“न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता बनाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग: फर्जी एआई फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और जवाबदेही की नई रेखा”
प्रस्तावना
डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। न्यायालय भी इससे अछूते नहीं हैं। शोध, दस्तावेज़ीकरण, केस-लॉ खोज और प्रशासनिक सहायता में एआई की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। किंतु जब यही तकनीक बिना सत्यापन के न्यायिक आदेशों का आधार बनने लगे और काल्पनिक या अस्तित्वहीन फैसलों का हवाला दिया जाए, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं रह जाती—यह न्याय की बुनियाद पर आघात बन जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में एआई के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि फर्जी या गैर-मौजूद एआई फैसलों के आधार पर दिया गया आदेश मात्र निर्णय की गलती नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे गंभीर “न्यायिक कदाचार” (Judicial Misconduct) की श्रेणी में रखा जाएगा।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने इस मुद्दे को केवल एक मामले तक सीमित न मानते हुए संपूर्ण न्यायिक प्रणाली की अखंडता से जुड़ा प्रश्न बताया है।
विवाद की पृष्ठभूमि: ट्रायल कोर्ट की लापरवाही
पूरा विवाद आंध्र प्रदेश की एक निचली अदालत के आदेश से उत्पन्न हुआ। एक संपत्ति विवाद में एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट पर आपत्तियों को खारिज करते समय ट्रायल कोर्ट ने कुछ पूर्व निर्णयों का हवाला दिया।
जब इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, तब यह तथ्य सामने आया कि जिन तथाकथित निर्णयों का उल्लेख किया गया था, वे वास्तविकता में अस्तित्व में ही नहीं थे। वे एआई द्वारा तैयार किए गए “Synthetic” दस्तावेज़ थे।
हाईकोर्ट ने चेतावनी तो दी, किंतु मामले को गुण-दोष (merits) के आधार पर निपटा दिया। अब शीर्ष अदालत इस पूरी प्रक्रिया की ईमानदारी और पवित्रता की गहन जांच कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: त्रुटि नहीं, कदाचार
पीठ ने 27 फरवरी के अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा—
“एआई द्वारा उत्पन्न गैर-मौजूद, फर्जी या कृत्रिम कथित निर्णयों पर आधारित आदेश देना निर्णय लेने में त्रुटि नहीं है; यह कदाचार होगा और इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे।”
यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः न्यायिक त्रुटि (judicial error) अपील का विषय होती है। किंतु न्यायिक कदाचार (misconduct) अनुशासनात्मक और नैतिक उत्तरदायित्व को जन्म देता है।
अर्थात, यदि कोई न्यायिक अधिकारी या अधिवक्ता जानबूझकर या घोर लापरवाही से फर्जी एआई सामग्री का उपयोग करता है, तो वह केवल कानूनी गलती नहीं, बल्कि आचार-विचार के उल्लंघन का दोषी माना जा सकता है।
नोटिस और संस्थागत जवाबदेही
मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने—
- अटॉर्नी जनरल
- सॉलिसिटर जनरल
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया
को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह कदम दर्शाता है कि अदालत इस मुद्दे को व्यक्तिगत त्रुटि के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत चुनौती के रूप में देख रही है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया अधिवक्ताओं के आचरण और पेशेवर मानकों का नियामक निकाय है। यदि एआई-निर्मित फर्जी निर्णयों का उपयोग अधिवक्ताओं द्वारा किया जा रहा है, तो यह पेशेवर नैतिकता का गंभीर उल्लंघन है।
न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता पर खतरा
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक आदेश की वैधता तक सीमित नहीं है। यह न्याय वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है।
न्यायिक निर्णय पूर्ववर्ती निर्णयों (precedents) पर आधारित होते हैं। यदि वे आधार ही काल्पनिक हों, तो—
- विधिक तर्कशक्ति कमजोर हो जाती है।
- न्यायिक अनुक्रम (judicial consistency) टूट जाता है।
- जनता का विश्वास डगमगा सकता है।
इस प्रकार, एआई का दुरुपयोग न्याय की बुनियाद को ही हिला सकता है।
एआई: अवसर और चुनौती
एआई स्वयं में न तो अच्छा है, न बुरा। यह एक उपकरण (tool) है।
- शोध में सहायक
- दस्तावेज़ तैयार करने में उपयोगी
- केस लॉ खोजने में सक्षम
किन्तु एआई-आधारित जनरेटिव मॉडल कभी-कभी “Hallucination” करते हैं—अर्थात ऐसी जानकारी प्रस्तुत करते हैं जो विश्वसनीय प्रतीत होती है, परंतु तथ्यात्मक रूप से गलत या काल्पनिक होती है।
यदि अधिवक्ता या न्यायिक अधिकारी बिना सत्यापन के ऐसी सामग्री को स्वीकार कर लें, तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता की नियुक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को इस मामले में सहायता के लिए नियुक्त किया है। यह कदम दर्शाता है कि अदालत इस विषय पर व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने की दिशा में विचार कर सकती है।
संभव है कि भविष्य में—
- एआई उपयोग के लिए आचार-संहिता बने
- सत्यापन अनिवार्य किया जाए
- न्यायिक अधिकारियों और अधिवक्ताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हों
ट्रायल कोर्ट पर रोक और अगली सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल ट्रायल कोर्ट को विवादित एडवोकेट-कमिश्नर रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने से रोक दिया है। अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की गई है।
यह अंतरिम आदेश दर्शाता है कि अदालत पहले प्रक्रिया की शुचिता सुनिश्चित करना चाहती है, उसके बाद ही मामले के गुण-दोष पर आगे बढ़ेगी।
न्यायिक नैतिकता और पेशेवर जिम्मेदारी
अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों पर सत्यता और प्रामाणिकता की सर्वोच्च जिम्मेदारी होती है।
यदि कोई अधिवक्ता जानबूझकर फर्जी एआई निर्णयों का हवाला देता है, तो वह पेशेवर दायित्व का उल्लंघन करता है।
यदि कोई न्यायिक अधिकारी बिना सत्यापन के ऐसे निर्णयों पर भरोसा करता है, तो यह न्यायिक कर्तव्य की गंभीर उपेक्षा है।
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे केवल “मानवीय भूल” मानने से इंकार किया है।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ
दुनिया के कई देशों में एआई के दुरुपयोग की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जहां अधिवक्ताओं ने चैटबॉट से प्राप्त काल्पनिक केस लॉ को अदालत में प्रस्तुत कर दिया।
भारतीय न्यायपालिका का यह रुख समयोचित है। यदि अभी स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं बने, तो भविष्य में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है।
संभावित दिशानिर्देश
सर्वोच्च न्यायालय की आगामी सुनवाई में निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार हो सकता है—
- एआई सामग्री का अनिवार्य सत्यापन।
- अधिवक्ताओं द्वारा उपयोग की गई एआई सहायता का प्रकटीकरण (disclosure)।
- न्यायिक अधिकारियों के लिए डिजिटल प्रशिक्षण।
- फर्जी सामग्री प्रस्तुत करने पर दंडात्मक कार्रवाई।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि तकनीक का स्वागत है, किंतु सत्य और प्रामाणिकता की कीमत पर नहीं।
फर्जी एआई फैसलों का उपयोग केवल निर्णय की त्रुटि नहीं, बल्कि न्यायिक कदाचार है—यह घोषणा न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आने वाले समय में यह मामला संभवतः न्यायालयों में एआई उपयोग के लिए एक व्यापक आचार-संहिता की नींव रखेगा।
न्याय का आधार विश्वास है। यदि उस विश्वास को कृत्रिम और काल्पनिक तथ्यों से आघात पहुंचेगा, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा प्रभावित होगी।
इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम केवल एक मामले की सुनवाई नहीं, बल्कि न्याय की मर्यादा की रक्षा का ऐतिहासिक प्रयास है।