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विकल्प-ए-बुलूग़’ (Option of Puberty) : प्रकृति, परिधि तथा विधायी संशोधनों का विश्लेषण

‘विकल्प-ए-बुलूग़’ (Option of Puberty) : प्रकृति, परिधि तथा विधायी संशोधनों का विश्लेषण

प्रस्तावना

मुस्लिम वैवाहिक विधि में विवाह (निकाह) को एक नागरिक संविदा (civil contract) माना गया है, जिसके लिए पक्षकारों की योग्यता, सहमति और मेहर जैसी शर्तें आवश्यक हैं। पारंपरिक मुस्लिम विधि में अभिभावक (वली) को यह अधिकार प्राप्त था कि वह नाबालिग बालक या बालिका का विवाह संपन्न करा सके। इसी व्यवस्था के भीतर एक महत्त्वपूर्ण संरक्षणात्मक सिद्धांत विकसित हुआ—‘विकल्प-ए-बुलूग़’ (Khyar-ul-Bulugh / Option of Puberty)। इसका आशय यह है कि यदि किसी नाबालिग का विवाह उसके अभिभावक द्वारा उसकी बाल्यावस्था में कर दिया गया हो, तो वह बालिग (puberty) प्राप्त करने पर उस विवाह को स्वीकार (ratify) या अस्वीकार (repudiate) करने का विकल्प रखता/रखती है, कुछ शर्तों के अधीन।

यह सिद्धांत विशेषकर स्त्री-सुरक्षा के दृष्टिकोण से विकसित हुआ, ताकि बाल्यावस्था में संपन्न विवाह से उत्पन्न असमानताओं को बालिग होने पर सुधारा जा सके। समय के साथ भारतीय विधायिका ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए, जिनसे ‘विकल्प-ए-बुलूग़’ की पारंपरिक सीमाएँ और प्रभाव दोनों परिवर्तित हुए। निम्नलिखित विवेचन में इसकी प्रकृति, परिधि, शर्तें, प्रभाव तथा विधायी संशोधनों का विश्लेषण किया जा रहा है।


1. अवधारणा और वैधानिक पृष्ठभूमि

(क) अर्थ

‘विकल्प-ए-बुलूग़’ का शाब्दिक अर्थ है—बालिग होने पर विकल्प। विधिक अर्थ में यह वह अधिकार है जिसके द्वारा बाल्यावस्था में अभिभावक द्वारा कराए गए विवाह को बालिग होने पर पक्षकार अस्वीकार कर सकता/सकती है।

(ख) ऐतिहासिक स्रोत

मुस्लिम फिक़्ह (Islamic jurisprudence) में यह सिद्धांत विशेषतः हनाफ़ी मत में विकसित हुआ। अन्य मतों में इसके दायरे और शर्तों में भिन्नताएँ मिलती हैं। इसका उद्देश्य यह संतुलन बनाना था कि एक ओर परिवारिक/सामाजिक संरचना के अंतर्गत अभिभावक की भूमिका बनी रहे, दूसरी ओर बालिग होने पर व्यक्तिगत स्वायत्तता भी सुरक्षित रहे।


2. ‘विकल्प-ए-बुलूग़’ की प्रकृति (Nature)

  1. संविदात्मक अधिकार – चूँकि निकाह एक अनुबंध है, अतः उसमें सहमति का तत्व मूलभूत है। बाल्यावस्था में दी गई सहमति वास्तविक/स्वायत्त नहीं मानी जाती; इसलिए बालिग होने पर पुनः सहमति या असहमति का अवसर दिया गया।
  2. संरक्षणात्मक सिद्धांत – यह विशेषकर नाबालिग लड़की के हित की रक्षा के लिए है, क्योंकि पारंपरिक समाज में उसके विवाह का निर्णय प्रायः वली करता था।
  3. सशर्त और सीमित अधिकार – यह निरपेक्ष (absolute) नहीं है; इसके प्रयोग पर समय-सीमा, सहवास (consummation) तथा अभिभावक की प्रकृति जैसी शर्तें लागू होती हैं।
  4. व्यक्तिगत विधि का अंग – यह सामान्य अनुबंध कानून का नहीं, बल्कि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (Personal Law) का विशेष सिद्धांत है।

3. परिधि (Scope) और लागू होने की शर्तें

(1) विवाह नाबालिग अवस्था में हुआ हो

यदि विवाह उस समय हुआ जब लड़की/लड़का बालिग नहीं था, तभी यह विकल्प उपलब्ध होगा।

(2) विवाह अभिभावक द्वारा कराया गया हो

पारंपरिक विधि में पिता या पितामह (paternal grandfather) द्वारा कराए गए विवाह को विशेष महत्व दिया गया। हनाफी मत में यदि विवाह पिता या पितामह ने किया हो, तो विकल्प-ए-बुलूग़ सामान्यतः उपलब्ध नहीं; परंतु यदि किसी अन्य वली (जैसे भाई, चाचा आदि) ने किया हो, तो बालिग होने पर अस्वीकार किया जा सकता है।

(3) सहवास न हुआ हो (कुछ मतों में)

यदि विवाह के बाद सहवास हो चुका है, तो कई न्यायिक व्याख्याओं में विकल्प सीमित या समाप्त माना गया है; यद्यपि यह मतान्तरित है और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

(4) समय-सीमा के भीतर प्रयोग

बालिग होने के तुरंत बाद या युक्तियुक्त समय के भीतर विकल्प का प्रयोग करना आवश्यक है। अनावश्यक विलंब को ‘अनुमोदन’ (implied ratification) माना जा सकता है।


4. विकल्प के प्रयोग का तरीका

  1. स्पष्ट अस्वीकृति (Express repudiation) – कथन या विधिक कार्यवाही द्वारा।
  2. आचरण से अस्वीकृति (Implied conduct) – पति के साथ रहने से इनकार, न्यायालय में वाद दायर करना।
  3. न्यायिक डिक्री – भारत में व्यवहारतः न्यायालय की डिक्री द्वारा विवाह विच्छेद (dissolution) सुनिश्चित किया जाता है।

5. प्रभाव (Legal Consequences)

  • विवाह को अस्वीकार करने पर वह भंग (voidable marriage annulled) हो जाता है।
  • इद्दत (Iddat) का पालन आवश्यक हो सकता है।
  • मेहर (Dower) के अधिकार पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सहवास हुआ या नहीं।
  • संतान की वैधता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, यदि विवाह वैध था।

6. भारतीय विधायिका द्वारा संशोधन

समय के साथ सामाजिक-न्याय के उद्देश्यों और बाल-विवाह उन्मूलन की नीति के कारण ‘विकल्प-ए-बुलूग़’ की पारंपरिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

(क) बाल विवाह निरोधक कानून

1. बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929

इस अधिनियम ने बाल विवाह को दंडनीय बनाया, परंतु ऐसे विवाहों को स्वतः शून्य (void) नहीं ठहराया। इससे विकल्प-ए-बुलूग़ का महत्व बना रहा, क्योंकि विवाह वैध तो था, पर दंडनीय।

2. बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act, 2006)

इस कानून ने स्थिति को अधिक सुदृढ़ किया—

  • बाल विवाह को रद्दयोग्य (voidable at the option of contracting party) घोषित किया।
  • पीड़ित पक्ष को बालिग होने के दो वर्ष के भीतर विवाह निरस्त कराने का अधिकार दिया।
  • कुछ परिस्थितियों (जैसे अपहरण, बलपूर्वक विवाह) में विवाह को शून्य (void) माना गया।

इस प्रकार, 2006 का अधिनियम वस्तुतः ‘विकल्प-ए-बुलूग़’ की अवधारणा को सर्वधर्मीय (religion-neutral) आधार पर विस्तारित करता है। अब यह केवल मुस्लिम विधि तक सीमित नहीं, बल्कि सभी समुदायों पर लागू है।


(ख) मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939

Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 की धारा 2(vii) ने स्पष्ट प्रावधान किया कि—
यदि किसी लड़की का विवाह उसके पिता या अन्य अभिभावक द्वारा उसकी 15 वर्ष की आयु से पहले कर दिया गया हो, तो वह 18 वर्ष की आयु से पहले (और बशर्ते सहवास न हुआ हो) विवाह को अस्वीकार कर सकती है।

यह प्रावधान ‘विकल्प-ए-बुलूग़’ का विधिक संहिताकरण (statutory recognition) है। इससे पहले यह केवल पारंपरिक फिक़्ह का सिद्धांत था।


7. वर्तमान विधिक स्थिति

  1. मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत विकल्प-ए-बुलूग़ अब भी मान्य है।
  2. 1939 का अधिनियम इसे विधिक आधार देता है।
  3. 2006 का अधिनियम इसे व्यापक, धर्मनिरपेक्ष संरक्षण प्रदान करता है।
  4. बाल विवाह अब सामाजिक-न्याय की दृष्टि से निरुत्साहित और दंडनीय है।

अतः आज विकल्प-ए-बुलूग़ का प्रयोग व्यक्तिगत विधि और सामान्य वैधानिक कानून—दोनों के संयुक्त प्रभाव में होता है।


8. न्यायिक दृष्टिकोण

भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि—

  • विकल्प का प्रयोग समयबद्ध होना चाहिए।
  • सहवास का तथ्य निर्णायक हो सकता है।
  • बालिका की स्वतंत्र इच्छा सर्वोपरि है।

न्यायालयों ने बाल-विवाह के मामलों में बालिका के हित (best interest of child) को प्राथमिकता दी है।


9. आलोचनात्मक विश्लेषण

(1) पारंपरिक सीमाएँ

  • पिता/पितामह द्वारा कराए गए विवाह पर विकल्प का अभाव स्त्री-स्वायत्तता के विरुद्ध माना गया।
  • सहवास की शर्त व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करती थी।

(2) विधायी सुधार

  • 1939 और 2006 के कानूनों ने स्त्री-अधिकार को सुदृढ़ किया।
  • धर्मनिरपेक्ष कानून ने व्यक्तिगत विधि की सीमाओं को संतुलित किया।

(3) वर्तमान चुनौतियाँ

  • ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी।
  • सामाजिक दबाव के कारण विकल्प का प्रयोग न कर पाना।

10. निष्कर्ष

‘विकल्प-ए-बुलूग़’ मुस्लिम वैवाहिक विधि का एक महत्त्वपूर्ण संरक्षणात्मक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य बाल्यावस्था में संपन्न विवाह से उत्पन्न संभावित अन्याय को बालिग होने पर सुधारने का अवसर देना है। इसकी प्रकृति संविदात्मक, संरक्षणात्मक और सशर्त है। इसकी परिधि अभिभावक द्वारा कराए गए बाल-विवाह तक सीमित है, और इसका प्रयोग समय-सीमा तथा सहवास जैसी शर्तों पर निर्भर करता है।

भारतीय विधायिका ने—विशेषतः Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 और Prohibition of Child Marriage Act, 2006—के माध्यम से इसकी पारंपरिक सीमाओं को परिवर्तित और विस्तारित किया है। आज यह सिद्धांत केवल धार्मिक नियम न रहकर व्यापक बाल-अधिकार संरक्षण का अंग बन चुका है।

इस प्रकार, विकल्प-ए-बुलूग़ की अवधारणा परंपरा और आधुनिक विधिक सुधारों के संगम का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ व्यक्तिगत विधि और सामाजिक-न्याय की संवैधानिक दृष्टि का संतुलन दिखाई देता है।