मेहर (Dower / Mahr) की परिभाषा, स्वरूप तथा मुस्लिम विवाह विधि में उसका महत्व
प्रस्तावना
मुस्लिम विधि (Mohammedan Law) में विवाह (निकाह) को एक नागरिक संविदा (Civil Contract) माना गया है। इस संविदा के आवश्यक तत्वों में प्रस्ताव (Ijab), स्वीकृति (Qubul) और मेहर (Mahr) का विशेष स्थान है। मेहर वह धनराशि या संपत्ति है जिसे पति अपनी पत्नी को विवाह के प्रतिफल (consideration) के रूप में देने का वचन देता है।
मेहर केवल एक औपचारिक भुगतान नहीं है, बल्कि यह पत्नी का विधिक अधिकार (Legal Right) है, जो उसकी आर्थिक सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक है। मुस्लिम विवाह विधि में मेहर की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे विवाह की अनिवार्य शर्तों में गिना जाता है।
इस उत्तर में हम—
- मेहर की परिभाषा
- उसका स्वरूप (Nature)
- मेहर के प्रकार
- मेहर के अधिकार और विधिक प्रभाव
- मुस्लिम विवाह विधि में मेहर का महत्व
का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भाग – I
मेहर (Mahr) की परिभाषा
1. शब्दार्थ
“मेहर” या “महर” (Mahr) अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है—विवाह के अवसर पर दिया जाने वाला अनिवार्य धन या संपत्ति।
2. विधिक परिभाषा
मुस्लिम विधि के अनुसार—
“मेहर वह धन या संपत्ति है, जिसे पति विवाह के प्रतिफल के रूप में पत्नी को देने के लिए बाध्य होता है।”
यह पति पर एक वैधानिक दायित्व (Legal Obligation) है।
भाग – II
मेहर का स्वरूप (Nature of Dower)
मेहर की प्रकृति को समझना अत्यंत आवश्यक है।
1. विवाह का आवश्यक अंग
मेहर विवाह का अनिवार्य तत्व है।
यदि विवाह के समय मेहर निर्धारित न किया गया हो, तो भी विवाह वैध रहेगा, परंतु पत्नी उचित मेहर (Proper Dower) की हकदार होगी।
2. पत्नी का पूर्ण अधिकार
मेहर पत्नी की व्यक्तिगत संपत्ति (Absolute Property) है।
उस पर पति या ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होता।
3. संविदात्मक दायित्व
चूँकि विवाह एक संविदा है, इसलिए मेहर उसका प्रतिफल (consideration) है।
यह पत्नी की यौन-निष्ठा या सेवा का मूल्य नहीं, बल्कि विवाह संबंध की वैधता का प्रतीक है।
4. सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक
मेहर पत्नी के सम्मान (Dignity) और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक है।
5. देयता (Debt) का स्वरूप
मेहर पति पर एक ऋण (Debt) के समान है।
यदि पति की मृत्यु हो जाए, तो पत्नी उसकी संपत्ति से मेहर वसूल सकती है।
भाग – III
मेहर के प्रकार (Kinds of Dower)
मुस्लिम विधि में मेहर को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया गया है—
1. निश्चित मेहर (Specified Dower – Mahr-i-Musamma)
जब विवाह के समय मेहर की राशि स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दी जाती है, तो उसे निश्चित मेहर कहा जाता है।
(क) शीघ्र देय मेहर (Prompt Dower)
- विवाह के तुरंत बाद देय।
- पत्नी सहवास से पूर्व इसे मांग सकती है।
- भुगतान न होने पर पत्नी सहवास से इंकार कर सकती है।
(ख) विलंबित मेहर (Deferred Dower)
- तलाक या पति की मृत्यु पर देय।
- यह पत्नी की भविष्य सुरक्षा का साधन है।
2. उचित मेहर (Proper Dower – Mahr-i-Misl)
यदि विवाह के समय मेहर निर्धारित न किया गया हो, तो पत्नी अपनी सामाजिक स्थिति, परिवार की परंपरा और अन्य स्त्रियों के मेहर के आधार पर उचित मेहर की हकदार होती है।
भाग – IV
मेहर का विधिक प्रभाव
1. सहवास का अधिकार
यदि शीघ्र देय मेहर का भुगतान नहीं हुआ है, तो पत्नी को सहवास से इंकार करने का अधिकार है।
2. तलाक की स्थिति
यदि तलाक सहवास से पूर्व हुआ—
- पत्नी आधे मेहर की हकदार होगी।
यदि सहवास हो चुका है—
- पूर्ण मेहर देय होगा।
3. पति की मृत्यु
पति की मृत्यु पर—
- पत्नी मेहर को उसकी संपत्ति से वसूल सकती है।
- यह उत्तराधिकार से पूर्व देय ऋण के रूप में माना जाएगा।
4. उत्तराधिकार का प्रभाव
मेहर एक ऋण है।
पति की संपत्ति के वितरण से पहले उसका भुगतान किया जाएगा।
भाग – V
मेहर का महत्व (Importance of Dower)
मुस्लिम विवाह विधि में मेहर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है—
1. विवाह की वैधता का आधार
मेहर के बिना विवाह अधूरा माना जाता है।
2. पत्नी की आर्थिक सुरक्षा
विवाह विच्छेद या मृत्यु की स्थिति में मेहर पत्नी की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
3. पति की मनमानी पर नियंत्रण
उच्च मेहर पति को तलाक देने में सावधानी बरतने के लिए प्रेरित करता है।
4. स्त्री की गरिमा का संरक्षण
मेहर स्त्री की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
5. संविदात्मक संतुलन
चूँकि विवाह एक अनुबंध है, इसलिए मेहर उस अनुबंध में संतुलन स्थापित करता है।
6. सामाजिक न्याय
मेहर स्त्री को संपत्ति पर अधिकार देता है, जो ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण था।
भाग – VI
न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायालयों ने यह माना है कि—
- मेहर पत्नी का पूर्ण अधिकार है।
- यह पति पर ऋण के समान दायित्व है।
- पत्नी इसे सिविल वाद द्वारा वसूल सकती है।
भाग – VII
आलोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
- स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता
- विवाह संस्था में संतुलन
- सामाजिक सुरक्षा
आलोचना
- अत्यधिक मेहर केवल औपचारिक बन सकता है।
- कई बार भुगतान व्यावहारिक रूप से नहीं होता।
भाग – VIII
आधुनिक परिप्रेक्ष्य
आज के समय में—
- मेहर का महत्व बना हुआ है।
- न्यायालय इसे विधिक रूप से प्रवर्तनीय मानते हैं।
- यह मुस्लिम महिला के अधिकारों की रक्षा का साधन है।
निष्कर्ष
मेहर (Dower) मुस्लिम विवाह विधि की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है। यह केवल विवाह का औपचारिक अंग नहीं, बल्कि पत्नी का विधिक और आर्थिक अधिकार है।
इसका स्वरूप—
- संविदात्मक दायित्व
- पत्नी की पूर्ण संपत्ति
- पति पर ऋण
के रूप में स्थापित है।
मेहर विवाह की वैधता, पत्नी की आर्थिक सुरक्षा, स्त्री-गरिमा की रक्षा और सामाजिक संतुलन का साधन है।
इस प्रकार, मुस्लिम विवाह विधि में मेहर का स्थान केंद्रीय और अनिवार्य है, जो विवाह संस्था को न्यायसंगत और संतुलित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।