दिल्ली मेट्रो में महिला के बगल में अश्लील हरकत करने वाले व्यक्ति की सज़ा बरकरार: अदालत ने कहा—महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी
भारत की राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली मेट्रो के अंदर एक महिला के बगल में अश्लील हरकत करने वाले व्यक्ति की सज़ा को बरकरार रखते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अभी भी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। अदालत ने इस घटना को केवल एक व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा व्यापक सामाजिक मुद्दा बताया।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब Delhi Metro Rail Corporation की येलो लाइन पर चलती मेट्रो ट्रेन में एक व्यक्ति ने महिला यात्री के पास खड़े होकर अशोभनीय और आपत्तिजनक हरकत की। पीड़िता ने तत्काल मेट्रो कोच में मौजूद इमरजेंसी बटन दबाकर सहायता मांगी, जिसके बाद आरोपी को पकड़ा गया और पुलिस के हवाले कर दिया गया।
दिल्ली की साकेत अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश Hargurvinder Singh Jaggi ने आरोपी मोहम्मद ताहिर की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा को सही ठहराया। अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले अपराध न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव डालते हैं।
घटना का पूरा विवरण
अभियोजन पक्ष के अनुसार यह घटना 27 मार्च 2021 की है। उस दिन एक महिला यात्री Delhi Metro की येलो लाइन पर साकेत से हौज़ खास की दिशा में यात्रा कर रही थी। उसी दौरान आरोपी मोहम्मद ताहिर उसके बगल में खड़ा था।
यात्रा के दौरान आरोपी ने महिला के सामने अत्यंत अश्लील व्यवहार किया और हस्तमैथुन करने लगा। आरोप है कि उसने महिला को घूरा और अनुचित तरीके से छूने की भी कोशिश की।
महिला यात्री इस घटना से बेहद घबरा गई और उसने तुरंत कोच के अंदर लगे इमरजेंसी अलार्म बटन को दबाकर मेट्रो कर्मचारियों को सूचना दी। मेट्रो स्टाफ ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को पकड़ा और बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया।
इस घटना के बाद INA Metro Police Station में आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी Chhaya Tyagi ने 24 मई 2025 को आरोपी मोहम्मद ताहिर को दोषी करार दिया।
अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की दो महत्वपूर्ण धाराओं के तहत दोषी पाया—
- धारा 354 – महिला की मर्यादा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया कृत्य
- धारा 354A – यौन उत्पीड़न
इन धाराओं के तहत अदालत ने आरोपी को एक वर्ष के कारावास और 10,000 रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई।
ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी की हरकत न केवल आपराधिक थी बल्कि उसने सार्वजनिक परिवहन में यात्रा कर रही महिला की गरिमा और सुरक्षा की भावना को भी गंभीर रूप से आहत किया।
आरोपी की अपील और बचाव पक्ष की दलील
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी मोहम्मद ताहिर ने साकेत की सत्र अदालत में अपील दायर की। उसने अपने बचाव में कई दलीलें पेश कीं।
बचाव पक्ष का कहना था कि कथित घटना पीक रश आवर के दौरान हुई थी, जब मेट्रो कोच में काफी भीड़ थी। ऐसे में किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह का सामने न आना मामले को संदिग्ध बनाता है।
इसके अलावा बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस ने अदालत में कोई सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं किया, जबकि मेट्रो स्टेशनों और कोचों में व्यापक सीसीटीवी निगरानी रहती है।
डिफेंस ने यह भी दावा किया कि शिकायतकर्ता के बयान में उस मेट्रो स्टेशन के नाम को लेकर भ्रम था, जहां वह और आरोपी उतरे थे। बचाव पक्ष के अनुसार यह भ्रम मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
अदालत ने क्यों खारिज की अपील
सत्र अदालत ने बचाव पक्ष की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि महिला की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत है और उसे झूठा साबित करने का कोई ठोस आधार नहीं है।
अदालत ने कहा कि मेट्रो स्टेशन के नाम को लेकर हुई मामूली उलझन से पूरे मामले की सच्चाई पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
न्यायाधीश Hargurvinder Singh Jaggi ने अपने फैसले में कहा कि बचाव पक्ष द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल एक भटकाने वाली दलील है और इससे अपराध की गंभीरता कम नहीं होती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता के बयान और घटनाक्रम से आरोपी का अपराध स्पष्ट रूप से साबित होता है।
महिलाओं की सुरक्षा पर अदालत की टिप्पणी
अपने फैसले में अदालत ने महिलाओं की सुरक्षा के व्यापक मुद्दे पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देना और समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। लेकिन इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा अभी भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाएँ महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वतंत्र रूप से यात्रा करने की भावना को प्रभावित करती हैं।
सार्वजनिक स्थानों पर अपराध का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध केवल शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं होते।
ऐसी घटनाएँ पीड़िता के मन पर गहरा मानसिक आघात छोड़ती हैं। सार्वजनिक स्थानों पर हुए यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता को लंबे समय तक भय, असुरक्षा और तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
न्यायालय ने कहा कि इस तरह के अपराध पीड़ित की निजता, सम्मान और सुरक्षा की भावना को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।
मेट्रो सुरक्षा व्यवस्था की सराहना
अदालत ने अपने निर्णय में दिल्ली मेट्रो के इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम की भी सराहना की।
न्यायालय ने कहा कि घटना के समय पीड़िता द्वारा इमरजेंसी बटन दबाने पर तुरंत कार्रवाई की गई, जिससे आरोपी को पकड़ा जा सका।
अदालत के अनुसार यह मेट्रो प्रणाली में मौजूद सुरक्षा उपायों और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
फिर भी सुधार की आवश्यकता
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं।
न्यायालय ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में और अधिक संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता है।
इसमें बेहतर निगरानी, जागरूकता कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।
कानूनी दृष्टि से मामला क्यों महत्वपूर्ण
यह मामला कानूनी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के प्रति न्यायालय के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और 354A महिलाओं की गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए बनाए गए महत्वपूर्ण प्रावधान हैं।
इन धाराओं के तहत अदालतें उन सभी कृत्यों को अपराध मानती हैं जो महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाते हैं या उसे यौन उत्पीड़न का शिकार बनाते हैं।
समाज के लिए संदेश
इस मामले में अदालत का निर्णय केवल आरोपी को सज़ा देने तक सीमित नहीं है।
यह फैसला समाज को यह संदेश भी देता है कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की अशोभनीय या आपत्तिजनक हरकत को गंभीर अपराध माना जाएगा और कानून इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की भावना को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष
दिल्ली मेट्रो में हुई इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने आरोपी की सज़ा को बरकरार रखते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
साथ ही अदालत की यह टिप्पणी कि “महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है” यह संकेत देती है कि कानून, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर इस दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे।
जब तक सार्वजनिक स्थानों पर महिलाएँ पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, तब तक लैंगिक समानता का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।