एकल मां के अधिकार, प्रेम विवाह की स्वतंत्रता और पॉक्सो कानून की दुविधा: बदलते समाज के बीच भारतीय कानून की संवैधानिक परीक्षा
भारतीय न्यायिक व्यवस्था समय-समय पर ऐसे फैसले देती रही है जो समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच और कानूनी संरचनाओं को चुनौती देते हैं। हाल ही में Bombay High Court द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय इसी दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है। अदालत ने एक बलात्कार से उत्पन्न मामले में यह स्पष्ट किया कि एकल मां को “पूर्ण माता-पिता” के रूप में मान्यता देना कोई दया या विशेष अनुग्रह नहीं है, बल्कि यह संविधान के प्रति निष्ठा और समानता के सिद्धांत का पालन है।
यह मामला उस स्थिति से जुड़ा था जिसमें एक महिला ने बलात्कार के बाद एक बच्चे को जन्म दिया। बाद में पक्षों के बीच हुए समझौते में यह तय हुआ कि बच्चे का पालन-पोषण पूरी तरह मां ही करेगी और आरोपी पिता की भविष्य में प्राकृतिक अभिभावक के रूप में कोई भूमिका नहीं होगी। लेकिन डीएनए रिपोर्ट में पितृत्व की पुष्टि होने के कारण जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल रिकॉर्ड में आरोपी का नाम पिता के रूप में दर्ज हो गया था। जब मां ने स्कूल प्रशासन से पिता का नाम हटाने का अनुरोध किया तो उसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने न केवल पिता के नाम को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया बल्कि यह भी निर्देश दिया कि बच्चे के नाम के साथ मां का नाम और उपनाम दर्ज किया जाए। अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि एकल मां के अधिकारों को मान्यता देना समाज और कानून दोनों के लिए आवश्यक है।
गीता हरिहरन मामला और मां की अभिभावकता
भारत में मातृत्व और अभिभावकता के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय 1999 में आया था, जब Supreme Court of India ने प्रसिद्ध लेखिका Geeta Hariharan के मामले में महत्वपूर्ण व्याख्या की थी। यह मामला Hindu Minority and Guardianship Act, 1956 के प्रावधानों से जुड़ा हुआ था।
इस कानून के तहत पिता को प्राथमिक प्राकृतिक अभिभावक माना गया था और मां को द्वितीय स्थान दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल लिंग के आधार पर मां को हीन स्थिति में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि मां का अधिकार भी पिता के समान है और परिस्थितियों के अनुसार वह भी प्राकृतिक अभिभावक हो सकती है।
यह निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। बॉम्बे हाईकोर्ट का हालिया फैसला उसी संवैधानिक सोच को आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है।
पितृसत्तात्मक मानसिकता और सामाजिक वास्तविकता
हालांकि कानून में समानता की बात लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में पितृसत्तात्मक सोच अभी भी काफी मजबूत है। कई सरकारी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक नियमों में भी यह मानसिकता दिखाई देती है।
उदाहरण के तौर पर गुजरात में विवाह पंजीकरण से संबंधित नियमों में हाल ही में किया गया संशोधन चर्चा का विषय बना हुआ है। Gujarat Marriage Registration Act, 2006 के नियम 3(7) में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा गया है कि विवाह का ज्ञापन दूल्हा और दुल्हन के माता-पिता को भी स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जाएगा।
पहली नजर में यह नियम सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया जैसा लगता है, लेकिन इसके सामाजिक प्रभाव को समझना आवश्यक है। भारतीय समाज में प्रेम विवाह को लेकर अभी भी कई परिवारों में विरोध की स्थिति रहती है। विशेष रूप से लड़कियों पर परिवार और समाज का दबाव अधिक होता है।
यदि विवाह पंजीकरण की सूचना सीधे माता-पिता तक पहुंचती है तो कई मामलों में यह युवाओं के लिए कठिन स्थिति पैदा कर सकती है। खासकर उन मामलों में जहां दो वयस्क अपनी इच्छा से विवाह करना चाहते हैं लेकिन परिवार इसकी अनुमति नहीं देता।
वयस्कों की पसंद और संवैधानिक अधिकार
भारत के संविधान ने प्रत्येक नागरिक को गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया है। Constitution of India के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने Laxmibai Chandaragi B v State of Karnataka के मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि दो वयस्क व्यक्ति विवाह के लिए सहमत हैं तो परिवार या समुदाय की सहमति आवश्यक नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति का चुनाव उसकी गरिमा का अभिन्न हिस्सा है और इसे “समूह सम्मान” या सामाजिक दबाव के सामने झुकने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा निजता के अधिकार से जुड़े ऐतिहासिक फैसले Justice K. S. Puttaswamy v Union of India में भी सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि व्यक्तिगत संबंधों, विवाह और परिवार से जुड़े निर्णय व्यक्ति की स्वायत्तता का हिस्सा हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारतीय न्यायपालिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता को एक मौलिक अधिकार के रूप में देखती है।
‘लव जिहाद’ और सामाजिक विवाद
हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में “लव जिहाद” जैसे मुद्दों को लेकर भी कानून और प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं। कई बार इनका प्रभाव प्रेम विवाह करने वाले युवाओं पर भी पड़ता है।
आलोचकों का कहना है कि यदि राज्य ऐसे नियम बनाता है जो अप्रत्यक्ष रूप से वयस्कों के विवाह के निर्णय को कठिन बना देते हैं, तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर असर डाल सकता है। इस संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि अदालतें ही यह सुनिश्चित करती हैं कि राज्य की शक्ति नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे।
पॉक्सो कानून और किशोर संबंधों की दुविधा
एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी बहस Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 यानी पॉक्सो कानून से जुड़ी हुई है। इस कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है और इस दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण कानून है।
लेकिन इसके वर्तमान स्वरूप में एक गंभीर कानूनी दुविधा सामने आती है। पॉक्सो कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को “बच्चा” माना जाता है और उसके साथ होने वाली किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, भले ही वह सहमति से ही क्यों न हुई हो।
इसका परिणाम यह होता है कि यदि दो किशोर आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं, तब भी कानून उन्हें अपराध की श्रेणी में रख सकता है।
सहमति और आपराधिक दायित्व का विरोधाभास
यहीं एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। कानून यह मानता है कि 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति यौन संबंध के लिए वैध सहमति देने में सक्षम नहीं है। लेकिन उसी व्यक्ति को गंभीर यौन अपराध करने के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इस स्थिति को अक्सर इस वाक्य में व्यक्त किया जाता है कि “16 साल का लड़का सेक्स नहीं कर सकता, लेकिन बलात्कार कर सकता है।”
यह विरोधाभास कई मामलों में न्यायिक और सामाजिक विवाद का कारण बनता है, विशेष रूप से तब जब दोनों पक्ष लगभग समान आयु के होते हैं और संबंध सहमति से बने होते हैं।
न्यायालयों की चिंताएं
कई न्यायालयों ने पॉक्सो कानून के इस कठोर स्वरूप पर चिंता व्यक्त की है। उदाहरण के लिए Madras High Court ने कई मामलों में कहा है कि किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को भी पॉक्सो के तहत अपराध मानना उचित नहीं है।
इसी प्रकार Supreme Court of India ने भी हाल के कुछ मामलों में यह संकेत दिया है कि कानून में सुधार की आवश्यकता हो सकती है, ताकि वास्तविक शोषण और सहमति वाले किशोर संबंधों के बीच अंतर किया जा सके।
रोमियो-जूलियट क्लॉज की अवधारणा
कई देशों में इस समस्या के समाधान के लिए “रोमियो-जूलियट क्लॉज” को अपनाया गया है। इस प्रावधान के तहत यदि दोनों पक्ष किशोर हैं और उनके बीच उम्र का अंतर बहुत कम है, तो सहमति से बने संबंधों को अपराध नहीं माना जाता।
इस प्रकार का प्रावधान बच्चों को शोषण से बचाने के उद्देश्य को बनाए रखते हुए किशोर संबंधों को अनावश्यक रूप से अपराध की श्रेणी में आने से रोक सकता है।
निष्कर्ष
भारतीय कानून और समाज दोनों ही एक परिवर्तनशील दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर न्यायपालिका एकल मां के अधिकारों को मान्यता देकर लैंगिक समानता को मजबूत कर रही है, तो दूसरी ओर प्रेम विवाह और किशोर संबंधों से जुड़े मुद्दे यह दिखाते हैं कि कानून को समय के साथ संतुलित तरीके से विकसित करने की आवश्यकता है।
एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना, वयस्कों की विवाह संबंधी स्वतंत्रता की रक्षा करना और पॉक्सो कानून में व्यावहारिक सुधार पर विचार करना—ये सभी कदम उसी दिशा में हैं जहां कानून समाज की बदलती वास्तविकताओं के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके।
भारतीय लोकतंत्र की ताकत भी इसी में है कि वह निरंतर संवाद, न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से अपने कानूनों को अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय बनाता रहे।