अनुकंपा नियुक्ति में ‘मृत्यु की तिथि’ ही निर्णायक आधार: हिमाचल हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश, 709 दिन की देरी पर सरकार को फटकार
अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रित को नौकरी देने के लिए वही नीति लागू होगी, जो मृत्यु की तिथि पर प्रभावी थी। बाद में नीति में हुए बदलावों का लाभ या हानि आश्रित पर थोपना विधिसम्मत नहीं है।
खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी शामिल थे, ने राज्य सरकार की अपील को न केवल खारिज किया, बल्कि अपील दायर करने में हुई 709 दिनों की देरी को भी माफ करने से इनकार कर दिया। अदालत ने इसे प्रशासनिक सुस्ती और घोर लापरवाही करार दिया।
प्रकरण की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी अनुज कुमारी के पति शिक्षा विभाग में जेबीटी शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। 12 जनवरी 2017 को उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य के निधन के बाद अनुज कुमारी ने अनुकंपा आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया।
सरकार ने 23 जुलाई 2021 को उनका आवेदन यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वह 2019 में लागू नई अनुकंपा नीति के उच्च आय मानदंड के तहत पात्र नहीं हैं।
एकलपीठ ने इस निर्णय को अवैध मानते हुए कहा था कि आवेदन पर विचार 2017 में प्रभावी नीति के अनुसार किया जाना चाहिए था। साथ ही शिक्षा विभाग को छह सप्ताह के भीतर मामले पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए गए थे।
मृत्यु की तिथि ही क्यों निर्णायक?
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आई आर्थिक विपत्ति से उबारना है। यह कोई नियमित नियुक्ति प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना पर आधारित अपवादात्मक व्यवस्था है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार ‘मृत्यु की घटना’ से उत्पन्न होता है।
- इसलिए पात्रता का निर्धारण भी उसी तिथि पर लागू नीति के अनुसार होना चाहिए।
- बाद की नीतिगत कठोरता या उदारता को पिछली घटनाओं पर लागू नहीं किया जा सकता।
पीठ ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि नीति परिवर्तन का प्रभाव भविष्य के मामलों पर होगा, न कि उन मामलों पर जहां अधिकार पहले ही जन्म ले चुका है।
709 दिन की देरी पर सख्त रुख
राज्य सरकार ने एकलपीठ के आदेश को चुनौती देने में 709 दिनों की देरी की। सरकार ने दलील दी कि विभागीय प्रक्रियाओं और फाइलों के एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमने के कारण समय लगा।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि—
- अक्टूबर 2023 में सरकार को आदेश की प्रति मिल चुकी थी।
- अक्टूबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
- दूसरी बार अनुरोध किए जाने के बाद भी मई 2025 में जाकर अपील दायर करने की मंजूरी दी गई।
पीठ ने इसे “घोर लापरवाही और निष्क्रियता” बताया और कहा कि नौकरशाही की उदासीनता को देरी का वैध कारण नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब मामला एक विधवा के जीवन-निर्वाह से जुड़ा हो।
‘संस्थागत हित’ बनाम ‘व्यक्तिगत गलती’ का तर्क
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अधिकारियों की व्यक्तिगत चूक के कारण राज्य के संस्थागत हितों को नुकसान नहीं होना चाहिए। उन्होंने जुर्माना लगाकर देरी माफ करने का अनुरोध किया।
अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि—
- राज्य एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) है।
- उससे अपेक्षा की जाती है कि वह संवेदनशील मामलों में तत्परता और निष्पक्षता दिखाए।
- यदि राज्य स्वयं लापरवाही करे, तो उसे उसका परिणाम भी भुगतना होगा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि सरकारी तंत्र की सुस्ती का खामियाजा एक पीड़ित परिवार को नहीं भुगतना चाहिए।
प्रशासनिक जवाबदेही पर न्यायिक टिप्पणी
निर्णय में न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि प्रशासनिक विलंब और फाइलों का विभागों में घूमना न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने का औचित्य नहीं बन सकता।
न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि सरकारी मशीनरी समय पर निर्णय नहीं लेती, तो न्यायालय देरी को सहानुभूतिपूर्वक नहीं देखेगा। विशेषकर ऐसे मामलों में जहां सामाजिक सुरक्षा और आजीविका का प्रश्न हो।
व्यापक विधिक महत्व
यह निर्णय केवल एक विधवा की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक निहितार्थ हैं—
- नीति की समय-सीमा स्पष्ट: भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े विवादों में मृत्यु की तिथि ही आधार होगी।
- राज्य की जिम्मेदारी: सरकार को यह संदेश कि संवेदनशील मामलों में विलंब अस्वीकार्य है।
- न्यायिक अनुशासन: अपील दायर करने में अत्यधिक देरी को साधारण प्रशासनिक कारणों से माफ नहीं किया जाएगा।
यह फैसला उन हजारों आश्रितों के लिए भी मार्गदर्शक है, जिनके आवेदन नीति परिवर्तन के कारण विवादों में फंसे रहते हैं।
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का यह निर्णय अनुकंपा नियुक्ति के सिद्धांतों को पुनः पुष्ट करता है कि यह व्यवस्था मानवीय आधार पर है, न कि केवल प्रशासनिक औपचारिकता।
मृत्यु की तिथि पर लागू नीति ही पात्रता का निर्धारण करेगी — यह स्पष्ट संदेश राज्य सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है। साथ ही, 709 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर अदालत ने यह भी जता दिया कि नौकरशाही की सुस्ती अब न्यायिक सहानुभूति की हकदार नहीं मानी जाएगी।
यह निर्णय संवेदनशील प्रशासन, जवाबदेही और विधि के शासन (Rule of Law) के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है।