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“भगवान के पास वोट नहीं, पर अधिकार हैं”: मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण को लेकर मद्रास हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

“भगवान के पास वोट नहीं, पर अधिकार हैं”: मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण को लेकर मद्रास हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी और प्रशासन को सख्त निर्देश

प्रस्तावना

भारत में मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सदियों से भक्तों द्वारा दान में दी गई मंदिरों की भूमि और संपत्तियां धार्मिक गतिविधियों, धर्मार्थ कार्यों और समाज सेवा के लिए उपयोग में लाई जाती रही हैं। लेकिन समय के साथ कई मंदिरों की जमीनों पर अतिक्रमण की समस्या बढ़ती जा रही है।

इसी संदर्भ में हाल ही में Madras High Court ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “भगवान के पास वोट डालने का अधिकार नहीं है, इसलिए उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता।” अदालत ने यह टिप्पणी मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें प्रशासन द्वारा सात साल पुराने आदेश के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई थी।

यह मामला तमिलनाडु के करूर जिले में स्थित Balasubramanyam Swamy Temple की जमीन पर कथित अतिक्रमण से संबंधित है। अदालत की इस टिप्पणी ने प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक दबाव और मंदिर संपत्तियों की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर किया है।


मामला क्या है

यह मामला करूर जिले के बालसुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की जमीन से जुड़े अतिक्रमण का है। बताया गया कि मंदिर की कई जमीनों पर वर्षों से अवैध कब्जा किया गया था। इस संबंध में पहले भी अदालत ने आदेश जारी कर अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया था।

लेकिन लगभग सात साल बीत जाने के बाद भी प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने के लिए कोई ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं की। इसी कारण ए. राधाकृष्ण नामक व्यक्ति ने अदालत में अवमानना याचिका दाखिल की।

इस याचिका में कहा गया कि अदालत के आदेशों के बावजूद प्रशासनिक अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे हैं और मंदिर की जमीन लगातार कब्जाधारियों के हाथों में बनी हुई है।


अदालत में सुनवाई

इस मामले की सुनवाई Justice P. Velmurugan और Justice B. Pugalendhi की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने करूर जिले के पुलिस उपाधीक्षक (DSP) द्वारा दाखिल रिपोर्ट का अवलोकन किया। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2025 में कई बार अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

लेकिन जब प्रशासन ने कार्रवाई करने की कोशिश की, तब स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। रिपोर्ट के अनुसार, विरोध में स्थानीय सांसद, कुछ राजनेता और अन्य प्रभावशाली लोग शामिल थे, जिसके कारण प्रशासन को कार्रवाई रोकनी पड़ी।


अतिक्रमणकारियों की सूची ने बढ़ाई चिंता

जब अदालत ने अतिक्रमणकारियों के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी, तो सामने आए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले थे।

रिपोर्ट के अनुसार मंदिर की जमीन पर कब्जा करने वालों में—

  • 27 सरकारी अधिकारी
  • 49 उद्योगपति
  • 38 प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से जुड़े लोग

शामिल थे।

इन आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह केवल साधारण अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि इसमें समाज के प्रभावशाली वर्गों की भी भूमिका है। इसी कारण प्रशासन के लिए कार्रवाई करना कठिन हो रहा था।


अदालत की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन की निष्क्रियता पर तीखी नाराजगी व्यक्त की।

बेंच ने कहा कि मंदिर की संपत्तियां किसी राज्य की व्यावसायिक संपत्ति नहीं हैं। ये वे पवित्र संपत्तियां हैं जो भक्तों द्वारा धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए दान की गई हैं।

अदालत ने कहा कि यदि हर साल मंदिर की जमीन कम होती जा रही है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था के कमजोर होने का संकेत है।

सबसे उल्लेखनीय टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा—

“बेचारे भगवान के पास वोट देने का अधिकार नहीं है, जबकि कब्जाधारियों के पास कीमती वोट हैं। इसलिए प्रशासन अक्सर उनके खिलाफ कार्रवाई करने से हिचकिचाता है।”

यह टिप्पणी वास्तव में भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक निष्क्रियता की ओर संकेत करती है।


भगवान को “विधिक व्यक्ति” मानने का सिद्धांत

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय कानून में भगवान या मंदिर की मूर्ति को “विधिक व्यक्ति” (Legal Person) माना जाता है।

इस सिद्धांत के अनुसार—

  • मंदिर की मूर्ति या देवता संपत्ति के मालिक हो सकते हैं।
  • उनके नाम पर मुकदमा दायर किया जा सकता है।
  • उनके अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

भारत की न्यायपालिका ने कई मामलों में यह सिद्धांत स्वीकार किया है कि देवता की संपत्ति की रक्षा करना कानून और राज्य की जिम्मेदारी है।


‘पैरेंस पैट्री’ की अवधारणा

अदालत ने अपने आदेश में “Parens Patriae” के सिद्धांत का भी उल्लेख किया।

इस सिद्धांत के अनुसार अदालत को उन व्यक्तियों या संस्थाओं के अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार होता है जो स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं।

चूंकि देवता या मंदिर स्वयं अदालत में उपस्थित होकर अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते, इसलिए अदालत उनके संरक्षक के रूप में कार्य कर सकती है।

अदालत ने कहा कि वह इसी सिद्धांत के तहत मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप कर रही है।


कानून के शासन की परीक्षा

अदालत ने यह भी कहा कि जब अदालत के आदेशों को संगठित विरोध या राजनीतिक दबाव के कारण लागू नहीं किया जाता, तब यह कानून के शासन (Rule of Law) की परीक्षा बन जाती है।

न्यायपालिका ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का कर्तव्य है कि वह कानून का पालन कराए, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कठिन परिस्थितियों का सामना क्यों न करना पड़े।

अदालत ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायालय के आदेशों का पालन करना हर सरकारी अधिकारी की संवैधानिक जिम्मेदारी है।


अदालत के निर्देश

इस मामले में अदालत ने कुछ महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए—

  1. मंदिर की जमीन से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई कर रहे सिविल कोर्ट्स को निर्देश दिया गया कि वे इन मामलों को जल्द से जल्द निपटाएं।
  2. अदालत ने कहा कि इन मामलों का निपटारा संभव हो तो छह महीने के भीतर किया जाए।
  3. प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिया गया कि वे संवैधानिक निष्ठा और दृढ़ता के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें।

इन निर्देशों का उद्देश्य मंदिर की जमीनों से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को तेज करना है।


मंदिर संपत्तियों पर अतिक्रमण: एक व्यापक समस्या

यह मामला केवल करूर जिले तक सीमित नहीं है। भारत के कई राज्यों में मंदिरों की जमीनों पर अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन चुका है।

इसके पीछे कई कारण हैं—

  • प्रशासनिक उदासीनता
  • राजनीतिक दबाव
  • भूमि रिकॉर्ड में गड़बड़ी
  • प्रभावशाली लोगों का हस्तक्षेप

यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो भविष्य में कई मंदिर अपनी संपत्तियों से वंचित हो सकते हैं।


प्रशासन की जिम्मेदारी

मंदिर संपत्तियों की सुरक्षा केवल धार्मिक भावना का विषय नहीं है, बल्कि यह कानून और प्रशासनिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है।

राज्य सरकारों के अधीन मंदिर प्रशासन से जुड़े विभागों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे मंदिरों की संपत्ति का संरक्षण करें और किसी भी अवैध कब्जे को हटाने के लिए कार्रवाई करें।

अदालत ने अपने आदेश में यही संदेश दिया कि प्रशासन को राजनीतिक दबाव या सामाजिक विरोध से प्रभावित हुए बिना कानून का पालन करना चाहिए।


निष्कर्ष

मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा प्रशासन को दिया गया एक महत्वपूर्ण संदेश है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्तियां भक्तों की आस्था और समाज की धरोहर हैं। इन्हें अवैध कब्जों से बचाना राज्य और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

“भगवान के पास वोट नहीं हैं, लेकिन उनके अधिकार हैं” — यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र में कानून की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करती है।

यदि अदालतों के आदेशों का समय पर पालन किया जाए और प्रशासन निष्पक्षता से कार्य करे, तो मंदिरों की संपत्तियों की रक्षा की जा सकती है और कानून के शासन को मजबूत बनाया जा सकता है।

इस मामले ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जब प्रशासन निष्क्रिय हो जाता है, तब न्यायपालिका आगे आकर व्यवस्था को संतुलित करने का कार्य करती है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।