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“75 वर्ष बाद भी संवैधानिक नैतिकता से दूरी” : न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की टिप्पणी और भारतीय लोकतंत्र का आत्ममंथन

“75 वर्ष बाद भी संवैधानिक नैतिकता से दूरी” : न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की टिप्पणी और भारतीय लोकतंत्र का आत्ममंथन

भारतीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अवधि किसी भी राष्ट्र के लिए केवल समय की गणना नहीं, बल्कि संस्थागत परिपक्वता, संवैधानिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी की कसौटी होती है। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है कि “कुछ उदाहरण यह दर्शाते हैं कि हम संवैधानिक नैतिकता के मानक से अभी भी काफी दूर हैं।”

यह कथन एक सामान्य न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक आचरण, सामाजिक सोच और संवैधानिक प्रतिबद्धता पर गहन आत्ममंथन का आह्वान है। 75 वर्षों की यात्रा के बाद भी यदि संवैधानिक नैतिकता केवल पुस्तकीय आदर्श बनकर रह जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।


संवैधानिक नैतिकता : केवल सिद्धांत नहीं, जीवन मूल्य

संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का अर्थ केवल संविधान के अनुच्छेदों का पालन करना नहीं है। इसका आशय है—संविधान की मूल भावना, उसके आदर्शों और मूल्यों को सार्वजनिक और निजी जीवन में आत्मसात करना।

संविधान की प्रस्तावना में “न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” जैसे शब्द केवल घोषणाएँ नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र जीवन के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। संविधान सभा में B. R. Ambedkar ने स्पष्ट कहा था कि संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं होती; उसे शिक्षित और विकसित करना पड़ता है।

उनका यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि समाज में पूर्वाग्रह, असहिष्णुता और भेदभाव मौजूद हैं, तो यह संकेत है कि संवैधानिक नैतिकता की जड़ें अभी गहरी नहीं हुई हैं।


75 वर्षों की उपलब्धियाँ : एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा

यह भी सत्य है कि भारत ने इन 75 वर्षों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। नियमित और निष्पक्ष चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, सक्रिय न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस—ये सभी हमारी लोकतांत्रिक शक्ति के प्रमाण हैं।

Supreme Court of India ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। न्यायपालिका ने बार-बार यह दोहराया है कि संविधान सर्वोच्च है और राज्य की सभी संस्थाएँ उसके अधीन हैं।

फिर भी, उपलब्धियों के इस परिदृश्य के बीच न्यायमूर्ति भुयान की टिप्पणी यह संकेत देती है कि केवल संस्थागत मजबूती पर्याप्त नहीं है; नैतिक चेतना भी उतनी ही आवश्यक है।


सामाजिक वास्तविकता और संवैधानिक आदर्श

भारतीय समाज विविधताओं से भरा है—धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के अनेक आयाम। संविधान ने इन विविधताओं को सम्मान देने का वचन दिया है।

लेकिन जब किसी व्यक्ति को उसकी पहचान के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जब सामाजिक या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों की अनदेखी होती है, या जब सार्वजनिक जीवन में असहिष्णुता बढ़ती है, तब यह स्पष्ट होता है कि संवैधानिक आदर्श अभी व्यवहार में पूर्णतः स्थापित नहीं हुए हैं।

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ यह है कि बहुसंख्यक भावना भी संविधान की सीमाओं के भीतर रहे। लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि अधिकारों का संरक्षण भी है।


न्यायपालिका की चेतावनी : केवल निर्णय नहीं, दिशा भी

न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक कहा जाता है। जब न्यायमूर्ति उज्जल भुयान जैसे वरिष्ठ न्यायाधीश संवैधानिक नैतिकता की कमी पर चिंता व्यक्त करते हैं, तो यह केवल न्यायिक विमर्श नहीं, बल्कि सामाजिक दिशा का संकेत भी होता है।

न्यायाधीश केवल विधिक विवादों का समाधान नहीं करते; वे संविधान की आत्मा की रक्षा करते हैं। उनकी टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल विधिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता से भी जुड़ी है।


संस्थागत मर्यादाएँ और जिम्मेदारी

संवैधानिक नैतिकता का एक महत्वपूर्ण पहलू है—संस्थागत मर्यादा। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—तीनों को अपने-अपने दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए।

यदि कोई संस्था अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करती है या शक्ति का दुरुपयोग करती है, तो संवैधानिक संतुलन बिगड़ जाता है। 75 वर्षों के अनुभव ने यह सिखाया है कि लोकतंत्र की स्थिरता के लिए संस्थागत अनुशासन अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति भुयान की टिप्पणी हमें यह याद दिलाती है कि संविधान केवल शक्ति का वितरण नहीं करता, बल्कि उस शक्ति के उपयोग की नैतिक सीमा भी निर्धारित करता है।


नागरिकों की भूमिका : अधिकार और कर्तव्य

अक्सर संवैधानिक नैतिकता की चर्चा राज्य संस्थाओं तक सीमित रह जाती है, जबकि इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों पर भी है।

यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं, परंतु दूसरों के अधिकारों का सम्मान नहीं करते, तो संवैधानिक संतुलन कमजोर पड़ जाता है। संविधान ने हमें मौलिक अधिकार दिए हैं, परंतु साथ ही मौलिक कर्तव्यों की भी व्यवस्था की है।

लोकतंत्र केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भागीदारी से संचालित होता है। संवैधानिक नैतिकता तभी सशक्त होगी जब समाज में पारस्परिक सम्मान और सहिष्णुता का वातावरण विकसित होगा।


शिक्षा और संवैधानिक साक्षरता की आवश्यकता

संवैधानिक नैतिकता को मजबूत करने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी माध्यम है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संविधान के सिद्धांतों को केवल परीक्षा तक सीमित न रखकर जीवन मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

संवैधानिक साक्षरता का अर्थ है—लोग यह समझें कि उनके अधिकार क्या हैं, और दूसरों के अधिकारों की रक्षा क्यों आवश्यक है।

यदि नई पीढ़ी संविधान को केवल विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि नैतिक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करे, तो आने वाले वर्षों में संवैधानिक नैतिकता की जड़ें और गहरी होंगी।


लोकतंत्र का भविष्य : आत्ममंथन से सुधार तक

न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की टिप्पणी निराशा का संदेश नहीं, बल्कि सुधार का अवसर है। 75 वर्षों की यात्रा ने हमें अनुभव और सीख दी है। अब आवश्यकता है कि हम उन कमियों को पहचानें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें।

लोकतंत्र की शक्ति उसकी आत्मसमीक्षा में निहित होती है। यदि हम अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में बढ़ते हैं, तो संवैधानिक नैतिकता का आदर्श दूर नहीं रहेगा।

भारत का संविधान केवल शासन की रूपरेखा नहीं, बल्कि एक नैतिक संहिता भी है। जब तक हम उसके मूल्यों को अपने व्यवहार में नहीं उतारेंगे, तब तक उसकी पूर्णता अधूरी रहेगी।


निष्कर्ष : आदर्श और वास्तविकता के बीच की दूरी

75 वर्षों बाद भी यदि संवैधानिक नैतिकता एक अधूरा लक्ष्य प्रतीत होती है, तो यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम उस दूरी को कम करें।

न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की टिप्पणी हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल संस्थागत संरचना नहीं, बल्कि नैतिक चेतना का नाम है।

संविधान ने हमें एक दिशा दी है—समानता, न्याय और बंधुत्व की दिशा। अब यह हम पर निर्भर है कि हम उस दिशा में कितनी ईमानदारी से आगे बढ़ते हैं।

यदि राज्य, समाज और नागरिक मिलकर संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में उतारें, तो आने वाले वर्षों में यह टिप्पणी केवल चेतावनी नहीं, बल्कि परिवर्तन की शुरुआत सिद्ध होगी।