‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक कदम: पहली बार दी निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति
भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब Supreme Court of India ने बुधवार को एक ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए पहली बार किसी मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी। यह आदेश अदालत के उस महत्वपूर्ण निर्णय के अनुरूप है, जो पहले Common Cause v. Union of India (2018) में दिया गया था और जिसे बाद में 2023 में संशोधित किया गया था।
इस फैसले के माध्यम से अदालत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” (Right to Die with Dignity) भारतीय संविधान के तहत जीवन के अधिकार का ही एक हिस्सा है। यह अधिकार संविधान के Article 21 of the Constitution of India से उत्पन्न होता है, जो हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है।
यह आदेश इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले अदालत ने सिद्धांत रूप में तो निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी थी, लेकिन किसी विशेष मामले में इसका उपयोग करते हुए आदेश देना बहुत दुर्लभ रहा है।
इच्छामृत्यु क्या है और इसके प्रकार
इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अत्यधिक पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए उसकी जीवन-समर्थन प्रणाली को समाप्त करना या मृत्यु की प्रक्रिया को तेज करना।
सामान्य तौर पर इसे दो प्रकारों में बांटा जाता है:
1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)
इसमें डॉक्टर या अन्य व्यक्ति जानबूझकर ऐसा कदम उठाता है जिससे रोगी की मृत्यु हो जाए, जैसे घातक इंजेक्शन देना। भारत में यह अभी भी अवैध है।
2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)
इसमें रोगी को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता, जैसे वेंटिलेटर या कृत्रिम जीवन-समर्थन प्रणाली, को हटा लिया जाता है ताकि प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इसे कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी है।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश
बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अपने पहले के फैसले को लागू करते हुए एक मरीज के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार है और उसकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है, तो उसे कृत्रिम रूप से जीवन में बनाए रखना हमेशा मानवीय नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि मानवीय गरिमा केवल जीवन जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु के समय भी उस गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 2018 के फैसले और 2023 में किए गए संशोधनों के तहत निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करते हुए इस तरह के मामलों में निर्णय लिया जा सकता है।
2018 का ऐतिहासिक फैसला
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर सबसे महत्वपूर्ण निर्णय 2018 में आया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया था।
इस फैसले में अदालत ने कहा था कि:
- हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार है
- असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अनावश्यक चिकित्सा हस्तक्षेप से बचाने का अधिकार होना चाहिए
- मरीज अपनी इच्छा पहले से व्यक्त कर सकता है कि गंभीर स्थिति में उसे कृत्रिम जीवन-समर्थन न दिया जाए
इसी के साथ अदालत ने “लिविंग विल” (Living Will) की अवधारणा को भी मान्यता दी।
लिविंग विल क्या है
लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज होता है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से यह लिखकर दे सकता है कि यदि वह भविष्य में ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह खुद निर्णय लेने में सक्षम न हो, तो उसे किस प्रकार का इलाज दिया जाए या न दिया जाए।
इस दस्तावेज के माध्यम से व्यक्ति यह निर्देश दे सकता है कि:
- उसे कृत्रिम वेंटिलेशन न दिया जाए
- जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा न किया जाए
- डॉक्टर केवल दर्द कम करने वाली चिकित्सा दें
2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस दस्तावेज के लिए विस्तृत प्रक्रिया भी तय की थी।
2023 में दिशानिर्देशों में संशोधन
बाद में अदालत ने 2023 में इन दिशानिर्देशों को और सरल बनाया। पहले लिविंग विल के लिए बहुत जटिल प्रक्रिया थी, जैसे मजिस्ट्रेट के सामने प्रमाणित करना आदि।
संशोधित नियमों के तहत:
- लिविंग विल को प्रमाणित करने की प्रक्रिया आसान की गई
- अस्पताल की मेडिकल बोर्ड प्रणाली को स्पष्ट किया गया
- मरीज की इच्छा को प्राथमिकता देने की बात कही गई
इन बदलावों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मरीज की गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान किया जाए।
अदालत ने क्या कहा
ताजा आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को बेहद कष्टदायक और निराशाजनक स्थिति में कृत्रिम जीवन-समर्थन पर बनाए रखना हमेशा मानवीय दृष्टिकोण नहीं होता।
अदालत ने कहा:
- गरिमा के साथ मरने का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है
- यह अधिकार जीवन के अधिकार का ही विस्तार है
- चिकित्सा निर्णयों में मरीज की इच्छा और परिवार की सहमति को महत्व दिया जाना चाहिए
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में चिकित्सकों और अस्पतालों को अदालत के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना होगा।
डॉक्टरों और अस्पतालों की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने से पहले कई स्तरों पर जांच और पुष्टि की जाती है।
इसके लिए आमतौर पर निम्न प्रक्रिया अपनाई जाती है:
- मरीज की चिकित्सा स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन
- अस्पताल के मेडिकल बोर्ड द्वारा समीक्षा
- यदि लिविंग विल मौजूद है तो उसका सत्यापन
- परिवार के सदस्यों की सहमति
- सभी प्रक्रियाओं का लिखित रिकॉर्ड
इन सभी कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय किसी दबाव या गलत मंशा से नहीं लिया गया हो।
सामाजिक और नैतिक बहस
इच्छामृत्यु का विषय हमेशा से सामाजिक और नैतिक बहस का केंद्र रहा है। कई लोग इसे मानवीय दृष्टिकोण से सही मानते हैं, जबकि कुछ इसे जीवन के मूल मूल्य के खिलाफ मानते हैं।
समर्थकों का कहना है कि:
- असाध्य बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा से मुक्ति मिलनी चाहिए
- व्यक्ति को अपने शरीर और जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए
विरोधियों का तर्क है कि:
- इससे जीवन के मूल्य को नुकसान पहुंच सकता है
- भविष्य में इसका दुरुपयोग होने का खतरा भी हो सकता है
इसी कारण अदालत ने हमेशा सावधानीपूर्वक और सख्त दिशानिर्देशों के साथ ही इसे अनुमति दी है।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु को लेकर अलग-अलग कानून हैं। कुछ देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु भी कानूनी है, जबकि कई देशों में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है।
उदाहरण के तौर पर:
- नीदरलैंड और बेल्जियम में सक्रिय इच्छामृत्यु भी कानूनी है
- अमेरिका के कुछ राज्यों में चिकित्सक की सहायता से मृत्यु की अनुमति है
- कई यूरोपीय देशों में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है
भारत ने फिलहाल एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी है।
भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर जीवन और मृत्यु के अधिकार से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान का उद्देश्य केवल जीवन को बनाए रखना नहीं, बल्कि उसे गरिमा के साथ जीने और समाप्त करने की अनुमति देना भी है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा है कि यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है और इसे हमेशा सावधानीपूर्वक लागू किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भारतीय कानूनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत न केवल जीवन के अधिकार की रक्षा करती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी व्यक्ति की गरिमा और इच्छाओं का सम्मान किया जाए।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर अदालत के दिशानिर्देशों का पहला वास्तविक उपयोग यह दिखाता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था मानवीय संवेदनाओं और संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
आने वाले समय में यह फैसला न केवल चिकित्सा क्षेत्र बल्कि समाज और कानून के बीच संबंधों को भी प्रभावित करेगा। यह बहस आगे भी जारी रहेगी कि जीवन, मृत्यु और गरिमा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए, लेकिन इतना निश्चित है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।