेदन देकर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की थी। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी उस आवेदन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस की निष्क्रियता के कारण उन्हें न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।


अदालत के समक्ष रखी गई दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि भारत के कई न्यायिक फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि दो वयस्क यदि अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। भले ही उनका संबंध पारंपरिक विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त न हो, फिर भी उन्हें कानून के तहत सुरक्षा मिल सकती है।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से कहा कि संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। यदि किसी व्यक्ति को अपने जीवन पर खतरे की आशंका है, तो राज्य का यह दायित्व बनता है कि वह उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।

उन्होंने अदालत से यह भी आग्रह किया कि पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर विचार करें और उनके जीवन व स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएं।


न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति या जीवनशैली पर निर्भर नहीं करता। यह अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से प्राप्त है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक रूप से अपने जीवन या स्वतंत्रता पर खतरे की आशंका है, तो संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे उस खतरे का मूल्यांकन करें और आवश्यक कदम उठाएं।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपने आप में अवैध नहीं है। इसलिए केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका संबंध सामाजिक दृष्टि से विवादास्पद माना जा रहा है।


पुलिस को दिए गए निर्देश

मामले के तथ्यों और प्रस्तुत दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने हांसी के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं द्वारा 5 मार्च 2026 को दिए गए आवेदन की जांच करें।

अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी यह मूल्यांकन करें कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को किसी प्रकार का वास्तविक खतरा है या नहीं। यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि उन्हें खतरे की आशंका है, तो पुलिस कानून के अनुसार आवश्यक और उचित कार्रवाई करे।

इस प्रकार अदालत ने सीधे सुरक्षा प्रदान करने का आदेश देने के बजाय पुलिस प्रशासन को मामले की जांच कर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।


संविधान के अनुच्छेद-21 का महत्व

यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के महत्व को भी रेखांकित करता है। अनुच्छेद-21 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा वंचित नहीं किया जा सकता।

समय-समय पर न्यायालयों ने इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या करते हुए इसे कई अधिकारों का स्रोत माना है, जैसे—

  • गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
  • अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार
  • निजी जीवन की स्वतंत्रता

इसी व्यापक व्याख्या के आधार पर न्यायालयों ने कई बार यह माना है कि दो वयस्कों को अपनी इच्छा से साथ रहने का अधिकार है।


लिव-इन रिलेशनशिप पर न्यायिक दृष्टिकोण

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज में अभी भी मिश्रित दृष्टिकोण देखने को मिलता है। हालांकि कानून ने धीरे-धीरे इस विषय पर संतुलित रुख अपनाया है।

न्यायालयों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहना चाहते हैं तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। साथ ही, ऐसे संबंधों में रहने वाले व्यक्तियों को भी कानून के तहत संरक्षण मिल सकता है।

हालांकि यह भी सही है कि लिव-इन रिलेशनशिप विवाह का विकल्प नहीं है और इससे जुड़े कई कानूनी प्रश्न अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। फिर भी न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।


सामाजिक और कानूनी प्रभाव

इस फैसले का सामाजिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से महत्व है। सामाजिक स्तर पर यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, भले ही किसी व्यक्ति के जीवन के निर्णय पारंपरिक मान्यताओं से अलग क्यों न हों।

कानूनी दृष्टि से यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि राज्य और उसके अधिकारी किसी भी नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक खतरे की आशंका है, तो प्रशासन को निष्पक्ष रूप से उसका आकलन करना चाहिए।


निष्कर्ष

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति या संबंधों की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता।

यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं और उन्हें अपने जीवन पर खतरे की आशंका है, तो राज्य का यह कर्तव्य बनता है कि वह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। इस निर्णय के माध्यम से न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य केवल सामाजिक मान्यताओं की रक्षा करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना भी है।

इस प्रकार यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और मानव गरिमा के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।