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‘फूड जिहाद’ नैरेटिव पर कड़ा रुख : एनबीडीएसए की आपत्ति, मीडिया जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा

‘फूड जिहाद’ नैरेटिव पर कड़ा रुख : एनबीडीएसए की आपत्ति, मीडिया जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हाल के वर्षों में उभरे कुछ विवादित नैरेटिव—विशेषकर ‘फूड जिहाद’ जैसे शब्दों के प्रयोग—ने पत्रकारिता की आचार-संहिता, सत्यापन के मानकों और सामाजिक सद्भाव पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इसी संदर्भ में News Broadcasting & Digital Standards Authority (एनबीडीएसए) ने NDTV, Zee News, Times Now Navbharat और News18 India की उन रिपोर्टों पर आपत्ति जताई, जिनमें ‘फूड जिहाद’ शब्दावली का उपयोग करते हुए कथित घटनाओं को बिना पर्याप्त सत्यापन के प्रसारित किया गया।

यह घटनाक्रम केवल कुछ चैनलों के विरुद्ध नियामकीय टिप्पणी भर नहीं है; यह मीडिया की स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक समाज में उसकी भूमिका पर व्यापक बहस को जन्म देता है।


‘फूड जिहाद’ : शब्द, संदर्भ और विवाद

‘फूड जिहाद’ शब्द किसी विधिक परिभाषा का हिस्सा नहीं है। यह एक विवादित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील अभिव्यक्ति है, जिसका उपयोग कुछ समाचार रिपोर्टों में इस आशय से किया गया कि भोजन के माध्यम से किसी विशेष धार्मिक एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है।

ऐसी शब्दावली, यदि ठोस और सत्यापित तथ्यों के बिना प्रयोग की जाए, तो वह समाज में अविश्वास, पूर्वाग्रह और ध्रुवीकरण को बढ़ा सकती है। मीडिया की भूमिका तथ्य प्रस्तुत करने की है, न कि अनुमान या भावनात्मक शब्दों के माध्यम से सनसनी फैलाने की।


एनबीडीएसए की भूमिका और आपत्ति

News Broadcasting & Digital Standards Authority एक स्व-नियामक संस्था है, जो न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) से संबद्ध चैनलों के लिए आचार-संहिता लागू करती है। इसका उद्देश्य है—संतुलित, निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना।

एनबीडीएसए ने संबंधित चैनलों की रिपोर्टों की समीक्षा करते हुए पाया कि कुछ मामलों में आरोपों का पर्याप्त सत्यापन नहीं किया गया था और प्रस्तुतिकरण की शैली पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है।

इस आधार पर प्राधिकरण ने आपत्ति दर्ज की और प्रसारण मानकों के उल्लंघन की ओर संकेत किया।


पत्रकारिता के मूल सिद्धांत : सत्यापन और संतुलन

पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है—तथ्य की पुष्टि (verification)। किसी भी गंभीर आरोप को प्रसारित करने से पूर्व पत्रकारों और संपादकों पर यह दायित्व होता है कि वे स्रोतों की पुष्टि करें, संबंधित पक्षों का पक्ष लें और संदर्भ स्पष्ट करें।

यदि बिना पुष्ट प्रमाण के किसी धार्मिक समुदाय या समूह को लक्षित करते हुए आरोप लगाए जाएँ, तो यह न केवल पेशेवर मानकों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक सद्भाव के लिए भी हानिकारक हो सकता है।

एनबीडीएसए की आपत्ति इसी बिंदु पर केंद्रित है—क्या रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित थी या अनुमान और सनसनी पर?


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारी

भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। मीडिया इस स्वतंत्रता का प्रमुख वाहक है।

परंतु यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, और नैतिकता के आधार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने का अधिकार है।

जब मीडिया किसी संवेदनशील विषय पर रिपोर्टिंग करता है, तो उसे इस संतुलन को ध्यान में रखना चाहिए—स्वतंत्रता का प्रयोग जिम्मेदारी के साथ।


सामाजिक प्रभाव : शब्दों की शक्ति

समाचार चैनलों की पहुंच व्यापक है। उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द और शीर्षक जनमत को प्रभावित करते हैं।

‘फूड जिहाद’ जैसे शब्द यदि बार-बार प्रसारित किए जाएँ, तो वे सामाजिक अविश्वास को संस्थागत रूप दे सकते हैं।

मीडिया अध्ययन विशेषज्ञों का मत है कि फ्रेमिंग (framing) और नैरेटिव निर्माण का प्रभाव दीर्घकालिक होता है। इसलिए प्रसारण मानकों का पालन केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।


स्व-नियमन बनाम वैधानिक नियमन

भारत में समाचार चैनलों के लिए मुख्यतः स्व-नियमन की व्यवस्था है। एनबीडीएसए जैसे निकाय शिकायतों की समीक्षा कर चेतावनी, फटकार या जुर्माना लगा सकते हैं।

कुछ आलोचक मानते हैं कि स्व-नियमन पर्याप्त नहीं है और अधिक सख्त वैधानिक ढांचे की आवश्यकता है।

दूसरी ओर, कई मीडिया विशेषज्ञों का तर्क है कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण से प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

इस प्रकरण ने इस बहस को पुनः जीवित कर दिया है कि मीडिया नियमन का संतुलित मॉडल क्या होना चाहिए।


संबंधित चैनलों की प्रतिक्रिया

आमतौर पर ऐसे मामलों में चैनल यह तर्क देते हैं कि उन्होंने उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर रिपोर्टिंग की और उनका उद्देश्य किसी समुदाय को लक्षित करना नहीं था।

कभी-कभी चैनल यह भी कहते हैं कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों के बयानों को ही प्रसारित किया।

हालाँकि, नियामक निकाय यह देखता है कि प्रस्तुति की शैली और भाषा निष्पक्ष थी या नहीं।


व्यापक लोकतांत्रिक संदर्भ

लोकतंत्र में मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। उसकी भूमिका केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना और नागरिकों को जागरूक करना है।

यदि मीडिया स्वयं विवाद का स्रोत बन जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर हो सकता है।

एनबीडीएसए की आपत्ति को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए—यह पत्रकारिता के मानकों को बनाए रखने का प्रयास है, न कि अभिव्यक्ति को दबाने का।


आगे की राह : जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता

इस प्रकरण से कुछ महत्वपूर्ण सीखें निकलती हैं:

  1. सत्यापन सर्वोपरि – किसी भी आरोप को प्रसारित करने से पहले ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
  2. संतुलित भाषा का प्रयोग – संवेदनशील शब्दावली से बचना चाहिए।
  3. संपादकीय जवाबदेही – चैनलों को अपनी आंतरिक संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया मजबूत करनी चाहिए।
  4. मीडिया साक्षरता – दर्शकों को भी यह समझना चाहिए कि हर प्रसारित सूचना अंतिम सत्य नहीं होती।

निष्कर्ष

‘फूड जिहाद’ पर रिपोर्टिंग के संबंध में एनबीडीएसए की आपत्ति ने भारतीय मीडिया के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी अनिवार्य है।

NDTV, Zee News, Times Now Navbharat और News18 India जैसे प्रमुख चैनलों पर उठे प्रश्न यह दर्शाते हैं कि पत्रकारिता के उच्च मानकों का पालन सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है।

अंततः, मीडिया की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि सत्यापन, संतुलन और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन किया जाए, तो मीडिया न केवल सूचना का माध्यम रहेगा, बल्कि लोकतंत्र की सुदृढ़ आधारशिला भी बनेगा।