‘Kerala Story 2: Goes Beyond’ पर विवाद: Kerala High Court ने सेंसर प्रमाणपत्र को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से तत्काल रुख माँगा
फिल्मों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विवाद भारतीय न्यायालयों के समक्ष समय-समय पर आते रहे हैं। हाल ही में फिल्म ‘Kerala Story 2: Goes Beyond’ को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। इस फिल्म को जारी किए गए सेंसर प्रमाणपत्र (Censor Certificate) को चुनौती देते हुए दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए Kerala High Court ने केंद्र सरकार से उसी दिन यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या अदालत के समक्ष फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग की व्यवस्था की जा सकती है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि फिल्म में केरल राज्य को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे राज्य की छवि को नुकसान पहुँच सकता है। दूसरी ओर, फिल्म निर्माताओं का कहना है कि यह रचनात्मक अभिव्यक्ति (Creative Expression) का हिस्सा है और इसे संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्रता प्राप्त है।
विवाद की पृष्ठभूमि
फिल्म ‘Kerala Story 2: Goes Beyond’ कथित तौर पर ऐसे विषयों को प्रस्तुत करती है जिन्हें कुछ समूहों ने राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के विरुद्ध बताया है। इससे पहले भी फिल्मों के विषय-वस्तु को लेकर सार्वजनिक बहस और कानूनी चुनौतियाँ सामने आती रही हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि फिल्म राज्य को “खराब रोशनी” (Bad Light) में दर्शाती है और इससे सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है। उन्होंने सेंसर प्रमाणपत्र को रद्द करने या उस पर रोक लगाने की मांग की है।
सेंसर प्रमाणपत्र और वैधानिक ढाँचा
भारत में फिल्मों के प्रदर्शन से पूर्व केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से प्रमाणपत्र लेना आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया Cinematograph Act, 1952 के अंतर्गत संचालित होती है।
CBFC फिल्म की सामग्री की समीक्षा कर उसे ‘U’, ‘UA’, ‘A’ या ‘S’ श्रेणी में प्रमाणित करता है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन को प्रमाणन प्रक्रिया में त्रुटि या पक्षपात प्रतीत होता है, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं का दावा है कि बोर्ड ने फिल्म की सामग्री का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया और राज्य की छवि को प्रभावित करने वाले तत्वों को अनदेखा कर दिया।
उच्च न्यायालय की कार्यवाही
सुनवाई के दौरान Kerala High Court ने यह संकेत दिया कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले फिल्म को देखना आवश्यक हो सकता है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या उसी दिन फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग की व्यवस्था की जा सकती है, ताकि न्यायालय स्वयं उसकी सामग्री का मूल्यांकन कर सके।
यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि अदालत केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहती, बल्कि प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर संतुलित आदेश पारित करना चाहती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक व्यवस्था
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। परंतु अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। राज्य सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता आदि के आधार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
फिल्मों के संदर्भ में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या कोई फिल्म सामाजिक सद्भाव को प्रभावित करती है या केवल एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। न्यायालयों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि केवल असहमति या आहत भावनाएँ सेंसरशिप का पर्याप्त आधार नहीं हो सकतीं।
पूर्व न्यायिक दृष्टांत
फिल्मों से जुड़े विवादों में Supreme Court of India ने बार-बार यह दोहराया है कि कलात्मक अभिव्यक्ति को यथासंभव संरक्षित किया जाना चाहिए। यदि किसी फिल्म को वैधानिक प्रक्रिया के तहत प्रमाणित किया गया है, तो सामान्यतः न्यायालय हस्तक्षेप से बचते हैं, जब तक कि स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन न हो।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि दर्शकों को परिपक्व माना जाना चाहिए और वे स्वयं यह तय कर सकते हैं कि वे क्या देखना चाहते हैं।
राज्य की छवि और संवैधानिक संतुलन
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि फिल्म राज्य की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचा सकती है। परंतु विधिक दृष्टि से “राज्य की छवि” की रक्षा का प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से टकरा सकता है।
यदि प्रत्येक आलोचनात्मक प्रस्तुति को राज्य-विरोधी मान लिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित कर सकता है। वहीं, यदि कोई फिल्म तथ्यात्मक रूप से भ्रामक या उकसाने वाली हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं।
न्यायिक समीक्षा का दायरा
उच्च न्यायालय का दायित्व यह देखना है कि:
- क्या प्रमाणपत्र विधि के अनुरूप जारी किया गया?
- क्या बोर्ड ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया?
- क्या फिल्म की सामग्री स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन करती है?
फिल्म की स्क्रीनिंग का आदेश इसी व्यापक न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
संभावित परिणाम
अदालत निम्न में से कोई भी आदेश दे सकती है:
- सेंसर प्रमाणपत्र को बरकरार रखना
- कुछ दृश्यों में संशोधन का निर्देश देना
- अस्थायी रोक लगाना
- याचिका खारिज करना
अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि न्यायालय फिल्म की सामग्री और कानूनी तर्कों को किस प्रकार संतुलित करता है।
व्यापक सामाजिक प्रभाव
यह मामला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाता है कि लोकतांत्रिक समाज में रचनात्मक अभिव्यक्ति की सीमाएँ क्या होनी चाहिए।
सिनेमा एक प्रभावशाली माध्यम है, जो जनमत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से सीमित करना भी लोकतंत्र के मूल्यों के विपरीत होगा।
निष्कर्ष
‘Kerala Story 2: Goes Beyond’ को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि कला, राजनीति और कानून के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल है। Kerala High Court द्वारा केंद्र से तत्काल रुख माँगना और संभावित स्क्रीनिंग की बात करना यह दर्शाता है कि न्यायालय गंभीरता से और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहता है।
आने वाला निर्णय न केवल इस फिल्म के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप के प्रश्न पर भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान कर सकता है।