IndianLawNotes.com

मुता़ विवाह (Muta Marriage) : अर्थ, स्वरूप, घटनाएँ (Incidents) तथा निकाह से अंतर

मुता़ विवाह (Muta Marriage) : अर्थ, स्वरूप, घटनाएँ (Incidents) तथा निकाह से अंतर

प्रस्तावना

मुस्लिम विधि (Muslim Law) में विवाह (Marriage) को सामान्यतः एक नागरिक संविदा (Civil Contract) माना जाता है। सुन्नी और शिया—दोनों संप्रदायों में विवाह की मूल अवधारणा समान है, किंतु कुछ विशेष प्रकार के विवाह केवल एक संप्रदाय में मान्य हैं। मुता़ विवाह (Muta Marriage) ऐसा ही एक विवाह है, जो मुख्यतः इथना-अशरी (Twelver) शिया संप्रदाय में मान्य है, जबकि सुन्नी विधि में इसे अवैध या अस्वीकार्य माना जाता है।

मुता़ विवाह की अवधारणा ऐतिहासिक, धार्मिक तथा विधिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह एक निश्चित अवधि के लिए किया गया विवाह है, जिसमें अवधि और मेहर (Dower) का निर्धारण अनिवार्य होता है। इस प्रश्न के उत्तर में हम मुता़ विवाह का अर्थ, इसकी आवश्यक शर्तें, घटनाएँ (Incidents), तथा निकाह (स्थायी विवाह) से इसका अंतर विस्तार से समझेंगे।


1. मुता़ विवाह का अर्थ (Meaning of Muta Marriage)

‘मुता़’ शब्द अरबी भाषा के शब्द “मुतअ” से बना है, जिसका अर्थ है — आनंद या लाभ उठाना। मुस्लिम विधि में मुता़ विवाह का अर्थ है — एक पुरुष और स्त्री के बीच एक निश्चित अवधि (fixed period) के लिए किया गया विवाह, जिसमें मेहर का निर्धारण किया जाता है।

यह विवाह अस्थायी (Temporary) होता है और पूर्व निर्धारित समय की समाप्ति पर स्वतः समाप्त हो जाता है, बिना तलाक की आवश्यकता के।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मुता़ विवाह की उत्पत्ति इस्लाम के प्रारंभिक काल में हुई। कहा जाता है कि युद्ध या लंबी यात्राओं के दौरान सैनिकों की सामाजिक और नैतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के विवाह की अनुमति दी गई थी।

बाद में सुन्नी मत में इसे निरस्त (abrogated) मान लिया गया, जबकि शिया संप्रदाय ने इसे वैध माना और आज भी मान्यता देता है।


2. मुता़ विवाह की आवश्यक शर्तें (Essential Conditions)

मुता़ विवाह की वैधता के लिए निम्न शर्तें आवश्यक हैं—

  1. पक्षकारों की योग्यता (Capacity of Parties)
    • दोनों पक्ष मुस्लिम हों (कम से कम पुरुष मुस्लिम होना चाहिए)।
    • वे बालिग (Major) और समझदार (Sane) हों।
    • शिया संप्रदाय में यह मान्य है।
  2. निश्चित अवधि (Fixed Period)
    • विवाह की अवधि निश्चित रूप से तय होनी चाहिए (जैसे—1 माह, 1 वर्ष, 5 वर्ष)।
    • यदि अवधि निर्धारित नहीं की गई, तो विवाह निकाह (स्थायी विवाह) में परिवर्तित हो सकता है।
  3. मेहर (Dower) का निर्धारण
    • मेहर का निर्धारण अनिवार्य है।
    • यदि मेहर निर्धारित नहीं किया गया, तो विवाह शून्य (Void) माना जाएगा।
  4. प्रस्ताव और स्वीकृति (Ijab and Qubul)
    • अन्य मुस्लिम विवाहों की तरह प्रस्ताव (Offer) और स्वीकृति (Acceptance) आवश्यक है।

3. मुता़ विवाह की घटनाएँ (Incidents of Muta Marriage)

मुता़ विवाह से उत्पन्न विधिक परिणामों को उसकी “घटनाएँ” कहा जाता है। ये निम्नलिखित हैं—

(1) अवधि का निश्चित होना

मुता़ विवाह का मूल तत्व उसकी अस्थायी प्रकृति है। यह विवाह केवल निर्धारित समय तक ही मान्य रहता है। अवधि समाप्त होने पर विवाह स्वतः समाप्त हो जाता है।

(2) तलाक की आवश्यकता नहीं

मुता़ विवाह में तलाक की कोई आवश्यकता नहीं होती। समय समाप्त होने पर संबंध स्वतः समाप्त हो जाता है।

(3) मेहर का अधिकार

पत्नी को निर्धारित मेहर पाने का पूर्ण अधिकार है।

  • यदि पति ने सहवास (consummation) किया है, तो पूरा मेहर देय होगा।
  • यदि सहवास नहीं हुआ, तो आधा मेहर देय होगा।

(4) उत्तराधिकार का अधिकार नहीं

मुता़ पत्नी को पति की संपत्ति में उत्तराधिकार (Inheritance) का अधिकार नहीं होता।
इसी प्रकार पति को भी पत्नी की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार नहीं होता, जब तक कि अनुबंध में विशेष प्रावधान न हो।

(5) संतान की वैधता

मुता़ विवाह से उत्पन्न संतान पूर्णतः वैध (Legitimate) मानी जाती है।
उसे पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त होता है।

(6) भरण-पोषण (Maintenance)

मुता़ पत्नी को सामान्यतः भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार नहीं होता, जब तक कि अनुबंध में विशेष रूप से प्रावधान न किया गया हो।

(7) इद्दत (Iddat)

अवधि समाप्त होने पर पत्नी को इद्दत का पालन करना होता है।
यदि सहवास हुआ हो, तो इद्दत की अवधि लगभग दो मासिक चक्र (Two menstrual courses) होती है।

(8) पति का अधिकार

पति को विवाह की अवधि समाप्त होने से पूर्व पत्नी को अलग करने का अधिकार है, किंतु उसे शेष अवधि का मेहर देना होगा।

(9) बहुविवाह की स्थिति

शिया पुरुष एक साथ कई मुता़ विवाह कर सकता है, क्योंकि यह स्थायी विवाह की संख्या में नहीं गिना जाता।


4. निकाह (स्थायी विवाह) से अंतर

अब हम मुता़ विवाह और निकाह के बीच अंतर को विभिन्न आधारों पर समझेंगे—

आधार मुता़ विवाह निकाह
स्वरूप अस्थायी (Temporary) स्थायी (Permanent)
मान्यता केवल शिया संप्रदाय में मान्य सुन्नी और शिया दोनों में मान्य
अवधि निश्चित अवधि के लिए अनिश्चित (स्थायी)
मेहर अनिवार्य, अन्यथा शून्य मेहर अनिवार्य, परंतु निर्धारण बाद में भी संभव
तलाक आवश्यक नहीं तलाक द्वारा विच्छेद
उत्तराधिकार पति-पत्नी को अधिकार नहीं दोनों को उत्तराधिकार का अधिकार
भरण-पोषण सामान्यतः नहीं पत्नी को अधिकार
संतान वैध वैध
गवाह (Witness) आवश्यक नहीं (शिया मत में) दो गवाह आवश्यक

विश्लेषणात्मक दृष्टि से अंतर

  1. संविदात्मक प्रकृति
    निकाह एक स्थायी सामाजिक संस्था है, जबकि मुता़ विवाह अधिक संविदात्मक और सीमित अवधि का समझौता है।
  2. सामाजिक स्वीकृति
    निकाह को व्यापक सामाजिक और धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है।
    मुता़ विवाह को कई समाजों में संदेह या आलोचना की दृष्टि से देखा जाता है।
  3. विधिक स्थायित्व
    निकाह में पति-पत्नी के अधिकार और कर्तव्य दीर्घकालिक होते हैं।
    मुता़ विवाह में ये अधिकार सीमित और अस्थायी होते हैं।

5. न्यायिक दृष्टिकोण (Judicial View)

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः यह माना है कि मुता़ विवाह केवल शिया संप्रदाय में मान्य है।
यदि कोई पक्षकार सुन्नी है, तो वह मुता़ विवाह का दावा नहीं कर सकता।

न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे विवाह से उत्पन्न संतान वैध होगी और उसे उत्तराधिकार का अधिकार मिलेगा।


6. सामाजिक और विधिक मूल्यांकन

मुता़ विवाह को लेकर विभिन्न मत हैं—

समर्थन में तर्क

  • यह विवाह सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत संबंध स्थापित करने की अनुमति देता है।
  • इससे अवैध संबंधों की संभावना कम होती है।

विरोध में तर्क

  • इसे अस्थायी संबंध मानकर कई विद्वान इसे विवाह संस्था की गरिमा के विपरीत मानते हैं।
  • इसमें पत्नी के अधिकार सीमित होते हैं।

7. निष्कर्ष

मुता़ विवाह मुस्लिम विधि की एक विशिष्ट और विवादास्पद अवधारणा है। यह एक अस्थायी विवाह है, जिसमें अवधि और मेहर का निर्धारण अनिवार्य है। इसकी घटनाओं में अवधि की निश्चितता, मेहर का अधिकार, संतान की वैधता, उत्तराधिकार के अधिकार का अभाव, तथा इद्दत का पालन शामिल हैं।

निकाह से इसका प्रमुख अंतर इसकी अस्थायी प्रकृति और उत्तराधिकार व भरण-पोषण के अधिकारों की सीमितता है। जहाँ निकाह एक स्थायी पारिवारिक संस्था है, वहीं मुता़ विवाह एक सीमित अवधि का संविदात्मक संबंध है।

विधिक दृष्टि से यह शिया संप्रदाय में मान्य है और उससे उत्पन्न संतान को पूर्ण वैधता प्राप्त है।

इस प्रकार, मुता़ विवाह और निकाह के बीच अंतर को समझना मुस्लिम पारिवारिक विधि के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर परीक्षा और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए।