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हिंदू विवाह-विच्छेद (Divorce) के विभिन्न आधार एवं आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया

हिंदू विवाह-विच्छेद (Divorce) के विभिन्न आधार एवं आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया: एक समालोचनात्मक अध्ययन


भूमिका (Introduction)

हिंदू विधि में विवाह को प्राचीन काल से एक पवित्र संस्कार माना गया है। यह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं बल्कि एक सामाजिक एवं धार्मिक संस्था है, जिसका उद्देश्य परिवार की स्थापना, संतानोत्पत्ति और सामाजिक स्थिरता बनाए रखना है। परंपरागत हिंदू समाज में विवाह को अविच्छेद्य बंधन माना जाता था, अर्थात पति और पत्नी का संबंध जीवनभर के लिए होता था तथा तलाक की कोई अवधारणा नहीं थी।

किन्तु समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ बदलीं। स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को महत्व मिला तथा विवाह को केवल धार्मिक संस्कार न मानकर एक विधिक संस्था के रूप में भी देखा जाने लगा। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप हिंदू विधि में विवाह-विच्छेद (Divorce) की अवधारणा विकसित हुई।

स्वतंत्रता के पश्चात् पारित हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने पहली बार हिंदुओं को विधिक रूप से तलाक का अधिकार प्रदान किया। इस अधिनियम का उद्देश्य विवाह संस्था की पवित्रता को बनाए रखते हुए उन परिस्थितियों में विवाह समाप्त करने की अनुमति देना है, जहाँ वैवाहिक जीवन असहनीय हो चुका हो।


विवाह-विच्छेद की अवधारणा

विवाह-विच्छेद से तात्पर्य न्यायालय के आदेश द्वारा विवाह संबंध का विधिक रूप से समाप्त होना है। तलाक का उद्देश्य पति-पत्नी को ऐसे बंधन से मुक्त करना है, जो उनके लिए शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक कष्ट का कारण बन चुका हो।

आधुनिक हिंदू विधि में तलाक को दंडात्मक उपाय नहीं बल्कि राहत (relief) के रूप में देखा जाता है।


हिंदू विवाह-विच्छेद के आधार (Grounds of Divorce)

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 एवं 13-B में तलाक के आधार दिए गए हैं। इन्हें सामान्यतः दोष-आधारित आधार (fault grounds) और आपसी सहमति से तलाक में विभाजित किया जा सकता है।


1. व्यभिचार (Adultery)

यदि पति या पत्नी विवाह के बाद किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से यौन संबंध स्थापित करता/करती है, तो दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।

व्यभिचार विवाह के विश्वास और निष्ठा के मूल सिद्धांत का उल्लंघन है।

महत्व:

  • विवाह संस्था की पवित्रता की रक्षा
  • पीड़ित पक्ष को न्याय प्रदान करना

2. क्रूरता (Cruelty)

यदि पति या पत्नी दूसरे के साथ ऐसा व्यवहार करता/करती है जिससे उसके जीवन, स्वास्थ्य या मानसिक शांति को गंभीर क्षति पहुँचे, तो इसे क्रूरता माना जाता है।

क्रूरता दो प्रकार की हो सकती है—

  • शारीरिक क्रूरता
  • मानसिक क्रूरता

मानसिक क्रूरता में अपमान, धमकी, झूठे आरोप, निरंतर तिरस्कार आदि शामिल हैं।


3. परित्याग (Desertion)

यदि पति या पत्नी बिना उचित कारण के कम से कम दो वर्ष तक दूसरे को त्याग देता/देती है, तो यह तलाक का आधार बनता है।

परित्याग के दो तत्व—

  • वास्तविक अलगाव
  • अलग होने की मंशा

4. धर्म परिवर्तन (Conversion)

यदि पति या पत्नी हिंदू धर्म त्यागकर किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लेता/लेती है, तो दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।

इस आधार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विवाह धार्मिक असंगति के कारण बाधित न हो।


5. मानसिक विकार (Unsoundness of Mind)

यदि पति या पत्नी लाइलाज मानसिक रोग से पीड़ित हो जाए, जिससे साथ रहना असंभव हो, तो तलाक दिया जा सकता है।


6. कुष्ठ रोग (Leprosy)

यदि पति या पत्नी घोर एवं असाध्य कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो, तो यह तलाक का आधार है।


7. संक्रामक यौन रोग (Venereal Disease)

यदि पति या पत्नी गंभीर यौन रोग से पीड़ित हो, तो दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।


8. संन्यास ग्रहण करना (Renunciation)

यदि पति या पत्नी संसार त्यागकर संन्यास ग्रहण कर ले, तो विवाह-विच्छेद का आधार उत्पन्न होता है।


9. सात वर्ष तक जीवित न होने की धारणा (Presumption of Death)

यदि पति या पत्नी सात वर्षों तक जीवित न देखा गया हो, तो तलाक का आधार बनता है।


10. पत्नी को विशेष आधार

पत्नी निम्न आधारों पर तलाक ले सकती है—

  • पति द्वारा बहुविवाह
  • बलात्कार, कुकर्म या पशुता
  • विवाह से पूर्व किए गए भरण-पोषण आदेश की अवहेलना

तलाक के आधारों का उद्देश्य

इन आधारों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि—

  • कोई भी पक्ष अत्याचारपूर्ण संबंध में न फँसा रहे
  • विवाह संस्था का दुरुपयोग न हो
  • सामाजिक न्याय की स्थापना हो

आपसी सहमति से तलाक (Divorce by Mutual Consent)

आपसी सहमति से तलाक आधुनिक हिंदू विधि का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जिसे धारा 13-B के अंतर्गत मान्यता दी गई है।


आपसी सहमति से तलाक की अवधारणा

जब पति और पत्नी दोनों यह स्वीकार कर लेते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते और वे स्वेच्छा से विवाह समाप्त करना चाहते हैं, तो वे आपसी सहमति से तलाक की याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।


आपसी सहमति से तलाक की आवश्यक शर्तें

  1. पति-पत्नी कम से कम एक वर्ष से अलग रह रहे हों
  2. वे साथ रहने में असमर्थ हों
  3. दोनों तलाक के लिए सहमत हों

आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया

पहला चरण (First Motion)

पति-पत्नी संयुक्त रूप से न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करते हैं।

शांत अवधि (Cooling-off Period)

छह महीने की अवधि दी जाती है ताकि पक्ष पुनर्विचार कर सकें।

दूसरा चरण (Second Motion)

यदि छह महीने बाद भी दोनों पक्ष सहमत हों, तो पुनः आवेदन किया जाता है।

न्यायालय का आदेश

न्यायालय संतुष्ट होने पर तलाक की डिक्री पारित करता है।


आपसी सहमति से तलाक का महत्व

  • शीघ्र एवं सरल प्रक्रिया
  • कटुता में कमी
  • सम्मानजनक समाधान

सामाजिक एवं विधिक प्रभाव

तलाक की व्यवस्था विवाह संस्था को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे अधिक यथार्थवादी बनाती है।

यह प्रावधान—

  • स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा करता है
  • मानसिक शांति प्रदान करता है
  • सामाजिक न्याय को बढ़ावा देता है

आलोचनात्मक मूल्यांकन

  1. तलाक की प्रक्रिया लंबी और खर्चीली हो सकती है।
  2. सामाजिक दबाव के कारण अनेक लोग अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाते।
  3. बच्चों पर मानसिक प्रभाव पड़ता है।

फिर भी, तलाक की व्यवस्था एक आवश्यक सामाजिक सुधार है।


निष्कर्ष

हिंदू विवाह-विच्छेद की अवधारणा आधुनिक भारतीय समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई है। दोष-आधारित तलाक और आपसी सहमति से तलाक दोनों ही विवाह संस्था को न्यायसंगत बनाते हैं।

तलाक का उद्देश्य विवाह को नष्ट करना नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों को राहत देना है, जिनके लिए वैवाहिक जीवन असहनीय हो चुका है।

अतः कहा जा सकता है कि हिंदू विवाह-विच्छेद की व्यवस्था भारतीय विधि में सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।