मोहम्मडन विधि के अंतर्गत विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध : एक विस्तृत अध्ययन
प्रस्तावना
मुस्लिम विधि (Mohammedan Law) में विवाह (निकाह) को एक नागरिक संविदा (Civil Contract) माना गया है, जिसका उद्देश्य केवल यौन-संबंधों को वैध बनाना नहीं, बल्कि परिवार संस्था की स्थापना, संतानोत्पत्ति की वैधता, तथा सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करना है। यद्यपि इस्लामी विधि विवाह को प्रोत्साहित करती है, फिर भी समाज की नैतिकता, वंश-शुद्धता (legitimacy of lineage), तथा सामाजिक संतुलन को बनाए रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंध (Restrictions) निर्धारित किए गए हैं।
ये प्रतिबंध मुख्यतः निम्न आधारों पर लगाए गए हैं—
- रक्त संबंध (Consanguinity)
- सगोत्र/संबंध (Affinity)
- दूध संबंध (Fosterage)
- धर्म के आधार पर प्रतिबंध
- विवाह की संख्या से संबंधित प्रतिबंध
- इद्दत की अवधि
- पूर्व वैवाहिक स्थिति से संबंधित प्रतिबंध
- साक्ष्य और सहमति से संबंधित प्रतिबंध
इन सभी प्रतिबंधों का उद्देश्य विवाह संस्था की पवित्रता, सामाजिक अनुशासन और पारिवारिक संरचना को सुरक्षित रखना है। नीचे इनका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है।
1. रक्त संबंध (Prohibited Degrees by Consanguinity)
मुस्लिम विधि में कुछ रक्त संबंधों के बीच विवाह पूर्णतः निषिद्ध (Absolutely Void) है। यह प्रतिबंध स्थायी (perpetual) है और किसी भी परिस्थिति में हटाया नहीं जा सकता।
(क) निषिद्ध संबंध
पुरुष निम्नलिखित स्त्रियों से विवाह नहीं कर सकता—
- अपनी माता या दादी
- अपनी पुत्री या पोती
- अपनी बहन (सगी, सौतेली या एक माता/पिता से)
- अपनी भतीजी (भाई की पुत्री)
- अपनी भांजी (बहन की पुत्री)
- अपनी फूफी और मौसी
इसी प्रकार स्त्री भी उपर्युक्त संबंधों में पुरुष से विवाह नहीं कर सकती।
यह प्रतिबंध प्राकृतिक न्याय और जैविक कारणों पर आधारित है, जिससे रक्त की शुद्धता (purity of lineage) और नैतिकता बनी रहे।
2. संबंध द्वारा प्रतिबंध (Prohibited by Affinity)
Affinity का अर्थ है विवाह द्वारा उत्पन्न संबंध। मुस्लिम विधि में कुछ ऐसे संबंध भी निषिद्ध हैं जो विवाह से उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण:
- पत्नी की माता (सास)
- पत्नी की दादी
- पुत्रवधू
- सौतेली पुत्री (यदि पत्नी से सहवास हुआ हो)
ये प्रतिबंध भी स्थायी हैं। इनका उद्देश्य परिवार में अनुशासन और नैतिक मर्यादा बनाए रखना है।
3. दूध संबंध (Prohibited by Fosterage)
मुस्लिम विधि में “रज़ाअत” (Raza’at) या दूध-सम्बंध का विशेष महत्व है। यदि किसी स्त्री ने किसी बालक को स्तनपान कराया हो, तो वह बालक उसका दूध-पुत्र (foster child) माना जाएगा।
नियम:
- दूध माँ (Foster Mother) से विवाह निषिद्ध है।
- दूध बहन से विवाह निषिद्ध है।
यह प्रतिबंध भी स्थायी है और इसे रक्त संबंध के समान ही माना जाता है।
4. धर्म के आधार पर प्रतिबंध
मुस्लिम विवाह में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है।
(क) मुस्लिम पुरुष
- मुस्लिम पुरुष “किताबिया” (People of the Book) अर्थात् ईसाई या यहूदी स्त्री से विवाह कर सकता है।
- वह मूर्ति-पूजक (Idolater) या बहुदेववादी स्त्री से विवाह नहीं कर सकता।
(ख) मुस्लिम स्त्री
- मुस्लिम स्त्री केवल मुस्लिम पुरुष से ही विवाह कर सकती है।
- यदि वह गैर-मुस्लिम से विवाह करती है, तो विवाह शून्य (Void) माना जाएगा।
यह प्रतिबंध धार्मिक पहचान और पारिवारिक आस्था की रक्षा के लिए लगाया गया है।
5. विवाह की संख्या से संबंधित प्रतिबंध (Polygamy)
मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार पत्नियाँ रखने की अनुमति है।
- यदि वह पाँचवीं स्त्री से विवाह करता है, तो वह विवाह अनियमित (Irregular – Fasid) माना जाएगा।
- जैसे ही वह चार से कम पत्नियाँ रखेगा, पाँचवीं पत्नी का विवाह वैध हो सकता है।
स्त्री को बहुपति प्रथा (Polyandry) की अनुमति नहीं है।
6. इद्दत (Iddat) से संबंधित प्रतिबंध
इद्दत वह अवधि है जिसे तलाक या पति की मृत्यु के बाद स्त्री को पुनर्विवाह से पूर्व प्रतीक्षा करनी होती है।
नियम:
- तलाक के बाद लगभग तीन मासिक चक्र।
- गर्भवती होने पर प्रसव तक।
- पति की मृत्यु पर चार माह दस दिन।
इद्दत अवधि में विवाह करना अवैध या अनियमित माना जाता है।
7. पूर्व वैवाहिक संबंध से संबंधित प्रतिबंध
(क) तलाक-ए-बैन (Irrevocable Divorce)
यदि पति ने पत्नी को तीन तलाक (तलाक-ए-बैन) दे दिया हो, तो पुनर्विवाह तभी संभव है जब—
- पत्नी किसी अन्य पुरुष से वैध विवाह करे,
- सहवास हो,
- और फिर तलाक या पति की मृत्यु हो।
इसे “हलाला” की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है।
(ख) एक साथ दो बहनों से विवाह
मुस्लिम पुरुष एक समय में दो सगी बहनों से विवाह नहीं कर सकता। यदि ऐसा करता है, तो दूसरा विवाह अनियमित होगा।
8. साक्ष्य (Witness) और सहमति
सुन्नी विधि में विवाह के लिए दो गवाहों की उपस्थिति आवश्यक है।
यदि गवाह न हों, तो विवाह अनियमित हो सकता है।
साथ ही, दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति (Free Consent) आवश्यक है।
यदि सहमति बल, धोखे या दबाव से प्राप्त की गई हो, तो विवाह चुनौती योग्य हो सकता है।
9. असमानता (Inequality) – कफ़ा (Kafa)
कुछ मतों में सामाजिक समानता (Kafa) का सिद्धांत लागू होता है।
यदि पति सामाजिक दृष्टि से अनुपयुक्त माना जाए, तो अभिभावक विवाह को चुनौती दे सकता है।
हालाँकि आधुनिक न्यायालय इस सिद्धांत को सीमित महत्व देते हैं।
10. निषिद्ध संबंधों का वर्गीकरण
मुस्लिम विधि विवाह को तीन श्रेणियों में विभाजित करती है—
- सही (Valid – Sahih)
- फासिद (Irregular – Fasid)
- बातिल (Void – Batil)
(क) बातिल विवाह
- निषिद्ध रक्त संबंध
- मुस्लिम स्त्री का गैर-मुस्लिम से विवाह
(ख) फासिद विवाह
- पाँचवीं पत्नी से विवाह
- इद्दत अवधि में विवाह
- गवाहों का अभाव (सुन्नी मत में)
11. आधुनिक विधिक परिप्रेक्ष्य
भारतीय संविधान और विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के अंतर्गत अंतर-धार्मिक विवाह की अनुमति है।
यदि कोई मुस्लिम विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह करता है, तो उपर्युक्त धार्मिक प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।
साथ ही, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 ने न्यूनतम आयु निर्धारित कर दी है—
- पुरुष : 21 वर्ष
- स्त्री : 18 वर्ष
इस प्रकार, व्यक्तिगत विधि पर विधायी नियंत्रण स्थापित किया गया है।
12. आलोचनात्मक विश्लेषण
(1) सकारात्मक पक्ष
- पारिवारिक मर्यादा की रक्षा
- वंश की शुद्धता सुनिश्चित करना
- सामाजिक अनुशासन बनाए रखना
(2) आलोचना
- धर्म आधारित प्रतिबंध समानता के सिद्धांत से टकरा सकते हैं।
- बहुविवाह की अनुमति लैंगिक समानता के विरुद्ध मानी जाती है।
निष्कर्ष
मोहम्मडन विधि विवाह को एक महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक संस्था मानती है। यद्यपि विवाह को प्रोत्साहित किया गया है, फिर भी सामाजिक संतुलन, नैतिकता और पारिवारिक संरचना की रक्षा हेतु अनेक प्रतिबंध लगाए गए हैं।
ये प्रतिबंध रक्त संबंध, विवाह संबंध, दूध संबंध, धर्म, बहुविवाह, इद्दत, तथा पूर्व वैवाहिक स्थिति जैसे विभिन्न आधारों पर आधारित हैं।
आधुनिक विधायिका और संवैधानिक मूल्यों ने इन प्रतिबंधों के प्रभाव को कुछ हद तक परिवर्तित किया है, विशेषकर बाल विवाह और अंतर-धार्मिक विवाह के संदर्भ में।
अतः यह कहा जा सकता है कि मोहम्मडन विधि में विवाह संबंधी प्रतिबंध पारंपरिक धार्मिक सिद्धांतों और आधुनिक विधिक सुधारों के संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।