अपकृत्य दायित्व के बचाव के रूप में “राज्य के कृत्य” (Act of State) का सिद्धांत : ऐतिहासिक विकास, न्यायिक दृष्टिकोण और समकालीन प्रासंगिकता
प्रस्तावना
अपकृत्य विधि (Law of Torts) का मूल आधार यह है कि यदि किसी व्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन होता है और उसे हानि पहुँचती है, तो हानि पहुँचाने वाला व्यक्ति प्रतिकर देने के लिए उत्तरदायी होगा। परंतु इस सामान्य सिद्धांत के कुछ अपवाद भी हैं। इन्हीं अपवादों में एक महत्वपूर्ण बचाव है — “राज्य के कृत्य” (Act of State)।
यह सिद्धांत उन परिस्थितियों में लागू होता है जहाँ संप्रभु राज्य अपनी बाह्य संप्रभु शक्ति का प्रयोग करता है। ऐसे मामलों में राज्य को सामान्य अपकृत्य दायित्व से छूट मिल सकती है। इस निबंध में हम “राज्य के कृत्य” के अर्थ, तत्व, न्यायिक विकास, महत्व, सीमाएँ तथा समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. “राज्य के कृत्य” की अवधारणा
“राज्य के कृत्य” से अभिप्राय ऐसे कार्यों से है जो राज्य द्वारा अपनी संप्रभु शक्ति के प्रयोग में, विशेषकर विदेशी राज्य या विदेशी नागरिकों के संबंध में, किए जाते हैं। यह कार्य राजनीतिक या कूटनीतिक प्रकृति के होते हैं और सामान्य न्यायिक परीक्षण के अधीन नहीं होते।
इस सिद्धांत का मूल आधार यह है कि न्यायालयों को संप्रभु राज्य के बाह्य राजनीतिक कार्यों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए। यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत से भी संबंधित है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास
“Act of State” का सिद्धांत ब्रिटिश विधि में विकसित हुआ और औपनिवेशिक भारत में भी इसे अपनाया गया।
प्रसिद्ध मामला Secretary of State v. Kamachee Boye Sahaba इस सिद्धांत का आधारभूत निर्णय माना जाता है। इस मामले में मद्रास प्रेसीडेंसी द्वारा एक रियासत के अधिग्रहण के पश्चात संपत्ति जब्त की गई थी। न्यायालय ने कहा कि यह कार्य संप्रभु शक्ति के प्रयोग में किया गया था और इसे अपकृत्य नहीं माना जा सकता।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय न्यायालयों ने राज्य की उत्तरदायित्व संबंधी अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया। State of Rajasthan v. Vidyawati में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य सामान्य प्रशासनिक कार्यों में अपने कर्मचारियों की लापरवाही के लिए उत्तरदायी होगा।
बाद में Kasturi Lal v. State of Uttar Pradesh में न्यायालय ने संप्रभु कार्य और गैर-संप्रभु कार्य के बीच अंतर स्पष्ट किया और कुछ परिस्थितियों में राज्य को प्रतिरक्षा प्रदान की।
3. “राज्य के कृत्य” के आवश्यक तत्व
“Act of State” के सफल बचाव के लिए कुछ तत्व आवश्यक हैं—
- कार्य संप्रभु राज्य द्वारा किया गया हो।
- वह कार्य बाह्य संप्रभु शक्ति के प्रयोग में हो।
- कार्य का संबंध विदेशी नागरिक या विदेशी राज्य से हो।
- वह कार्य राजनीतिक या कूटनीतिक प्रकृति का हो।
यदि ये तत्व उपस्थित नहीं हैं, तो राज्य इस बचाव का लाभ नहीं उठा सकता।
4. अपकृत्य दायित्व के बचाव के रूप में महत्व
(क) संप्रभुता की रक्षा
यह सिद्धांत राज्य की बाह्य संप्रभु शक्ति को सुरक्षित रखता है। यदि हर संप्रभु कार्य पर न्यायिक हस्तक्षेप होने लगे, तो शासन संचालन कठिन हो जाएगा।
(ख) शक्तियों का पृथक्करण
न्यायपालिका को कार्यपालिका के राजनीतिक निर्णयों में हस्तक्षेप से रोका जाता है। इससे संवैधानिक संतुलन बना रहता है।
(ग) अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थिरता
युद्ध, संधि, कूटनीतिक मान्यता या क्षेत्रीय अधिग्रहण जैसे मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप से अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यह सिद्धांत ऐसी स्थिति को रोकता है।
(घ) प्रशासनिक दक्षता
राज्य को यह आश्वासन मिलता है कि संप्रभु निर्णयों के कारण उस पर अनावश्यक मुकदमेबाजी का बोझ नहीं पड़ेगा।
5. सीमाएँ और आलोचनाएँ
हालाँकि “राज्य के कृत्य” एक महत्वपूर्ण बचाव है, परंतु इसकी कुछ सीमाएँ हैं—
- नागरिकों के विरुद्ध नहीं – अपने ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को “Act of State” कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
- संवैधानिक मर्यादा – भारतीय संविधान के लागू होने के बाद राज्य पूर्णतः निरंकुश नहीं है।
- न्यायिक समीक्षा – यदि कार्य स्पष्ट रूप से अवैध या मनमाना हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं।
आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत राज्य को अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है और पीड़ित व्यक्ति को न्याय से वंचित कर सकता है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में उत्तरदायित्व (Accountability) को अधिक महत्व दिया जाता है।
6. आधुनिक भारतीय परिप्रेक्ष्य
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 के अंतर्गत राज्य की देयता निर्धारित की गई है। न्यायालयों ने समय के साथ राज्य दायित्व को विस्तारित किया है और “संप्रभु कार्य” की अवधारणा को संकीर्ण किया है।
आज के समय में पुलिस, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा या अन्य प्रशासनिक सेवाओं में की गई लापरवाही को संप्रभु कार्य नहीं माना जाता।
इस प्रकार “Act of State” का प्रयोग अब केवल विशेष और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाता है।
7. न्यायिक प्रवृत्ति
समकालीन न्यायिक दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि राज्य को अधिक उत्तरदायी बनाया जा रहा है। मानवाधिकार, मौलिक अधिकार और विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा ने राज्य की प्रतिरक्षा को सीमित कर दिया है।
न्यायालय अब यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की शक्ति का प्रयोग न्यायसंगत, पारदर्शी और विधिसम्मत हो।
निष्कर्ष
“राज्य के कृत्य” अपकृत्य दायित्व के बचाव के रूप में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो संप्रभुता, शक्तियों के पृथक्करण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थिरता की रक्षा करता है।
किन्तु आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में इसकी सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दी गई है। अब राज्य पूर्ण प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकता, विशेषकर जब उसके कार्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।
अतः यह कहा जा सकता है कि “Act of State” का सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है, परंतु इसका प्रयोग सीमित, सावधानीपूर्ण और न्यायसंगत परिस्थितियों में ही किया जाता है।
नीचे प्रश्न “अपकृत्य दायित्व के बचाव के रूप में ‘राज्य के कृत्य’ (Act of State) का महत्व” पर 5 शॉर्ट आंसर दिए जा रहे हैं —
1. “राज्य के कृत्य” (Act of State) का अर्थ क्या है?
“राज्य के कृत्य” से आशय ऐसे कार्यों से है जो संप्रभु राज्य अपनी बाह्य संप्रभु शक्ति (external sovereign power) के प्रयोग में करता है, विशेषकर विदेशी राज्य या विदेशी नागरिकों के संबंध में। ऐसे कार्य राजनीतिक, कूटनीतिक या युद्धकालीन प्रकृति के होते हैं। सामान्यतः इन कृत्यों के लिए राज्य पर अपकृत्य (tort) का दावा नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि न्यायालय संप्रभु राज्य के राजनीतिक निर्णयों की समीक्षा नहीं करेंगे। इस प्रकार “Act of State” अपकृत्य दायित्व से एक विशेष प्रकार की प्रतिरक्षा प्रदान करता है, परंतु यह प्रतिरक्षा सीमित परिस्थितियों में ही उपलब्ध होती है।
2. अपकृत्य दायित्व के बचाव के रूप में इसका महत्व
“राज्य के कृत्य” का सिद्धांत राज्य को उन कार्यों के लिए उत्तरदायित्व से बचाता है जो उसने संप्रभुता के प्रयोग में किए हों। इसका महत्व इस बात में है कि यह शासन को सुचारु रूप से कार्य करने की स्वतंत्रता देता है। यदि प्रत्येक कूटनीतिक या सैन्य निर्णय पर अपकृत्य दावा किया जाए, तो प्रशासनिक कार्य बाधित हो सकते हैं। यह सिद्धांत शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) को भी सुदृढ़ करता है, क्योंकि न्यायपालिका राजनीतिक प्रश्नों में हस्तक्षेप नहीं करती। अतः यह राज्य की संप्रभु गरिमा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्थिरता बनाए रखने में सहायक है।
3. “राज्य के कृत्य” और “संप्रभु कार्य” में अंतर
“राज्य के कृत्य” (Act of State) और “संप्रभु कार्य” (Sovereign Function) में अंतर समझना आवश्यक है। Act of State सामान्यतः विदेशी तत्व से संबंधित होता है, जैसे— युद्ध, संधि, या क्षेत्रीय अधिग्रहण। जबकि संप्रभु कार्य वे होते हैं जो राज्य अपने प्रशासनिक कर्तव्यों के अंतर्गत करता है, जैसे पुलिस व्यवस्था या कर संग्रह। सभी संप्रभु कार्य Act of State नहीं होते। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि सामान्य प्रशासनिक लापरवाही के लिए राज्य उत्तरदायी हो सकता है, परंतु विशुद्ध बाह्य संप्रभु कृत्यों के लिए उसे प्रतिरक्षा मिल सकती है।
4. इस सिद्धांत की सीमाएँ
“राज्य के कृत्य” का बचाव पूर्ण नहीं है। यह अपने ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर लागू नहीं होता। भारतीय संविधान के लागू होने के बाद राज्य विधि के शासन (Rule of Law) के अधीन है। यदि राज्य का कार्य मनमाना, अवैध या संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं। अतः यह सिद्धांत केवल उन सीमित परिस्थितियों में लागू होता है जहाँ कार्य पूर्णतः राजनीतिक और बाह्य संप्रभु प्रकृति का हो।
5. भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायालयों ने समय के साथ राज्य की उत्तरदायित्व की अवधारणा को विस्तारित किया है। State of Rajasthan v. Vidyawati में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य अपने कर्मचारियों की लापरवाही के लिए उत्तरदायी हो सकता है। वहीं Kasturi Lal v. State of Uttar Pradesh में संप्रभु कार्यों के लिए सीमित प्रतिरक्षा को स्वीकार किया गया। वर्तमान प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि “Act of State” का बचाव संकीर्ण रूप में लागू होता है और राज्य को अधिक उत्तरदायी बनाया जा रहा है।