RTE कानून में नई शर्त पर विवाद: 1 किलोमीटर की सीमा से शिक्षा के मौलिक अधिकार पर सवाल
प्रस्तावना
भारत में शिक्षा को केवल सामाजिक विकास का साधन ही नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार के रूप में भी मान्यता दी गई है। इसी उद्देश्य से 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act – RTE) लागू किया गया, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया। इस कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हों।
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा इस व्यवस्था में एक नई शर्त जोड़े जाने के बाद विवाद उत्पन्न हो गया है। सरकार ने 12 फरवरी 2026 को जारी आदेश में कहा कि RTE के तहत बच्चों को केवल उन्हीं स्कूलों में प्रवेश मिलेगा जो उनके घर से 1 किलोमीटर के दायरे में स्थित हों। इस निर्णय को चुनौती देते हुए चंद्रपुर जिले के दो नागरिकों ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में याचिका दायर की है। इस मामले ने शिक्षा के अधिकार, समान अवसर और सरकारी नीतियों की वैधता पर व्यापक बहस छेड़ दी है।
RTE कानून का उद्देश्य और महत्व
शिक्षा का अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य समाज के उन वर्गों तक शिक्षा पहुँचाना है जो आर्थिक या सामाजिक कारणों से शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।
इस अधिनियम के तहत—
- 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है।
- निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है।
- सरकार इन बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन करती है।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे गरीब और संपन्न वर्ग के बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ने का अवसर मिलता है, जिससे सामाजिक समावेशन और समानता को बढ़ावा मिलता है।
महाराष्ट्र सरकार का नया आदेश
12 फरवरी 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने एक सरकारी आदेश जारी किया, जिसके तहत RTE के अंतर्गत प्रवेश के लिए स्थानिकता (Proximity) का सिद्धांत लागू किया गया।
इस आदेश के अनुसार—
- बच्चे को केवल उसी स्कूल में प्रवेश मिलेगा जो उसके घर से 1 किलोमीटर के दायरे में स्थित हो।
- यदि उस दायरे में कोई निजी स्कूल उपलब्ध है तो उसी को प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकार का तर्क है कि इस नियम से बच्चों को स्कूल तक आने-जाने में सुविधा होगी और स्थानीय स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा।
लेकिन इस फैसले की आलोचना भी शुरू हो गई है, क्योंकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे RTE के वास्तविक उद्देश्य को नुकसान हो सकता है।
याचिका और न्यायिक चुनौती
चंद्रपुर जिले के नागरिक शंकर आत्राम और करिश्मा बांगडे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में जनहित याचिका दायर की है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट बोधी रामटेके और एडवोकेट दीपक चटप ने अदालत में पक्ष रखा।
याचिका में कहा गया है कि—
- 1 किलोमीटर की सीमा लागू करने से कई बच्चों को RTE के तहत प्रवेश नहीं मिल पाएगा।
- यह प्रावधान विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों के लिए हानिकारक है।
- यह शिक्षा के मौलिक अधिकार के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि RTE अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, न कि केवल भौगोलिक सीमा के आधार पर उन्हें सीमित करना।
हाई कोर्ट की प्रारंभिक प्रतिक्रिया
इस मामले में जस्टिस अनिल किल्लोर और जस्टिस राज वाकोडे की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह 9 मार्च 2026 तक अपना जवाब दाखिल करे और यह स्पष्ट करे कि 1 किलोमीटर की सीमा लागू करने का आधार क्या है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यह मामला बच्चों के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे गंभीरता से देखा जाएगा।
1 किलोमीटर की सीमा से संभावित समस्याएँ
यदि यह नियम लागू रहता है तो इसके कई व्यावहारिक प्रभाव सामने आ सकते हैं।
1. ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों पर प्रभाव
भारत के कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में निजी स्कूल बहुत कम होते हैं। ऐसे में यदि 1 किलोमीटर के दायरे में कोई स्कूल नहीं है, तो बच्चे RTE योजना का लाभ नहीं ले पाएंगे।
2. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सीमित विकल्प
कई बार पास का स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में बेहतर नहीं होता। यदि बच्चे को केवल नजदीकी स्कूल में ही प्रवेश मिलेगा तो उसके पास बेहतर शिक्षा चुनने का विकल्प समाप्त हो जाएगा।
3. सामाजिक समावेशन पर असर
RTE का उद्देश्य अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों को एक साथ शिक्षा देना है। यदि प्रवेश क्षेत्रीय सीमा तक सीमित कर दिया गया, तो यह उद्देश्य कमजोर हो सकता है।
संवैधानिक दृष्टिकोण
भारतीय संविधान में शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है।
अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है।
इसके अलावा—
- अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 15 सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 1 किलोमीटर की सीमा इन संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है क्योंकि इससे कई बच्चों के लिए शिक्षा का अवसर सीमित हो सकता है।
सरकार का संभावित पक्ष
हालांकि इस मामले में सरकार का विस्तृत जवाब अभी अदालत में प्रस्तुत नहीं हुआ है, लेकिन संभावित रूप से सरकार निम्नलिखित तर्क दे सकती है—
- बच्चों की सुरक्षा और सुविधा के लिए स्थानीय स्कूल में प्रवेश आवश्यक है।
- इससे स्कूलों में सीटों का संतुलित वितरण होगा।
- स्थानीय समुदाय के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या ये तर्क शिक्षा के मौलिक अधिकार को सीमित करने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं या नहीं।
न्यायपालिका की भूमिका
भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा शिक्षा के अधिकार को महत्वपूर्ण माना है। कई मामलों में अदालतों ने यह कहा है कि शिक्षा केवल एक सेवा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम है।
यदि किसी सरकारी नीति से शिक्षा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो अदालतें उसकी वैधता की जांच करती हैं।
इस मामले में भी हाई कोर्ट यह तय करेगा कि राज्य सरकार का आदेश RTE अधिनियम और संविधान के अनुरूप है या नहीं।
व्यापक सामाजिक प्रभाव
यह मामला केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यदि अदालत इस नियम को वैध ठहराती है, तो अन्य राज्य भी इसी तरह के नियम लागू कर सकते हैं।
इसके विपरीत यदि अदालत इसे रद्द करती है, तो यह शिक्षा के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
इसलिए शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ, सामाजिक संगठन और अभिभावक इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।
निष्कर्ष
शिक्षा का अधिकार अधिनियम भारत में सामाजिक न्याय और समान अवसर की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसका उद्देश्य केवल बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर और समान शिक्षा उपलब्ध कराना है।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा लागू की गई 1 किलोमीटर की सीमा ने इस उद्देश्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार इसे प्रशासनिक सुधार के रूप में देख रही है, वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह नियम गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर सीमित कर सकता है।
अब यह मामला मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के सामने है, जो यह तय करेगी कि यह आदेश शिक्षा के मौलिक अधिकार और RTE अधिनियम की भावना के अनुरूप है या नहीं।
अदालत का अंतिम निर्णय न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश में शिक्षा नीति और RTE के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।