POCSO अधिनियम की व्यापक व्याख्या: ‘स्किन-टू-स्किन’ नहीं, बल्कि यौन मंशा ही है यौन हमले का वास्तविक आधार — उड़ीसा हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
भारतीय न्यायपालिका समय-समय पर ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय देती रही है जो न केवल कानून की व्याख्या को स्पष्ट करते हैं बल्कि समाज में न्याय और संवेदनशीलता की नई दिशा भी निर्धारित करते हैं। बच्चों के यौन शोषण से संबंधित मामलों में अदालतें विशेष रूप से कठोर और संवेदनशील रुख अपनाती हैं। इसी संदर्भ में उड़ीसा हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग लड़की के साथ यौन मंशा से किया गया स्पर्श, चाहे वह कपड़ों के ऊपर से ही क्यों न हो, POCSO Act की धारा 7 के तहत ‘यौन हमला’ माना जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में ‘स्किन-टू-स्किन संपर्क’ अनिवार्य तत्व नहीं है, बल्कि आरोपी की मंशा और कृत्य की प्रकृति ही निर्णायक होती है।
यह निर्णय न केवल बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की व्यापक व्याख्या करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायालय कानून की भावना और उद्देश्य को प्राथमिकता देता है, न कि संकीर्ण तकनीकी व्याख्याओं को।
घटना की पृष्ठभूमि
यह मामला अगस्त 2021 का है। पीड़िता एक नाबालिग लड़की थी जो बस से यात्रा कर रही थी। यात्रा के दौरान जब बस एक स्टॉपेज पर रुकी, तब आरोपी ने बस की खिड़की के बाहर से अपना हाथ अंदर डालकर लड़की के साथ छेड़छाड़ की और उसके स्तन को दबाया। यह घटना अचानक हुई और पीड़िता इससे घबरा गई।
लड़की ने तुरंत शोर मचाया, जिससे बस में मौजूद अन्य यात्रियों का ध्यान इस ओर गया। शोर सुनकर उसके पिता भी सतर्क हो गए और आरोपी का पीछा किया। पीछा करने के दौरान आरोपी ने पिता के साथ मारपीट भी की। बाद में मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई और आरोपी के विरुद्ध POCSO अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी को दोषी पाया। अदालत ने माना कि आरोपी का कृत्य स्पष्ट रूप से एक नाबालिग लड़की के साथ यौन मंशा से किया गया आचरण था।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act की धारा 7 और 8 के तहत दोषी ठहराया और उसे सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त अदालत ने यह भी माना कि आरोपी का कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध भी है।
ट्रायल कोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ आरोपी ने उड़ीसा हाईकोर्ट में अपील दायर की।
आरोपी की दलील
हाईकोर्ट में आरोपी ने यह तर्क दिया कि उसका कृत्य ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क के बिना हुआ था, क्योंकि उसने लड़की को कपड़ों के ऊपर से छुआ था। आरोपी के वकील ने दलील दी कि जब तक त्वचा से त्वचा का सीधा संपर्क न हो, तब तक इसे POCSO Act की धारा 7 के तहत ‘यौन हमला’ नहीं माना जाना चाहिए।
यह तर्क पहले भी भारतीय न्यायालयों में विवाद का विषय रहा है, विशेष रूप से बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले में ‘स्किन-टू-स्किन संपर्क’ को आवश्यक तत्व मानने की व्याख्या के कारण।
उड़ीसा हाईकोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई डॉ. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने की। अदालत ने आरोपी की इस दलील को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि POCSO Act की धारा 7 की व्याख्या करते समय यह देखना जरूरी है कि आरोपी का कृत्य यौन मंशा से किया गया था या नहीं। यदि किसी व्यक्ति ने किसी बच्चे के शरीर के संवेदनशील अंगों को यौन उद्देश्य से छुआ है, तो यह यौन हमला ही माना जाएगा, चाहे वह कपड़ों के ऊपर से ही क्यों न किया गया हो।
न्यायालय ने कहा कि यदि ‘स्किन-टू-स्किन संपर्क’ को आवश्यक शर्त मान लिया जाए तो यह कानून के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले Attorney General for India v. Satish का हवाला दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस विवादास्पद फैसले को पलट दिया था जिसमें कहा गया था कि POCSO Act के तहत यौन हमले के लिए ‘स्किन-टू-स्किन संपर्क’ आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्णय को अस्वीकार करते हुए कहा था कि ऐसी संकीर्ण व्याख्या कानून की मूल भावना के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“यदि इस तरह की संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाता है, तो कोई व्यक्ति दस्ताने पहनकर या कपड़ों के माध्यम से किसी बच्चे के यौन अंगों को छू सकता है और फिर भी कानून की पकड़ से बच सकता है। यह एक अत्यंत खतरनाक स्थिति होगी।”
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को हर प्रकार के यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है, इसलिए इसकी व्याख्या भी उसी उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
पीड़िता की आयु का निर्धारण
मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पीड़िता की आयु का भी था। अदालत ने पीड़िता के मैट्रिक प्रमाणपत्र के आधार पर उसकी आयु निर्धारित की। प्रमाणपत्र के अनुसार घटना के समय उसकी आयु 17 वर्ष 5 महीने थी।
इस प्रकार यह स्पष्ट था कि वह कानूनन नाबालिग थी और इसलिए उसके साथ किया गया ऐसा कृत्य POCSO Act के दायरे में आता है।
अदालत ने कहा कि जब पीड़िता नाबालिग है तो उसके साथ किसी भी प्रकार का यौन प्रकृति का स्पर्श गंभीर अपराध माना जाएगा।
अदालत की कानूनी व्याख्या
हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 7 में ‘यौन हमला’ की परिभाषा काफी व्यापक है। इसमें यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी बच्चे के शरीर के संवेदनशील अंगों को यौन मंशा से छूता है या बच्चे से ऐसा करवाता है, तो यह यौन हमला है।
इस परिभाषा में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि स्पर्श केवल ‘स्किन-टू-स्किन’ होना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की व्याख्या करते समय केवल शब्दों को नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को भी ध्यान में रखना चाहिए। POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षित रखना है, इसलिए इसकी व्याख्या भी व्यापक और पीड़ित-केन्द्रित होनी चाहिए।
IPC की धारा 354 का भी अपराध
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी का कृत्य न केवल POCSO Act के तहत अपराध है बल्कि भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत भी महिला की लज्जा भंग करने का अपराध है।
अदालत ने कहा कि बस की खिड़की से हाथ डालकर किसी लड़की के स्तन को दबाना अत्यंत अभद्र और आपत्तिजनक कृत्य है। यह किसी महिला की शारीरिक गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा आघात है।
इस प्रकार अदालत ने माना कि आरोपी का कृत्य दोहरे अपराध की श्रेणी में आता है।
अदालत का अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद उड़ीसा हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और आरोपी को दोषी ठहराने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की है।
परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा।
निर्णय का व्यापक महत्व
यह निर्णय कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि POCSO Act की व्याख्या संकीर्ण नहीं बल्कि व्यापक होनी चाहिए ताकि बच्चों को हर प्रकार के यौन शोषण से सुरक्षा मिल सके।
दूसरा, यह निर्णय न्यायपालिका के उस दृष्टिकोण को भी दर्शाता है जिसमें कानून की तकनीकी व्याख्या से अधिक महत्व उसके उद्देश्य और भावना को दिया जाता है।
तीसरा, यह फैसला समाज को भी यह संदेश देता है कि बच्चों के साथ किसी भी प्रकार की अश्लील या यौन प्रकृति की हरकत को कानून बहुत गंभीरता से देखता है।
निष्कर्ष
उड़ीसा हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक व्यवस्था में बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी बच्चे के साथ यौन मंशा से किया गया कोई भी कृत्य, चाहे वह कपड़ों के ऊपर से ही क्यों न किया गया हो, कानून की नजर में यौन हमला ही है।
इस निर्णय से यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि POCSO Act का मूल आधार ‘यौन मंशा’ है, न कि ‘स्किन-टू-स्किन संपर्क’।
इस प्रकार यह फैसला न केवल कानून की सही व्याख्या प्रस्तुत करता है बल्कि समाज में यह संदेश भी देता है कि बच्चों की गरिमा और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों के प्रति न्यायालय किसी भी प्रकार की नरमी बरतने के लिए तैयार नहीं है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।