Captain Pramod Kumar Bajaj v. Union of India & Anr.: प्रशासनिक टालमटोल, न्यायिक हस्तक्षेप और अधिकरणों की स्वतंत्रता पर एक ऐतिहासिक निर्णय
प्रस्तावना
भारतीय प्रशासनिक और संवैधानिक न्यायशास्त्र में ऐसे अवसर कम ही आते हैं जब सर्वोच्च न्यायालय को कार्यपालिका की निष्क्रियता पर कठोर शब्दों में टिप्पणी करनी पड़े। Captain Pramod Kumar Bajaj v. Union of India & Anr. ऐसा ही एक प्रकरण है, जिसमें Supreme Court of India ने केंद्र सरकार के विरुद्ध ₹5 लाख की लागत (costs) आरोपित करते हुए उसके आचरण को “rank procrastination” तथा “deliberate obstruction” बताया।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह अधिकरणों की संस्थागत स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक शासन के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ था।
1. तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
कैप्टन प्रमोद कुमार बजाज भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके थे। वर्ष 2014 में उन्हें आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) में Member (Accountant) पद हेतु चयन समिति द्वारा अनुशंसित किया गया।
Income Tax Appellate Tribunal भारत का एक प्रमुख अर्ध-न्यायिक निकाय है, जो आयकर से संबंधित अपीलों का निस्तारण करता है।
चयन प्रक्रिया विधिवत पूरी होने और अनुशंसा किए जाने के बावजूद, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया गया। यह स्थिति वर्षों तक बनी रही। न तो नियुक्ति दी गई और न ही कोई स्पष्ट कारण बताया गया।
अंततः याचिकाकर्ता को न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी।
2. विवाद का मूल प्रश्न
इस प्रकरण में न्यायालय के समक्ष निम्न प्रश्न थे—
- क्या चयन समिति की अनुशंसा के बाद सरकार नियुक्ति को अनिश्चितकाल तक लंबित रख सकती है?
- क्या इस प्रकार की देरी प्रशासनिक विवेक (executive discretion) के दायरे में आती है?
- क्या यह आचरण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है?
3. सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
Supreme Court of India ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
- चयन की अनुशंसा 2014 में हो चुकी थी।
- नियुक्ति न करने के लिए कोई ठोस, लिखित या विधिसम्मत कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
- सरकार का आचरण अनावश्यक विलंब और जानबूझकर अवरोध की श्रेणी में आता है।
न्यायालय ने कहा कि यह “rank procrastination” है—अर्थात स्पष्ट और अनुचित टालमटोल।
4. ₹5 लाख की लागत क्यों?
न्यायालय द्वारा लागत आरोपित करना एक असाधारण कदम था। सामान्यतः न्यायालय सरकार पर इतनी बड़ी राशि की लागत नहीं लगाते, जब तक कि—
- गंभीर लापरवाही
- न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना
- या जानबूझकर देरी
सिद्ध न हो जाए।
यहाँ न्यायालय ने पाया कि वर्षों तक नियुक्ति रोके रखना न केवल व्यक्ति विशेष के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संस्थागत कार्यप्रणाली को भी बाधित करता है।
इसलिए ₹5 लाख की लागत एक दंडात्मक और निवारक दोनों प्रकार का उपाय था।
5. संवैधानिक सिद्धांतों का विश्लेषण
(1) अनुच्छेद 14 – मनमानी का निषेध
संविधान का अनुच्छेद 14 राज्य को मनमानी से रोकता है।
यदि सरकार बिना कारण किसी चयनित व्यक्ति की नियुक्ति रोकती है, तो यह समानता और विधिसम्मत प्रक्रिया के सिद्धांत का उल्लंघन है।
(2) शक्तियों का पृथक्करण
अधिकरणों की नियुक्तियाँ न्यायिक कार्य से संबंधित हैं।
यदि कार्यपालिका नियुक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप या देरी करती है, तो यह न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
(3) वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation)
जब चयन समिति ने विधिवत अनुशंसा कर दी, तो याचिकाकर्ता को नियुक्ति की वैध अपेक्षा उत्पन्न हुई।
इस अपेक्षा की उपेक्षा करना अनुचित था।
6. ITAT की भूमिका और महत्व
Income Tax Appellate Tribunal कर न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
- यह आयकर अधिनियम के अंतर्गत अंतिम तथ्यात्मक अपीलीय मंच है।
- इसके निर्णयों का व्यापक वित्तीय प्रभाव पड़ता है।
- इसकी निष्पक्षता करदाताओं और सरकार दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि नियुक्तियों में देरी होगी, तो लंबित मामलों का बोझ बढ़ेगा और न्याय वितरण प्रणाली प्रभावित होगी।
7. प्रशासनिक विवेक की सीमा
सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया में कुछ हद तक विवेक प्राप्त होता है।
किन्तु यह विवेक—
- निरंकुश नहीं है
- पारदर्शिता और कारण-सिद्धता (reasoned decision) से बंधा हुआ है
- न्यायिक समीक्षा के अधीन है
इस मामले में सरकार उचित कारण प्रस्तुत करने में असफल रही।
8. न्यायालय का संस्थागत संदेश
Supreme Court of India ने स्पष्ट संकेत दिया कि—
- अधिकरणों की नियुक्तियाँ राजनीतिक या प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं हो सकतीं।
- चयन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद अनिश्चित देरी अस्वीकार्य है।
- न्यायालय आवश्यक होने पर आर्थिक दंड भी लगा सकता है।
9. व्यापक प्रभाव
(क) भविष्य की नियुक्तियाँ
यह निर्णय सरकार को चेतावनी देता है कि चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति में अनावश्यक देरी न की जाए।
(ख) न्यायिक सक्रियता
यह मामला न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जहाँ न्यायालय ने संस्थागत निष्पक्षता की रक्षा की।
(ग) प्रशासनिक उत्तरदायित्व
सरकार को अब नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शी और समयबद्ध रहना होगा।
10. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचकों का तर्क हो सकता है कि—
- चयन अनुशंसा अंतिम नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं देती।
- सरकार को पृष्ठभूमि जांच और नीति संबंधी विचार का अधिकार है।
किन्तु न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि ऐसा कोई कारण हो, तो उसे स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर लाना चाहिए।
अनिश्चित और अस्पष्ट देरी स्वीकार्य नहीं है।
11. विधिक महत्व
यह निर्णय प्रशासनिक कानून में निम्न सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है—
- Rule of Law
- Non-Arbitrariness
- Judicial Review of Executive Action
यह बताता है कि राज्य की निष्क्रियता भी कभी-कभी मनमानी के समान प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
12. निष्कर्ष
Captain Pramod Kumar Bajaj v. Union of India & Anr. भारतीय न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय है।
Supreme Court of India ने यह स्पष्ट कर दिया कि—
- चयनित उम्मीदवार को वर्षों तक प्रतीक्षा में रखना असंवैधानिक है।
- प्रशासनिक टालमटोल न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा सर्वोपरि है।
- आवश्यक होने पर न्यायालय आर्थिक दंड भी लगा सकता है।
यह निर्णय अधिकरणों की स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक शासन के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि यह निर्णय केवल एक नियुक्ति विवाद का निस्तारण नहीं था, बल्कि यह राज्य की उत्तरदायित्वपूर्ण शासन प्रणाली की पुनर्पुष्टि थी—जहाँ न्यायालय अंतिम संरक्षक के रूप में कार्य करता है।