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मुस्लिम विधि में विवाह के निषेध (Prohibitions) के आधार : एक समग्र विश्लेषण

मुस्लिम विधि में विवाह के निषेध (Prohibitions) के आधार : एक समग्र विश्लेषण

प्रस्तावना

मुस्लिम विधि (Mohammedan Law) में विवाह (निकाह) को एक नागरिक संविदा (Civil Contract) माना गया है, जिसका उद्देश्य पारिवारिक जीवन की स्थापना, संतानों की वैधता और सामाजिक अनुशासन को सुनिश्चित करना है। यद्यपि इस्लाम विवाह को प्रोत्साहित करता है और उसे सामाजिक व धार्मिक दृष्टि से पुण्य कार्य मानता है, फिर भी कुछ विशिष्ट परिस्थितियों और संबंधों में विवाह को निषिद्ध (Prohibited) घोषित किया गया है।

इन निषेधों (Prohibitions) का आधार केवल धार्मिक आदेश नहीं है, बल्कि नैतिकता, सामाजिक संरचना, वंश की शुद्धता (legitimacy of lineage), स्त्री-पुरुष संबंधों की मर्यादा तथा पारिवारिक अनुशासन भी है।

मुस्लिम विधि में विवाह के निषेध मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किए जाते हैं—

  1. स्थायी निषेध (Absolute or Permanent Prohibitions)
  2. अस्थायी निषेध (Relative or Temporary Prohibitions)

नीचे इन दोनों के आधारों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।


भाग – I

स्थायी निषेध (Absolute Prohibitions)

स्थायी निषेध वे हैं जो सदा के लिए लागू होते हैं। ऐसे संबंधों में विवाह पूर्णतः शून्य (Void – Batil) माना जाता है और उसे किसी भी प्रकार से वैध नहीं बनाया जा सकता।


1. रक्त संबंध (Consanguinity)

अर्थ

रक्त संबंध (Nasab) वह संबंध है जो जन्म द्वारा उत्पन्न होता है। मुस्लिम विधि में कुछ निकट संबंधियों के बीच विवाह पूर्णतः निषिद्ध है।

निषिद्ध संबंध

एक पुरुष निम्न स्त्रियों से विवाह नहीं कर सकता—

  • उसकी माता और दादी (चाहे ऊपर की कितनी भी पीढ़ी हो)
  • उसकी पुत्री और पोती (नीचे की किसी भी पीढ़ी तक)
  • उसकी सगी, सौतेली या सहोदर बहन
  • उसकी भतीजी (भाई की पुत्री)
  • उसकी भांजी (बहन की पुत्री)
  • उसकी फूफी और मौसी

इसी प्रकार स्त्री भी उपर्युक्त संबंधों में पुरुष से विवाह नहीं कर सकती।

उद्देश्य

  • जैविक कारण (Genetic safety)
  • वंश की शुद्धता
  • सामाजिक मर्यादा

ऐसा विवाह शून्य (Batil) होता है और उससे उत्पन्न संतान अवैध मानी जाती है।


2. संबंध द्वारा निषेध (Affinity)

Affinity वह संबंध है जो विवाह के माध्यम से उत्पन्न होता है।

उदाहरण

  • पत्नी की माता (सास)
  • पत्नी की दादी
  • पुत्रवधू
  • सौतेली पुत्री (यदि पत्नी से सहवास हुआ हो)

ये संबंध भी स्थायी रूप से निषिद्ध हैं।

विशेष बिंदु

यदि किसी पुरुष ने अपनी पत्नी से सहवास नहीं किया हो, तो उसकी सौतेली पुत्री से विवाह संभव हो सकता है; परंतु सहवास के पश्चात यह सदा के लिए निषिद्ध हो जाता है।


3. दूध संबंध (Fosterage / Raza’at)

मुस्लिम विधि में दूध संबंध को रक्त संबंध के समान महत्व दिया गया है।

यदि किसी स्त्री ने किसी शिशु को स्तनपान कराया हो, तो वह उसका दूध-पुत्र माना जाएगा।

निषेध

  • दूध माँ से विवाह
  • दूध बहन से विवाह

यह निषेध भी स्थायी है।


भाग – II

अस्थायी निषेध (Relative or Temporary Prohibitions)

अस्थायी निषेध वे हैं जिनमें विवाह तत्काल अवैध या अनियमित (Fasid) माना जाता है, परंतु परिस्थितियाँ बदलने पर वैध हो सकता है।


1. इद्दत (Iddat)

इद्दत वह प्रतीक्षा अवधि है जिसे स्त्री को तलाक या पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह से पूर्व पालन करना होता है।

अवधि

  • तलाक के बाद – तीन मासिक चक्र
  • मृत्यु के बाद – चार माह दस दिन
  • गर्भवती होने पर – प्रसव तक

इद्दत अवधि में विवाह करना अनियमित (Fasid) माना जाता है।


2. बहुविवाह की सीमा

मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार पत्नियाँ रखने की अनुमति है।

यदि वह पाँचवीं स्त्री से विवाह करता है—

  • वह विवाह अनियमित होगा।
  • जैसे ही वह चार से कम पत्नियाँ रखेगा, विवाह वैध हो सकता है।

स्त्री को बहुपति (Polyandry) की अनुमति नहीं है।


3. दो बहनों से एक साथ विवाह

कोई पुरुष एक ही समय में दो सगी बहनों से विवाह नहीं कर सकता।
यदि ऐसा किया जाए, तो दूसरा विवाह अनियमित होगा।


4. धर्म के आधार पर निषेध

(क) मुस्लिम पुरुष

  • मुस्लिम पुरुष “किताबिया” (ईसाई या यहूदी) स्त्री से विवाह कर सकता है।
  • मूर्तिपूजक या बहुदेववादी स्त्री से विवाह नहीं कर सकता।

(ख) मुस्लिम स्त्री

  • केवल मुस्लिम पुरुष से विवाह कर सकती है।
  • गैर-मुस्लिम से विवाह शून्य होगा।

5. तलाक-ए-बैन के बाद पुनर्विवाह

यदि पति ने पत्नी को तीन तलाक दे दिया हो (तलाक-ए-बैन), तो पुनर्विवाह तभी संभव है जब—

  1. वह किसी अन्य पुरुष से विवाह करे
  2. सहवास हो
  3. वह विवाह समाप्त हो जाए

इसे सामान्यतः “हलाला” की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है।


6. गवाहों का अभाव (सुन्नी विधि)

सुन्नी विधि में विवाह के लिए दो गवाह आवश्यक हैं।
यदि गवाह उपस्थित न हों, तो विवाह अनियमित (Fasid) हो सकता है।


7. असमानता (Kafa)

कुछ मतों में सामाजिक समानता (कफ़ा) आवश्यक मानी गई है।
यदि पति सामाजिक दृष्टि से अनुपयुक्त हो, तो अभिभावक विवाह का विरोध कर सकता है।

हालाँकि आधुनिक न्यायालय इस सिद्धांत को सीमित महत्व देते हैं।


भाग – III

निषिद्ध विवाह का विधिक प्रभाव

मुस्लिम विधि विवाह को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करती है—

  1. सही (Sahih – वैध)
  2. फासिद (Fasid – अनियमित)
  3. बातिल (Batil – शून्य)

(1) बातिल विवाह

  • रक्त संबंध
  • दूध संबंध
  • मुस्लिम स्त्री का गैर-मुस्लिम से विवाह

ऐसा विवाह प्रारंभ से ही शून्य होता है।

(2) फासिद विवाह

  • पाँचवीं पत्नी से विवाह
  • इद्दत में विवाह
  • गवाहों का अभाव

परिस्थिति बदलने पर यह वैध हो सकता है।


भाग – IV

आधुनिक विधिक दृष्टिकोण

भारतीय विधि में—

  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 ने न्यूनतम आयु निर्धारित की है।
  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर-धार्मिक विवाह की अनुमति देता है।

अतः यदि विवाह विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत हो, तो धार्मिक निषेध लागू नहीं होंगे।


निष्कर्ष

मुस्लिम विधि में विवाह के निषेध विभिन्न आधारों पर स्थापित हैं—

  1. रक्त संबंध
  2. विवाह संबंध
  3. दूध संबंध
  4. धर्म
  5. बहुविवाह
  6. इद्दत
  7. सामाजिक समानता

इन निषेधों का उद्देश्य सामाजिक मर्यादा, नैतिकता, पारिवारिक अनुशासन और वंश की शुद्धता बनाए रखना है।

जहाँ स्थायी निषेधों का उल्लंघन विवाह को पूर्णतः शून्य बना देता है, वहीं अस्थायी निषेधों का उल्लंघन विवाह को केवल अनियमित बनाता है।

आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और विधायी सुधारों ने इन निषेधों के प्रभाव को कुछ हद तक परिवर्तित किया है, परंतु मूल धार्मिक सिद्धांत आज भी मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का महत्वपूर्ण अंग बने हुए हैं।

इस प्रकार, मुस्लिम विधि में विवाह के निषेध पारंपरिक धार्मिक शिक्षाओं और सामाजिक-नैतिक मूल्यों का समन्वित प्रतिबिंब प्रस्तुत करते हैं।